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जीवितपुत्रिका व्रत आज, जानिए क्या है कथा और उसका महत्व

 Special News Coverage |  5 Oct 2015 7:47 AM GMT

Jivitputrika Vrat


हमारे देश में भक्ति एवं उपासना का एक रूप उपवास हैं जो मनुष्य में सैयम, त्याग, प्रेम एवम श्रध्दा की भावना को बढ़ाते हैं। उन्ही में से एक व्रत संतान की मंगल कामन के लिए हैं जीवित्पुत्रिका व्रत। यह व्रत मातायें निर्जला यानि पूरे दिन-रात पानी नही लिया जाता है। हिन्दू पंचाग के अनुसार यह व्रत आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को पुत्र की लंबी आयु व उत्तम स्वास्थ्य के लिए जीवितपुत्रिका व्रत किया जाता है। इसे जिऊतिया व जीमूतवाहन व्रत भी कहते हैं। खासतौर पर यह व्रत उत्तरप्रदेश, बिहार एवम नेपाल में मनाया जाता हैं।


व्रत विधि
सुबह स्नान आदि करने के बाद व्रत का संकल्प लें। प्रदोष काल (शाम को) में गाय के गोबर से अपने आंगन को लीपे और वहीं एक छोटा सा तालाब भी बना लें। तालाब के निकट पाकड़ (एक प्रकार का पेड़) की डाल लाकर खड़ी कर दें। शालिवाहन राजा के पुत्र जीमूतवाहन की कुशनिर्मित मूर्ति मिट्टी के बर्तन में स्थापित कर पीली और लाल रुई से उसे सजाएं तथा धूप, दीप, चावल, फूल, माला एवं विविध प्रकार के नैवेद्यों से पूजन करें।

मिट्टी तथा गाय के गोबर से चिल्ली या चिल्होड़िन (मादा चील) व सियारिन की मूर्ति बनाकर उनके मस्तकों को लाल सिंदूर से सजा दें। अपने वंश की वृद्धि और प्रगति के लिए बांस के पत्तों से पूजन करना चाहिए। इसके बाद व्रत की कथा सुनें।

जीवित्पुत्रिका की कथा :
गंधर्वों के राजकुमार का नाम जीमूतवाहन था। वह बहुत दयालु एवं धर्मनिष्ठ था। परंतु उसका मन राज-पाट में नहीं लगता था। अत: राज्य का भार अपने भाइयों पर छोड़कर वह स्वयं वन में पिता की सेवा करने चला गया। एक दिन वन में जीमूतवाहन को एक वृद्धा विलाप करते हुए दिखाई दी। उन्होंने वृद्धा से उसके रोने का कारण पूछा तो उसने बताया कि मैं नागवंश की स्त्री हूं तथा मेरा एक ही पुत्र है। नागों द्वारा रोज एक नाग पक्षीराज गरुड़ को भोजन के लिए दिया जाता है। आज मेरे पुत्र शंखचूड़ की बलि का दिन है।



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उस स्त्री की व्यथा सुनकर जीमूतवाहन ने कहा कि मैं आपके पुत्र के प्राणों की रक्षा अवश्य करूंगा। वचन देकर जीमूतवाहन स्वयं गरुड़ को बलि देने के लिए चुने गए स्थान पर लेट गए। नाग के स्थान पर जीमूतवाहन को देखकर गरुड़ आश्चर्य में पड़ गए और जीमूतवाहन से उनका परिचय पूछा। जीमूतवाहन ने उन्हें सारी बात सच-सच बता दी। जीमूतवाहन की बहादुरी और परोपकार की भावना से प्रभावित होकर गरुड़देव उन्हें तथा नागों को जीवनदान देते हैं। इस प्रकार जीमूतवाहन के साहस से नाग जाति की रक्षा होती है।

एक अन्य कथा महाभारत काल से
यह कथा महाभारत काल से जुड़ी हुई हैं। महाभारत युद्ध के बाद अपने पिता की मृत्यु के बाद अश्व्थामा बहुत ही नाराज था और उसके अन्दर बदले की आग तीव्र थी जिस कारण उसने पांडवो के शिविर में घुस कर सोते हुए पांच लोगो को पांडव समझकर मार डाला था लेकिन वे सभी द्रोपदी की पांच संताने थी। उसके इस अपराध के कारण उसे अर्जुन ने बंदी बना लिया और उसकी दिव्य मणि छीन ली जिसके फलस्वरूप अश्व्थामा ने उत्तरा की अजन्मी संतान को गर्भ में मारने के लिए ब्रह्मास्त्र का उपयोग किया जिसे निष्फल करना नामुमकिन था।

उत्तरा की संतान का जन्म लेना आवश्यक था जिस कारण भगवान श्रीकृष्ण ने अपने सभी पुण्यों का फल उत्तरा की अजन्मी संतान को देकर उसको गर्भ में ही पुनः जीवित किया। गर्भ में मरकर जीवित होने के कारण उसका नाम जीवित्पुत्रिका पड़ा और आगे जाकर यही राजा परीक्षित बना। तब ही से इस व्रत को किया जाता हैं। इस प्रकार इस जीवित्पुत्रिका व्रत का महत्व महाभारत काल से हैं।


पारण: यह जीवित्पुत्रिका व्रत का अंतिम दिन पारण होता हैं इस दिन कई लोग बहुत सी चीज़े खाते हैं लेकिन खासतौर पर इस दिन झोर भात, नोनी का साग एवम मडुआ की रोटी अथवा मरुवा की रोटी दिन के पहले भोजन में ली जाती हैं। कई जगह माताये दूध या दही चिउड़ा और खांड (चीनी) भी खाती हैं।
देवरिया (मिथिलेश त्रिपाठी)

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