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गैर सरकारी आकड़े के अनुसार कुशीनगर में पैत्तीस हजार की संख्या में है तपेदिक रोगी

 Special News Coverage |  2015-11-15 08:56:29.0

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संजय चाणक्य
कुशीनगरः ‘ ज्यो-ज्यो दवा की मर्ज बढ़ता ही गया।’ यह फलसफा जिले में छह वर्षो से विश्व बैंक द्वारा संचालित किए जा रहे ‘डाट्स योजना’ पर पूरी तरह चरितार्थ हो रही है। इसे विडम्बना नही तो और क्या कहेगें कि डाॅंट्स प्रणाली लागू होने के बाद भी जिलें में क्षय रोगियों की संख्या घटने के बजाय साल दर साल बढ़ता ही जा रहा है। सरकारी आकडे़ं को ही माने तो जिले में पन्द्रह हजार से ज्यादें रोगी टीबी है जबकि गैर सरकारी संगठनों के मुताबिक कुशीगनर जनपद में तपेदियों रोगियों की संख्या पच्चीस हजार के आकेड़े को पार करने के करीब पहुंच गया है।



गौरतलब है कि टी.बी रोगियों के बेहतर उपचार के लिए विश्व बैंक द्वारा 24 मार्च 2005 को कुशीनगर जिले में ‘डाॅट्स योजना’ शुरू की गई। इसके लिए बकायदे जिले में कुल 33 (एमसी) माइक्रोंस्कोपी सेन्टर बनायें गए, जहां रोगियों के निःशुल्क बलगम जांच करने की व्यवस्था की गई। स्वास्थ्थ विभाग के मुताबिक प्रत्तेक माइक्रोसेन्टर पर एक चिकित्सक,एक फर्मासिस्ट, एवं एक प्रशिक्षित एलटी या एलए तैनात किए गए है, जो टी.बी रोगियों को चिन्हित कर बलगम की जांच करते है। विभाग की माने तो डाॅट्स प्रणली शुरू होने के बाद अब तक कुल 27750 टीबी से ग्रसित रोगियों को चिन्हित किया गया। इनमे से 17964 लोगों की बलगम जांच कर उनका उपचार किया गया है।


स्वास्थ्थ विभाग के वर्षवार आंकड़े पर गौर करे तो विश्व बैंक द्वारा डाॅट्स योजना शुरू करने बाद जनपद में तपेदिक के रोगियों की संख्या घटने के बजाये दिन-ब दिन बढ़ती ही जा रही है। कारण यह कि भोजन के अभाव में गरीब तबके के लोग ज्यादातर टीबी के चपेट में आ रहे है। कुशीनगर जिले में मुसहर बिरादरी के लोग लाचारी और जागरूकता की कमी के कारण सर्वाधिक संख्या में इस बीमारी के चपेट मे चपेट में है। हालाकि कि स्वास्थ्थ विभाग जनपद में अब तक कुल 27750 क्षय रोगियों का दावा कर रहा है जब कि गैर सरकारी संगठनों के हिसाब से जिले में टीवी से ग्रसित रोगियों की संख्या पच्चीस हजार की आकड़ा को पार करने जा रहा है। जिनका स्वास्थ्थ विभाग के पास कोई आकड़ा नही है। यहां बताना होगा कि स्वस्थ्थ विभाग के पास उन्ही रोगियों का आकड़ा है जो माइक्रोस्कोपी सेन्टर पर बलगम जांच के दौरान चिन्हित किए जाते है। जागरूकता के अभाव में जो लोग माइक्रोस्कोपी सेन्टर तक नही पहुंच पाते है वह न सिर्फ डाॅट्स् योजना के लाभ से वंचित रहते है बल्कि विभाग के आकड़े भी कही नही रहते है।
टीबी से प्रभावित होने वाले अंग


आम तौर पर सभी जानते है है कि टीबी मुख्यतः अस्सी फीसदी फेफड़ों को प्रभावित करती है। फेफडत्रों के अलावा यह रोग शरीर के किसी अंग में भी हो सकता है उदाहरण के तौर लसिका ग्रंथिया,हड्डिया,मस्तिष्क,गुर्दे ,मूत्राशय एवं जननांग आदि टीबी से प्रभावित हो सकता है। चिकित्साकों की राय माने तो टीवी छूआ-छूत का बीमारी नही हैटीबी रोगियों को छूने या उनके पास बैठने से यह रोग नही फैलता है।
वर्षवार चिन्हित किए गए टीबी रोगी

    वर्ष --------------- चिहिन्त रोगियों की संख्या -------------- बलगम जाचं


    2005 -------------------------------1444----------------------------793
    2006 ------------------------------ 1834----------------------------925
    2007 -------------------------------2188----------------------------1191
    2008 -------------------------------2264----------------------------1696
    2009 -------------------------------2927 ---------------------------1883
    2010 -------------------------------2972----------------------------2000
    2011 -------------------------------2943----------------------------1896
    2012 -------------------------------2922----------------------------1782
    2013 -------------------------------2712----------------------------1945
    2014 -------------------------------2867----------------------------2084
    2015 ;सितम्बरद्ध -------------------2677-----------------------------1789
    कुल योग----------------------------27750-----------------------------17964



    इंसर्ट




क्या है ‘ डाॅट्स’ ?
टीबी से ग्रसित रोगियों के पक्के इलाज का पक्का वादा है डाॅट्स प्रणाली। विश्व बैंक द्वारा संचालित ‘डाॅट्स’ बीमारी को लाइलाज होने से न सिर्फ बचाता है बल्कि नियमित रूप से दवा का सेवन करने से बीमारी को जडत्र से खत्म भी करता है। विश्व बैंक द्वारा संचालित यह महत्वकांक्षी परियोजना भारत सहित विश्व के लगभग डेढ सौ देशों में संचालित हो रही है। डाॅट्स प्रणली के तहत टीबी रोगियों के बलगम का निःशुलक जांच कर कोर्स भर की मुफ्त दवा प्रशिक्षित प्रोवाइडरों ‘स्वास्थ्थकर्ता’ की देख-रेख में खिलायी जाती है। ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि सही दवाई निश्चित मात्रा में निर्धारित समय में पूरी अवधि पर मरीजों को विशेष निगरानी में खिलायी जा सके। डाॅट्स परियोजना के तहत अगर कोई टीबी रोगी को कुछ दिनों के लिए कही बाहर जाना पड़े तो वह माइक्रोस्कोपी सेन्टर को सूचना कर देगा तो माइक्रोस्कोपी सेन्टर द्वारा निश्चित समय पर नियमित रूप से देश के किसी कोने से दवा उपलब्ध कराने का प्रवाधान भी विश्व बैंक द्वारा सुनिश्चित किया गया है। इसके पीछे स्वास्थ्थ विभाग का तर्क है कि टीबी रोगियों की दवा किसी भी सूरत में गैप नही होने पाये इसको दृष्टिगत रखते हुए ऐसी व्यवस्था की गई है।


टीबी क्या है?
टीबी ‘माइक्रोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस’ नामक जीवाणु से होने वाला रोग है। देश में हर साल बीस लाख से अधिक लोग टीबी से ग्रसित होते है और बेहतर उपचार के अभाव में हर तीन मिनट में एक व्यक्ति की मौत टीबी से होती है। जानकारों की माने तो टीबी का सही इलाज न होने पर फेफड़े का टीबी रोगी एक में तकरीबबन दस से पन्द्रह व्यक्तियों को टीबी के चपेट में ला सकता है।



टीबी के मुख्य लक्षण
ःः- तीन सप्ताह या अधिक समय से लगातार खासी आना।
ःः- खासी के साथ बलगम आना।
ःः- बुखार,विशेष रूप से शाम को बढ़ने वाला।
अन्य लक्षणःः- वजन घटना,भूख कम लगना,सीने में दर्द, बलगम के साथ खून आना।


कैसे फैलती है टीबी
जानकारों की माने तो फेफडे संबंधित टीबी रोगी ही यह रोग दूसरे लोगों में फैलाता है। क्योंकि फेफड़े के टीबी के रोगी के बलगम में टीबी के जीवाणु पाए जाते है। यह जीवाणु रोगी के खासने ,छीकने एवं थूकने से हवा में फैले जाते है सांस द्वारा स्वस्थ व्यक्तियों के फेफड़ों में पहुंचकर रोग को जन्म देते है।


क्या करे टीबी की रोकथाम के लिए...
ःः-रोगी की शीघ्र जांच व पूर्ण अवधि तक इलाज करवाना चाहिए।
ःः-रोगी खांसते अथवा छींकते समय मुंह पररूमाल या साफ कपड़ा रखें।
ःः-बलगम हमेशा ढक्कनदार डिब्बे में रखें,फिर इसें जला दे या जमीन में दफन कर दे।
ःः- टीबी का रोगी 6 से 8 माह के नियमित इलाज से पूरी तरह से स्वस्थ हो सकता है। इस लिए टीबी रोगी को यह सावधनी बरतनी चाहिए कि दवा बीच में न छूटे।

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