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मार्गपाली पूजन से वर्षभर सब प्रकार की सुख -शांति रहती है

मार्गपाली पूजन से वर्षभर सब प्रकार की सुख -शांति रहती है
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कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को (8 नवम्बर 2018) सायंकाल के समय कुश या काँस का लंबा और मजबूत बनाकर उसमें जहाँ -तहाँ अशोक ( आशापाला) के पत्ते गूँथकर बंदनवार बनवायें और राजप्रसाद के प्रवेश -द्वार पर अथवा दरवाजे के आकार के दो अति उच्चस्तम्भों पर इस सिरे से उस सिरे तक बँधवा दे और गंध पुष्पादि से पूजन करके

' मार्गपालि नमस्तेSस्तु सर्वलोकसुखप्रदे।

विधेयै: पुत्रदाराद्यैः पुनरेहि व्रतस्य मे।।'

से प्रार्थना करे। इसके बाद सर्वप्रथम नराधिप ( या बस्ती का कोई भी प्रधान पुरुष) और राजपरिवार और उनके पीछे नगर के नर नारी और हाथी, घोड़े आदि हर्षध्वनि के साथ जयघोष करते हुए प्रवेश करें और राजा यथास्थान स्थित होकर सौभाग्यवती स्त्रियों के द्वारा नीराजन करायें और हो सके तो रात्रि के समय बलि राजा का पूजन करके

' बलिराज नमस्तुभ्यं विरोचन सुतप्रभो।

भविष्येन्द्र सुराराते पूजेयं प्रतिगृह्यताम्।।'

से प्रार्थना करें। जिस समय बलि ने वामन भगवान के लिए तीन पग पृथ्वी के दान को पूर्ण करने के लिए आकाश और पाताल दो पग में मापकर तीसरे पग मे अपना मस्तक दिया। उस समय भगवान ने कहा था कि 'हे दानवीर! भविष्य में इसी प्रतिपदा को तेरा पूजन होगा और उत्सव मनाया जाएगा।' इसी कारण उस दिन बलि का पूजन किया जाता है और करना चाहिए।........ मार्गपाली और बलि की पूजा करने से और विशेषकर मार्गपाली की वंदनवार के नीचे होकर निकलने से उस वर्ष में सब प्रकार की सुख -शांति रहती है। और कई रोग दूर हो जाते हैं।

अनेक बार देंखने मे आता है कि मनुष्यों में जनपदनाशक महामारी और पशुओं में बिमारी होती है, तब देहात के अनक्षर और साक्षर सामूहिक रूप में सलाह करके सन, सूत, या खींप का बहुत लम्बा रस्सा बनवाकर उसमें नीम के पत्ते गूँथ देते हैं और बीच में 5 या 7 पाली नीचे ऊपर लगाकर उसको गाँव में प्रवेश करने की जगह बाँध देते हैं। ताकि उसके नीचे होकर निकलने वाले नर-नारी और पशु( गाय, भैंस, भेड़,बकरी आदि) रोगी नहीं होते। और सालभर प्रसन्न रहते हैं।

ज्योतिषाचार्य पं गणेश प्रसाद मिश्र लब्धस्वर्णपदक, ज्योतिष विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय

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