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1930 के दशक का यह गुरुद्वारा है, जब ब्रिटिश सेना के साथ सिख सिपाही गए थे

1930 के दशक का यह गुरुद्वारा है, जब ब्रिटिश सेना के साथ सिख सिपाही गए थे
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मनीला में एक गुरुद्वारा है खालसा दीवान। पूरे शहर को इसके बारे में पता है। समय बिल्कुल नहीं था फिर भी देख ही आया। इस गुरुद्वारा में बहुत ढूँढा कि कहीं इतिहास लिखा हो लेकिन नहीं मिला। आधी अधूरी बातें ही पता चलीं।

1930 के दशक का यह गुरुद्वारा है जब ब्रिटिश सेना के साथ सिख सिपाही गए थे। वे वहीं पर बस गए और यह गुरुद्वारा बनाया। काफी बड़ा गुरुद्वारा है। इसका लंगर मनीला के लोगों में भी प्रसिद्ध है। भारतीय छात्र कई बार यहाँ 'अपना खाना' खाने चले जाते हैं।




होता तो वैसे प्रसाद है। लंगर का हॉल काफी बड़ा है। मनीला के ग़रीब लोग भी लंगर में जाते हैं। कितना अच्छा होता कि गुरुद्वारा बनाने वाले एक एक शख़्स की तस्वीर होती, उनका ब्यौरा होता कि वे पंजाब में कहाँ से आए थे। कम से कम ब्रोशर जैसा कुछ। अद्भुत विरासत है।



अभी कमेंट में गुरतेज सिंह ने लिखा है कि ग़दर आंदोलन में 1912-13 में मनीला से भी सिख आए थे। शहीद बीबी गुलाब कौर और शहीद रहमत अली। हो सकता है कि तब यह गुरुद्वारा रहा हो। गुरुद्वारा साहिब मनीला गदर आंदोलन का एक केंद्र था।




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