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आप गणेश जी के बारे में यह जरूरी बातें नहीं जानते हो

आज हर व्यक्ति को गणेश जी के पदचिन्हों पर चलने की जरूरत है। शौर्य, साहस, प्रेरणा तथा नेतृत्व के प्रतीक प्रथम पूज्य गणेश जी की पूजा वर्तमान काल में स्वतंत्रता की रक्षा, राष्ट्रीय चेतना, भावनात्मक एकता और अखंडता की रक्षा के लिए भी की जाती और गणेश चतुर्थी के पर्व का उत्साहपूर्वक मनाने का अपना विशेष महत्व है।

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सत्यम सिंह बघेल

भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को सिद्धिविनायक भगवान गणेश जी का जन्म हुआ। गणेश जी न केवल भारतीय संस्कृति एवं जीवनशैली के कण-कण में व्याप्त हैं बल्कि विदेशों में भी घर-कार्यों-कार्यालयों एवं उत्पाद केंद्रों में विद्यमान हैं। हर तरफ गणेश ही गणेश छाए हुए हैं। वे भारत सहित सिन्ध और तिब्बत से लेकर जापान और श्रीलंका तक की संस्कृति में समाए हैं।

उन्होंने अपने व्यक्तित्व की विविध विशेषताओं से ही लोकनायक का पद प्राप्त किया। एक ओर वे राजनीति के ज्ञाता, तो दूसरी ओर वे दर्शन के प्रकांड पंडित माने गये। धार्मिक जगत में भी नेतृत्व करते हुए ज्ञान-कर्म-भक्ति का समन्वयवादी धर्म उन्होंने प्रवर्तित किया। प्रथम देव होने के साथ-साथ उनका व्यक्तित्व एवं कृतित्व बहुआयामी व बहुरंगी है, लोकनायक का चरित्र है। यानी वे विद्या, बुद्धि ज्ञान, यश, धर्म, दया, उदारता, शक्ति, आत्मसंयम, लक्ष्मी, वाणी, स्मृति, वकृत्व शक्ति, वैभव, आनंद, एवं शुभता के अधिष्ठाता देव हैं। अग्रपूज्य व रिद्धि-सिद्धि के प्रदाता हैं इसलिए वे सार्वभौमिक, सार्वकालिक एवं सार्वदैशिक लोकप्रियता वाले देव हैं। वे सात्विक देवता हैं और विघ्नहर्ता हैं। वे बुद्धिमत्ता, चातुर्य, युद्धनीति, आकर्षण, प्रेमभाव, गुरुत्व, सुख-दु:ख और न जाने क्या-क्या? एक भक्त के लिए गणेश भगवान तो हैं ही, साथ में वे जीवन जीने की कला भी सिखाते हैं।

गणेशजी की आकृति के आध्यात्मिक एवं प्रेरक संकेतों के रहस्य को यदि समझने का प्रयास किया जाए तो सनातन लाभ प्राप्त हो सकते हैं, जिससे हमें जीवन जीने की सकारात्मक प्रेरणा और ऊर्जा मिलती है। गणेशजी की संपूर्ण शारीरिक रचना में व्यापक सात्विकता, सार्थक अर्थ और प्रेरणा है। एक कुशल, न्यायप्रिय एवं सशक्त शासक एवं देव के समस्त गुण उनमें समाहित हैं। वे विवेकशील हैं। उनकी स्मरण शक्ति अत्यंत कुशाग्र है। उनकी शारीरिक प्रवृत्ति में प्रेरणा का उद्गम स्थान है। जहां धैर्य, विवेक, संयम, कर्म, चिंतन, गंभीर, शांत और स्थिर चेतना है। आर्थत इनकी शारीरिक रचना हमें जीवन की सही दिशा देती है।

शरीर-

भगवान गणेश जी तत्ववेत्ता के आदर्श रूप हैं। गण के नेता में गुरुता और गंभीरता होनी चाहिए। उनके स्थूल शरीर में वह गुरुता निहित है। उनका विशाल शरीर सदैव सतर्क रहने तथा सभी परिस्थितियों एवं कठिनाइयों का सामना करने के लिए तत्पर रहने की भी प्रेरणा देता है।

बड़ा मस्तक -

गणेश जी का मस्तक काफी बड़ा है। उनके मस्तिष्क से हमें प्रेरणा मिलती है कि हमें हमेशा बड़ी सोच रखना चाहिए। क्योंकि बड़ी सोच रखकर ही हम कामयाबी हासिल कर पाते हैं। दूसरी प्रेरणा यह है कि बड़ी सोच के साथ सबको साथ लेकर चलो। नेतृव के गुण पैदा करो और जिम्मेदारियां लेना सीखो।

छोटी आंखें-

गणपति की आंखें छोटी हैं। आर्थत उनकी आंखों से प्रेरणा मिलती है कि हर चीज का सूक्ष्मता से चिंतन, मनन और अध्ययन करना चाहिए तथा बहुत गहराई से सोच-विचारकर ही कोई निर्णय लेना चाहिए। लक्ष्य केंद्रित कर हर पहलू को बारिकी से देखना चाहिए। ऐसा करने वाला व्यक्ति कभी मात नहीं खाता। हमेशा सफल होता है।

आंखों से दूसरी प्रेरणा-

गणेश जी की आँखें अपेक्षाकृत बहुत छोटी हैं और यही वजह है कि उनका व्यक्तित्व रहस्यमयी है जिसे पढ़ एवं समझ पाना हर किसी के लिए संभव नहीं है। उनकी आंखें प्रेरणा देती हैं कि किसी भी स्थिति में वही व्यक्ति सफल होता है जिसके मनोभावों को पढ़ा और समझा न जा सके। जो दूसरों के मन को तो अच्छी तरह से पढ़ ले, परंतु उसके मन को कोई न समझ सके।

सूप जैसे लंबे कान-

गणेश जी के कान सूप जैसे बड़े हैं इसलिए इन्हें गजकर्ण एवं सूपकर्ण भी कहा जाता है। गणेश जी के सूप जैसे कानों से प्रेरणा मिलती है कि जैसे सूप बेकार चीजों को छांटकर अलग कर देता है उसी तरह आपके अंदर जो भी नकारात्मक आदतें या बुरी बातें हैं उन्हें छांटकर बाहर कर दें। बुरी बातों को अपने अंदर न आने दें। अपने आस-पास के वातावरण से चौकन्ना रहें और हमेशा अपनी बुद्धि और विवेक से निर्णय लें।

गणपति की सूंड-

गणेश जी की सूंड हमेशा हिलती डुलती रहती है जो उनके हर पल सक्रिय रहने का संकेत है। यह हमें प्रेरणा देती है कि जीवन में व्यक्ति को अपने कर्मों में, अपनी जिम्मेदारियों में सदैव सक्रिय रहना चाहिए। जो व्यक्ति ऐसा करता है उसे कभी दुखः और दरिद्रता का सामना नहीं करना पड़ता है।

बड़ा उदर-

गणेश जी का पेट बहुत बड़ा है, इसी कारण इन्हें लंबोदर भी कहा जाता है। दूसरों की बातों की गोपनीयता, बुराइयों, कमजोरियों को स्वयं में समाविष्ट कर लेने की शिक्षा देता है तथा सभी प्रकार की निंदा, आलोचना को अपने उदर में रखकर अपने कर्तव्य पथ पर अडिग रहने की प्रेरणा देता है।

एकदंत-

बाल्यकाल में भगवान गणेश का परशुराम जी से युद्ध हुआ था। इस युद्ध में परशुराम ने अपने फरसे से भगवान गणेश का एक दांत काट दिया। इस समय से ही गणेश जी एकदंत कहलाने लगे। गणेश जी ने अपने टूटे हुए दांत को लेखनी बना लिया और इससे पूरा महाभारत ग्रंथ लिख डाला। यह गणेश जी की बुद्धिमत्ता का परिचय है। गणेश जी अपने टूटे हुए दांत से यह सीख देते हैं कि चीजों का सदुपयोग किस प्रकार से किया जाना चाहिए। साथ ही किसी भी परिस्थिति को या घटना को अपनी कमजोरी नही बल्कि अपनी मजबूती बनाइये।

पैर-

गणेश जी के पैर छोटे हैं, जो कर्मेन्द्रिय के सूचक और सत्व गुणों के प्रतीक हैं। साथ यह भी प्रेरणा देते हैं कि व्यक्ति चाहे जितना ऊपर उठ जाए, चाहे जितनी सफलता हासिल कर ले, लेकिन उसके पैर हमेशा जमीन से जुड़े होने चाहिए।

वाहन-

मूषक गणपति का वाहन है, जो चंचलता एवं दूसरों की छिद्रान्वेषण की प्रवृत्ति को नियंत्रित करने का प्रेरक है। दरअसल, मूषक अत्यंत छोटा एवं क्षुद्र प्राणी है। इसे अपना वाहन बनाकर गणपति ने उसकी गरिमा को बढ़ाया है और यह संदेश दिया है कि हमें छोटे से छोटे व्यक्ति के प्रति भी सम्मान और स्नेहभाव रखना चाहिए।

आज हर व्यक्ति को गणेश जी के पदचिन्हों पर चलने की जरूरत है। शौर्य, साहस, प्रेरणा तथा नेतृत्व के प्रतीक प्रथम पूज्य गणेश जी की पूजा वर्तमान काल में स्वतंत्रता की रक्षा, राष्ट्रीय चेतना, भावनात्मक एकता और अखंडता की रक्षा के लिए भी की जाती और गणेश चतुर्थी के पर्व का उत्साहपूर्वक मनाने का अपना विशेष महत्व है।

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