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15 सितम्बर से 28 सितम्बर तक पितृपक्ष पर विशेष, श्रद्धा के समर्पण का पर्व है श्राद्ध-ज्ञानेन्द्र रावत

पौराणिक मान्यतानुसार मृतात्मा तत्काल एक अतिवाहिक शरीर धारण कर लेती है। अन्त्येष्ठि क्रिया यानी शवदाह आदि संस्कार क्रिया से लेकर दस दिनों तक किये जाने वाले पिण्डदान से आत्मा दूसरी भोगदेह धारण करती है।

15 सितम्बर से 28 सितम्बर तक पितृपक्ष पर विशेष, श्रद्धा के समर्पण का पर्व है श्राद्ध-ज्ञानेन्द्र रावत
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आश्विन मास का कृष्ण पक्ष जिसे अंधियारा पाख भी कहा जाता है, पित्पक्ष के रूप में विख्यात है। यह पितरों के प्रति श्रद्धा के समर्पण के पर्व के नाम से जाना जाता है। पितरों के इस पक्ष में उनको जलांजलि देकर तथा मृत्युतिथि को सामथ्र्यानुसार श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करके पितृऋण चुकाया जाता है। हिन्दू धर्म संस्कृति में इस पक्ष का विशेष महत्व है। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है कि -'यं यं वापि भावं त्यजत्यंते कलेवरम्। तं तमेवैति कौन्तेयः सदातद्भाव भावितः।।' अर्थात जिस भाव को स्मरण करके मनुष्य शरीर को छोड़ता है, मृत्यु के अनन्तर उसी के अनुरूप गति हुआ करती है। कहा भी गया है-''प्राणस्तेत सायुक्तः सहात्मना यथा संकल्पितं लोकं नयति'' अर्थात सूक्ष्म शरीर, कारण शरीर एवं जीवात्मा चित्त में निहित संकल्पानुसार परलोक में गति को प्राप्त करता है। आदिकाल से यह धारणा बलवती रही है कि जबतक प्रेतत्व से मुक्ति नहीं मिलती, तबतक दूसरा जन्म नहीं होता। तात्पर्य यह कि जबतक स्वर्ग-नरक के भोग पूर्ण नहीं होते, मृतात्मा पुनःशरीर रूप धारण नहीं कर सकती। तबतक स्थूल शरीर को भिन्न-भिन्न रूप से अन्त्येष्ठि क्रिया करने के उपरांत भी एक सूक्ष्म शरीर धारण करना पड़ता है। इस अवस्था को पितर अवस्था कहा गया है। जबतक मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती, तबतक पुर्नजन्म और मृत्यु का क्रम निरंतर जारी रहता है। पौराणिक मान्यतानुसार मृतात्मा तत्काल एक अतिवाहिक शरीर धारण कर लेती है। अन्त्येष्ठि क्रिया यानी शवदाह आदि संस्कार क्रिया से लेकर दस दिनों तक किये जाने वाले पिण्डदान से आत्मा दूसरी भोगदेह धारण करती है। उसके पश्चात सपिंडीकरण के उपरांत वह तीसरा शरीर धारण करती है। यह शरीर कर्मों के अनुसार प्राप्त होता है।

उल्लेखनीय है कि अतिशय लोभी, भोगी, कृपण तथा जिनका तन-मन-धन सभी सांसारिकता में लीन रहता है, जो असमय जलकर, डूबकर, दुर्घटना अथवा आत्महत्या से मृत्यु को प्राप्त होते हैं या फिर वे जो कर्मभ्रष्ट होते हैं, उन्हें प्रेतत्व की प्राप्ति होती है। इन सभी अवस्थाओं से मुक्ति हेतु शास्त्रों में श्राद्ध का विधान है। श्रद्धा से श्राद्ध शब्द बना है और सच्ची श्रद्धापूर्वक किया गया कार्य ही श्राद्ध कहलाता है। कहा गया है कि-'अंगादंगात् सम्भचसि हृदयादधिजायते। आत्मासि पुत्रनामासि स जीव शरद्ःशतम्।।' अर्थात पुत्र पिता के अंग से अंग, हृदय से हृदय एवं आत्मा से आत्मा लेकर उत्पन्न होता है। अतः पुत्र द्वारा मनःशक्ति से श्रद्धाभाव सहित मंत्रोच्चारणों द्वारा किए जाने वाले श्राद्ध से माता-पिता या अन्य किसी का भी जिसका श्राद्ध किया जाता है, उसको प्रेतत्व से मुक्ति होकर सद्गति मिलती है। कूर्मपुराण में उल्लेख है कि पितर अपने पूर्व गृह यह जानने के लिए आते हैं कि उनके कुल परिवार के लोग उन्हें विस्मृत तो नहीं कर चुके हैं। यदि वे उन्हें श्राद्ध के माध्यम से इस पक्ष में याद नहीं करते तो उन्हें बहुत निराशा और दुख होता है। वे परिजन-संतान जो अपने परिश्रम और ईमानदारी से अर्जित धन से श्रद्धापूर्वक श्राद्ध को करते हैं, उनको पितर उन्हें दीर्घायु, यश, धन-धान्य, विद्या तथा विभिन्न प्रकार के समस्त सांसारिक सुखों का आर्शीवाद देकर प्रसन्नतापूर्वक अपने लोकों को प्रस्थान करते हैं।

विष्णुपुराण में कहा गया है कि जिनके पास न श्राद्ध करने की क्षमता है, न धन, न सामथ्र्य और न ही सामग्री, वह यदि भक्तिभाव से दोनों भुजाओं को साक्ष्यरूप में उपर उठाकर केवल जलांजलि देकर पितरों को प्रणाम करते हैं, वही पर्याप्त है। इससे ही पितर संतुष्ट हो जाते हैं। उनकी संतुष्टि के लिए श्रद्धा और भक्ति, सम्मान या आदरभाव ही पर्याप्त है। वर्तमान में आधुनिक विचारों वाले लोग इसे ढोंग, पाखंड व ढकोसला कहकर इसका उपहास उड़ाते हैं जबकि पश्चिमी देश, उनके वैज्ञानिक भी आज भूत-प्रेत व पितरों के अस्त्त्वि को स्वीकारते हैं। फ्रांस के डा. इयूजेन ओस्टली व कैमीले फलेमेरियोन, इटली के सीझट लोम्ब्रोस्वे तथा ब्रिटेन के सर आर्थर कानन डायल व सर विलियम बैरेट जैसे प्रख्यात विद्वानों व वैज्ञानिकों ने भी भूत-प्रेत व पितरों के अस्तित्व को स्वीकार कर इन्हें पितरों के सूक्ष्मशरीर यानी 'एक्टोप्लाज्मा' की संज्ञा दी है। 'लाइफ बियांड डेथ' नामक अपनी पुस्तक में स्वामी अभयानंद ने तो मृतात्माओं के चित्र भी दिये हैं जो इनके अस्त्त्वि के प्रमाण हैं।

मनु व याज्ञवल्कय जैसे महान मनीषी ऋषियों ने धर्मशास्त्र में नित्य व नैमित्तिक श्राद्धों की अनिवार्यता का उल्लेख किया है। उनके अनुसार-''पितृपक्ष भाद्रपदशुक्ल पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या तक का समय जिसमें पितरों का प्रभुत्व होता है, में श्राद्ध करने से कर्ता पितृऋण से मुक्त होता है, पितर संतुष्ट होते हैं और श्राद्धकर्ता को आयु, संतान, धन, स्वर्ग, राज्य, मोक्ष व अन्य सुख प्रदानकर उसका व उसके परिवार का कल्याण करते हैं। कहा भी गया है-'आयुः प्रजां धनं विद्यां स्वर्ग मोक्ष-सुखानि च। प्रयच्छति तथा राज्यं पितरः श्राद्धतर्पिता।।' योग वशिष्ठ में उल्लेख है कि मृत्योपरांत प्रेत यानी मरे हुए जीव अपने बंधु-बांधवों के पिण्डदान द्वारा ही अपना शरीर बना हुआ अनुभव करते हैं-'आदौमृता वयामिति बध्यन्ते तदनुक्रमात्। बंधु पिण्डादिदानेन प्रोत्पन्ना इति वेदिनः।।' अर्थात प्रेत अपनी स्थिति इस प्रकार अनुभव करते हैं कि मरने के बाद बंधु-बांधवों के पिण्डदान से हमारा नया शरीर बना है। स्पष्टतः यह अनुभूति ही भावनात्मक महत्व की परिचायक है जिसका सम्बंध पूरी तरह आत्मीयता से जुड़ा है।

यथार्थ में मरणोत्तर जीवन की अनुभूतियां वासना और संस्कारों के प्रभाव की ही प्रतिच्छाया होती हैं, इसलिए जिससे आत्मीयता का संस्कार अंकित हो, उसकी भावनाओं पर, लोकस्थ जीव प्रभावित होते हैं। कहा भी गया है कि मुक्त आत्माओं एवं पितरों के प्रति मनुष्य को वैसी ही श्रद्धाभाव रखना चाहिए जैसा देवों, प्रजापतियों तथा परमसत्ता के प्रति रहता है। गौरतलब है कि देवों, प्रजापतियों एवं ब्रह्म को तो मनुष्यों की किसी सहायता की आवश्यकता नहीं पड़ती, किंतु पितरों को ऐसी आवश्यकता पड़ती है। इसी को दृष्टिगत रखते हुए मनीषियों ने पितरपूजन एवं श्राद्धकर्म की परंपरायें प्रचलित कीं। याज्ञवल्कय स्मृति में शुक्लपक्ष यानी उत्तरायण में देवताओं और कृष्णपक्ष यानी दक्षिणायन में पितरों का प्रभुत्व होता है। आश्विन कृष्णपक्ष जिसमें पितर सर्वाधिक सक्रिय रहते हैं, दक्षिणायन का मध्य भाग होता हैं। अतः पूर्णिमा को देवताओं व अमावस्या को पितरों का श्राद्ध किया जाता है। कन्या राशिगत सूर्य में आश्विन मास के कृष्णपक्ष में मृत्युतिथि के दिन श्राद्ध करने से पितर संतुष्ठ होते हैं। इन श्राद्धों को ही कनागत के श्राद्ध के रूप में भी जाना जाता है। यह सच है कि श्राद्ध की मूल संकल्पना वैदिक दर्शन के कर्मवाद व पुर्नजन्मवाद पर आधारित है। यह सिलसिला उनकी मुक्ति तक लगातार जारी रहता है। इसलिए उनकी तृप्ति व संतुष्टि के लिए श्राद्ध आवश्यक है। इस पर्व पर हमें प्रार्थना करनी चाहिए कि यदि हमारे पूर्वज प्रतीक्षाकाल में हैं, तो उन्हें मोक्ष मिले और वह नया जीवन प्राप्त करें। इस रूप में श्राद्ध की प्रासंगिकता को नकारा नहीं जा सकता।

ज्ञानेन्द्र रावत, वरिष्ठ पत्रकार एवं पर्यावरणविद्अध्यक्ष, राष्ट्र्ीय पर्यावरण सुरक्षा समिति,

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