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जहाँ आज भी रोज आते हैं श्री कृष्ण, एक वादा निभाने!

 Special News Coverage |  28 March 2016 5:47 AM GMT



वृंदावन, विशेष:पं०सत्यम् मिश्रा

जी हाँ,आपने सही सुना आज भी रोज आते हैं श्री कृष्ण,एक सदियों पहले किया हुआ वादा निभाने,एक महारास करने,नृत्य करने,बासुरी बजाने आतें हैं इस भू-लोक पर।


जी हाँ, भारत में कई ऐसी जगह है जो अपने दामन में कई रहस्यों को समेटे हुए है। ऐसी ही आज आपको एक जगह से परचित कराते हैं जिसका नाम वृंदावन स्थित,निधि वन है,जिसके बारे में मान्यता है क़ि आज भी अर्द्ध-रात्रि में श्री कृष्ण गोपियों संग महारास रचाते हैं। आपको जान कर हैरानी होगी की सायं काल की आरती के पश्चात यहाँ का पट बंद कर दिया जाता है।


आप को इस बात से अवगत करा दें कि सायं 7 बजे के बाद, कृष्ण जी के लिये निधि वन परिसर मे मौजूद रंग महल की पलंग की सेज को सजा दिया जाता है और साथ ही साथ सेज के निकट एक पात्र में शुद्ध नीर, लड्डू, पान के बीड़े के साथ दातुन रख दी जाती है, और रंग महल को सजा कर पट 7 बजे के बाद बंद कर दिया जाता है। फिर कल प्रातः5 बजे ही खुलता है, और इस सायं 7 बजे से ले कर अगली प्रातः 5 बजे तक इस समय के दौरान वहाँ किसी को ठहरने की अनुमति बिलकुल भी नहीं हैं।




क्योंकि की ऐसी मान्यता है कि जो भी मानव चाहे वो नर हो या मादा यहाँ चोरी छुपे रुकता है,या तो वो पागल हो जाता हैं या गूंगा हो जाता है,और इस बात की साक्षी यहाँ के भक्त-गण हैं, और आपको ये जानकर हैरानी होगी की यहाँ के वृक्षों कि जो शाखाएं हैं वो सब वृक्षों की तरह गगन चुम्बी नहीँ होती हैं।





बल्कि वशुन्धरा चुम्बी होती हैं, और आपको इस बात से भी रूबरू करा दें क़ि ये वृक्ष हमारे आँगन की तुलसी का वृक्ष है जो युगों से इस निधि वन में 16108 की मात्रा में है और रोचक बात ये है, कि ये तुलसी के 16108 वृक्ष एक साथ जोड़े में हैं। तुलसी के पेड़,16108 से स्मरण आया की देवी भागवत में कृष्ण जी की पत्नी की संख्या भी ठीक यही बतायी गयी है,और मान्यता है कि यही तुलसी के वृक्ष अर्द्ध रात्रि मेँ महान् गोपियों का रूप धारण कर लेतीं हैं,और राधा-कृष्ण संग महारास करती हैं और आप ये जान कर अचंभित होगें कि ये तुलसी का वृक्ष सूखा हुआ है। पर इसमें निकलने वाली पत्तियां एक दम हरी-भरी हैं,और अगर आप इन वृछों की लकड़ियों को तोड़ कर अपने साथ ले कर जाते है। तो यक़ीन मानिये आप के साथ निश्चित ही कुछ न कुछ अनहोनी हो कर रहे गी, क्योंकि गोपियों को श्री कृष्ण से अलग करने का दंड तो मिलेगा ही। आज तक कितने शोध् कर्ता आए कितने ही वैज्ञानिकों ने इस रहस्य को जानना चाहा कि वृछ तो सूखा है पर पत्तियां कैसे हरी भरी हैं। जबकि वृक्षों में जान ही नहीँ है। वृछ युगोँ पहले पूरी तरह सूख चुके है, इस बात का जवाब आज भी वैज्ञानिकों के पास नही है पर इसका जवाब सिर्फ कृष्ण के अनन्य भक्तों के पास आपको अवश्य मिलेगा।ये तो बात थी निधि वन की।


अब बात करतें हैं,निधि वन में मौजूद रंग महल की जहाँ सायं होते ही,वहाँ पर उपस्थित सारे जीव-जंतु चाहे वो खग हों या मर्कट सब के सब निधि वन के परिषर को छोड़ कर कहीं और ठिकाना ढूंढ लेते हैं,और वहाँ के आसपास मौजूद गृह के गृहणि लोग सारी खिड़कियों और दरवाजों को बंद कर लेते हैं। क्योंकि इस महारास को देखने कि अनुमति किसी को भी नहीं है यहाँ तक की देवताओं तक को नहीं है। निधि वन में मौजूद रंग महल को जब प्रातः5 बजे खोला जाता है। तब जो आँखें देखती हैं वो फिर जिह्वा से बोलती नहीं क्योंकि उन भक्तों के नेत्र ही श्री कृष्ण के मौजूद होने का साक्ष्य देते हैं। वहाँ मौजूद जल खाली या अर्द्ध शेष रहता हैं और वहीँ दूसरी तरफ सजी हुई पलंग की सेज पे नदियों की लहरों की तरह सिकुड़न मौजूद होती हैं। लड्डू आधे खाये हुए, पान की बीड़ायें चबाई हुई और दातुन की हुई मिलती हैं। और जाहिर सी बात हैं ये तथ्य श्री कृष्ण के भक्तों में रोमांच के साथ साथ रोयें खड़े करने वाला है,क्योंकि कई लोग आये इस सत्य को जानने यहाँ रात रात भर जागे,कैमरों को मुख्य पट के पास रखा। इस बात की सत्यता जानने के लिए की कहीं कोई देर रात्रि में आ कर ये सब गति-विधियां रंग महल में अ कर न कर जाता हो। निर्दोष, निष्पाप और नि:अपराध भक्तों को ठगने के लिए पर आप यकीन मानिये वहाँ कोई नहीँ आता,क्योंकि ये स्वतःघटित होता है और इसे किसी प्रमाण की जरूरत नहीं है। क्योंकि सत्य को किसी प्रमाण की जरूरत नहीँ पड़ती वह स्वतः सिद्ध हो जाता है।

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