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इस शिव मंदिर में समुद्र खुद करते है महादेव का जलाभिषेक, जानकार आप चौंक जायेंगे

 Special News Coverage |  29 April 2016 12:20 PM GMT



नई दिल्ली: शायद आप ये जानकर हैरान रह जाए, लेकिन गुजरात में एक ऐसा शिव मंदिर है, जहां समुद्र खुद महादेव का जलाभिषेक करने के लिए आता है। यह मंदिर गुजरात के बड़ोदरा से 85 किलोमीटर दूर भरुच जिले की जम्बूसर तहसील में गाँव ‘कावी’ में स्थित है। इस मंदिर का नाम स्तंभेश्वर महादेव मंदिर है। समुद्र किनारे बसे इस गांव में स्तंभेश्वर महादेव का प्राचीन मंदिर है। भगवान शिव के इस मंदिर की खोज लगभग 150 साल पहले हुई। इस प्राचीन मंदिर की विशेषता इसका अरब सागर के मध्य कैम्बे तट पर स्थित होना है।


इस मंदिर का वातावरण बहुत शांत और आध्यात्मिक रहता है। अगर कोई श्रद्धालु ध्यान और योगा में दिलचस्पी रखता है तो यह बेहतर स्थल है। यहां के आश्रम में एक रात रुकने पर श्रद्धालु को रात्रि के शांत वातावरण में भगवान शिव के संपूर्ण वैभव के दर्शन मिल सकते हैं। इस मंदिर में महाशिवरात्रि और हर अमावस्या पर मेला लगता है। प्रदोष पूनम और एकादशी पर यहां दिन-रात पूजा-अर्चना होती रहती है। दूर-दूर से श्रद्धालु समुद्र द्वारा भगवान शिव के जलाभिषेक का अलौकिक दृश्य देखने यहां आते हैं। मंदिर दिन में दो बार कुछ पल के लिए गायब हो जाता है। और फिर अपने आप ही मूल रूप में आ जाता है।



इसका वर्णन शिवपुराण के रुद्र संहिता के अध्याय एकादश में है। इस जगह पर महिसागर नदी सागर में समाहित होती है। शिवपुराण के अनुसार ताड़कासुर नामक एक असुर ने भगवान् शिव को तपस्या कर प्रसन्न किया था। उस असुर की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उसको मनवांछित वरदान दिया था। उस वरदान के अनुसार शिव पुत्र के अलावा उस असुर को कोई नहीं मार सकता था। उस असुर को मारने के लिए शिव पुत्र की आयु छह दिन की होनी चाहिए।

वरदान के मिलते ही इस असुर ने तीनों लोकों में हाहाकार मचा दिया था, जिससे दुखी होकर सारे देव और ऋषि-मुनि भगवान शिव के पास आकर उस असुर के वध के लिए प्राथना की, तब शिव ने उनकी प्राथना स्वीकार कर ली और श्वेत पर्वत कुंड से उत्पन्न हुए 6 दिन के कार्तिकेय, जिनकी 4-आंख, 6-मस्तिष्क और 12 हाथ थे, से ताड़कासुर का वध करवाया गया।

उस असुर के मौत के बाद कार्तिकेय को उसके शिव भक्त होने का ज्ञान हुआ, जिसके कारण कार्तिकेय को शर्मिंदगी महसूस हुई। तब भगवान विष्णु ने कार्तिकेय को उसकी वध की जगह में शिवालय बनवाने को कहा। उस विचार के बाद सारे देवता एकत्र हुए। महिसागर संगम तीर्थ में ‘विश्वनंदक’ स्तंभ का निर्माण किया। और फिर पश्चिम भाग के स्थित स्तंभ पर भगवान शिव आकर स्वयं बिराजमान गए और तब से यह जगह स्तंभेश्वर महादेव मंदिर के नाम से पुकारा जाने लगा।

यहां आने वाले श्रद्धालुओं के लिए खासतौर से परचे बांटे जाते हैं जिसमें ज्वार-भाटा आने का समय लिखा होता है। ऐसा इसलिए किया जाता है जिससे यहां आने वाले श्रद्धालुओं को किसी भी प्रकार समस्या का सामना न करना पड़े। स्थानीय पुजारियों और श्रद्धालुओं के मुताबिक़ स्तंभेश्वर मंदिर में विराजमान भगवान नीलकंठेश्वर का जलाभिषेक करने के लिए स्वयं समुद्र देवता पधारते हैं। ज्वार के समय शिवलिंग पूरी तरह से जलमग्न हो जाता है। उस समय वहां किसी के भी प्रवेश की अनुमति नहीं है। मंदिर दिन में सुबह और शाम को पल भर के लिए ओझल हो जाता है और कुछ देर बाद उसी जगह पर वापस भी आ जाता है।

वैसे यह कोई चमत्कार नहीं, अपितु प्रकृति की एक मनोहारी परिघटना है। समुद्री ज्वारभाटे के कारण यह शिवालय नियमित रूप से कुछ पलों के जलमग्न हो जाता है। असल में मंदिर खंभात की खाड़ी के तीरे स्थित है। ज्वार के समय समुद्र का पानी मंदिर के अंदर आता है और शिवलिंग का अभिषेक कर वापस लौट जाता है। यह घटना प्रतिदिन सुबह और शाम को घटित होती है।

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