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उर्दू विद्यालय की प्रधानाध्यापिका फातिमा ने पेश की एक ऐसी मिसाल

 Special News Coverage |  19 April 2016 2:06 PM GMT


छपरा संवाददाता धर्मेन्द्र कुमार रस्तोगी की खास रिपोर्ट-------
काम करो ऐसा की पहचान बन जाए,हर कदम ऐसे चलो की निशान बन जाए, जिंदगी तो सब काट लेते है दोस्तों,जिंदगी ऐसे जियो की मिसाल बन जाये।

जी हॉ कुछ ऐसा ही मिशाल पेश की है सरकारी स्‍कूल की एक शिक्षिका ने,दिन में बच्चो को दिया तालिम तो रात में कुबूल किया निकाह। पेश है छपरा से
ये जो गाँव की पगडण्डी पर संभले हुए कदमो से आगे बढ़ रही है। जिसके पाँव तेजी से अपने लक्ष्य की तरफ बढे जा रहे है। यह सारण जिला मुख्यालय से लगभग 40 किलो मीटर दूर स्थित लहलादपुर प्रखंड के लसकरी पुर उर्दू विद्यालय की प्रधानाध्यापिका ततहीर फातिमा है। यह स्कूल पहुंचती है और अपनी कुर्सी पर बैठ अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के बाद कक्षा में पहुँच बच्चों को पढ़ाना शुरू करती है। लेकिन गौर से देखिये इस शिक्षिका के हांथो पर चढ़े मेहँदी के रंग को, जी हाँ इस शिक्षिका की आज शादी है और इसने अपनी कार्य शैली के प्रति अपने समर्पण से समाज के सामने कार्य के प्रति अपने समर्पण का उत्कृष्ट नमूना पेश किया की है।



लहलादपुर प्रखंड की शिक्षिका ततहीर फातिमा ने शनिवार के दिन में विधालय के बच्चो को पढाया और रात में पटना के आलमगंज निवासी जाफर से निकाह कुबूल कर लिया,अपने कर्तव्‍य के प्रति समर्पण भाव रखने वाली ततहीर फातिमा के इस फैसले ने जिले ही नही राज्य भर में सरकारी विधालयों में कार्यरत शिक्षको के लिए एक उदाहरण प्रस्‍तूत किया है। जीवन के सबसे अहम पड़ाव की ओर जिस दिन कदम बढाने थे,उस दिन भी कर्तव्य की पूर्ति करने वाली फातिमा की प्रशंसा और चर्चा हर जगह हो रही है।


शैयद मोहम्मद ईमाम और शमां आरा की पुत्री ततहीर फातिमा सारण जिले के लहलादपुर प्रखंड के प्राथमिक विधालय लशकरीपुर उर्दू में प्रधानाध्यापिका के रूप में कार्यरत है,09 अप्रैल 2016 को उनकी शादी आलमगंज पटना निवासी शैयद मुशा अली रिजवी के पुत्र शैयद जफर अली रिजवी से हुआ। शादी को ले पूरे परिवार में गाना बजाना व सहनाइयां बज रहा था। परिजन शादी की तैयारी में जुटे हुए थे। सबको शाम के वक्‍त शादी की शहनाई के साथ साथ निकाह के कबूलनामे का इन्तजार था शादी के जश्न के इस अवसर पर ततहीर ने विधालय से छुट्टी नही ली है।

बकौल ततहीर शादी के लिए लम्बी छुट्टी पर जाना उन्‍हे पंसद नही है,उनका प्रथम कर्तव्‍य बच्चो को तालिम देना है,वे कहती है कि वह कुछ अलग नही कर रही है कयोकि सरकार ने उन्‍हे इसी काम के लिए नियूक्‍त किया है,जिसे वे बखूबी निभाना चाहती है।


अपने कार्य के प्रति समर्पण की वजह से भले ही ततहीर ये नही मानती है की उन्होने कुछ विशेष या अलग नमूना पेश किया है। परंतू आज के इस बदलते परिवेश में सरकारी विधालयों में कार्यरत शिक्षको की कार्यशैली किसी से छुपी हुई नही है। कई तो विधालय में "बारह बजे लेट नही दो बजे भेंट नही" के तर्ज पर शिक्षा के मंदिर पहूचते है,यह उनके लिए एक सबक है।


शादी के पॉच दिन पूर्व से प्रारम्भ हुई हलदी,रातजगा,मॉझा,मेंहंदी,आदी के रश्‍मो के साथ साथ निकाह के दिन भी विधालय में बच्चो को पढाना जैसे वसूलो से सभी ततहीर की प्रशंसा करते नही थक रहे है। इस मिशाल की चर्चा चारो तरफ हो रही है,हर कोई इसे सराह रहा है। स्थानीय ग्रामीणों का कहना है की अपने काम के प्रति सभी नौकरशाहो का समर्पण ऐसा ही रहे तो समाज बदल जाएगा।

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