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बुंदेलखंड में आत्महत्याओं व श्मशान में जलती ताज़ा चिताओं ने मुझे रुलाया- सूर्यप्रताप सिंह

 Special News Coverage |  8 Dec 2015 10:33 AM GMT

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लखनऊः बुंदेलखंड में आत्महत्याओं व श्मशान में जलती ताज़ा चिताओं ने मुझे रुलाया है। ये बात प्रदेश के चर्चित आईएएस सूर्यप्रताप सिंह ने अपनी बुंदेलखंड के भ्रमण के बाद की कहानी को अपने शब्दों में कुछ इस तरह द्रवित होकर कहा कि आज रात २.०० बजे ही लौटा बुंदेलखंड हूँ। बुंदेलखंड की हालत को देखकर वो काफी द्रवित दिखे।

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कुछ अपने शब्दों में इस तरह बयाँ की कहानी

"वे दिन काफूर हुए जब..पावस ऋतु के अन्तिम चरण से लेकर पूरे शरद ऋतु में महोबा (बुंदेलखंड) में आल्हा-गायन की गूंज सुनाई देती थी ..और लोग गाते फिरते थे.. 'जा दिन जनम लियो आल्हा ने, धरती धँसी अढ़ाई हाथ'..अब वो वीरता भूख व विप्पनता के आगे बेबश है ..गरीबी में जर्जर बृद्ध शरीर .. घर की रखवाली करते हैं और युवा काम की तलाश में दिल्ली..मुंबई को 'पलायन' कर चुके हैं...७०% लोग मौहावा से जा चुके हैं...वीरान सा लगती है.. आज ये वीर 'आल्हा-उदल' की कर्म भूमि..सूखे खेत-खलियान व कुआँ-बाबडी-तालाब-नल ...बृक्ष विहीन नंगे पहाड़..आत्महत्याएं... श्मशान में जलती ताज़ा चिताएं..हृदय फटता है ..क्या-२ बताऊँ। मरे हुए पशुओं के कंकाल और सूखे तालों..अवैध खनन व बारूद से छलनी पहाड़-नदियाँ का दृश्य आने वाले समय की विभिषीका का बोध कराता है।" आज मैंने भी गरीब की रोटी-चटनी चखी..आनंद आया..मन तो दुखी था ही !
ias suryaprtap singh

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