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दिल्ली के किसान-संसद में आये किसान संगठनों की केंद्रीय बजट पर प्रतिक्रिया

 Special News Coverage |  1 March 2016 4:04 PM GMT

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नई दिल्ली
'जय किसान आन्दोलन' द्वारा दिल्ली में आयोजित 'किसान संसद' में देश भर से आए किसानों ने केंद्रीय बजट को सर्वसम्मत्ति से खारिज किया और अपने 'वैकल्पिक कृषि बजट' के लिए संघर्ष करने का संकल्प लिया। दिल्ली के इण्डिया हैबिटैट सेंटर में आयोजित किसान-संसद में पंजाब, हिमाचल, जम्मू कश्मीर, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बुंदेलखंड, मराठवाड़ा, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, तमिल नाडु समेत देश भर से आये किसान प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया।


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केंद्रीय बजट से भारत के किसानों को बड़ी उम्मीद थी। देश में पिछले दो साल से लगातार पड़ रहे सूखे, बढ़ते किसान आत्महत्या और खेती में गिरते सकल घरेलू उत्पाद वृधि को देखते हुए दूरगामी विजन और बड़ी राहत सहायता की जरूरत थी। प्रधानमंत्री और सरकार की बातों से पिछले कुछ दिनों से यह इशारा भी मिल रहा था। लेकिन आज का बजट निराशाजनक ही है। यह अलग बात है कि इसे किसानों के हक में बताया जा रहा है लेकिन यह बजट किसानों के हक में दिखने की कवायद भर ही नजर आती है।

1. बजट भाषण में किसानों की 'आय सुरक्षा' की बात की गयी, कहा गया 5 साल में आय दुगुनी होगी। लेकिन इसके लिए कोई प्रावधान या प्रक्रिया नहीं बताया गया। 'जय किसान आंदोलन' की मांग रही है कि 'किसान आय आयोग' का गठन हो और 'आय गारंटी अधिनियम' लाया जाए।

2. जिस बजट को किसान के हक में बताया जा रहा है और कुल 35,984 करोड़ रुपये के आवंटन का हवाला दिया जा रहा है, सच्चाई में यह आंकड़ों का खेल है। फसल ऋण के व्याज पर सब्सिडी जो हर साल रेवेन्यू बजट में शामिल होता था, उसके 15,000 करोड़ इस बार कृषि मंत्रालय के बजट में शामिल कर दिया गया है। अगर व्याज सब्सिडी को अलग रखा जाए तो यह सिर्फ 20,984 करोड़ है। साल 2014-15 में कृषि डिपार्टमेंट का बजट 19,852 करोड़ था जिसे साल 2015-16 में घटा कर 17,004 कर दिया गया था, उसे ही फिर से बढ़ा दिया है। इस से साफ़ है की कुछ ख़ास बढौती इस बजट में बिलकुल नहीं! दरअसल पूरे बजट का मात्र 1.9% खेती के लिए रखा गया है जबकि देश की 55% जनता खेती पर निर्भर है और बहुत ही बुरे दौर से गुजर रही है।

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3. प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना का आवंटन दरअसल पिछले साल के 7,590 करोड़ से घटकर 5,767 करोड़ कर दिया गया है। और कहा गया है कि फसल बीमा के अंतर्गत अभी सिर्फ 20% आने वाले किसानों की संख्या को बढ़ा कर 50% किया जाएगा, दरअसल इसमें भी नए किसान नहीं जुड़ पाएंगे क्योंकि कि सारा पैसा पहले से बीमा धारक किसानों के लिए बीमा कंपनियों को उच्च प्रिमियम सब्सिडी के रूप में चला जाएगा।

4. अगले 5 साल में 28.5 लाख हेक्टेयर भूमि को सिंचाई व्यवस्था के अधीन ले आने का लक्ष्य स्वागत योग्य है। लेकिन यह कुल कृषि भूमि 141 मिलियन हेक्टेयर का 2% से भी कम होगा। केंद्र की ओर से प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना को सिर्फ 12000 करोड़ आवंटित किया गया है। साल 2014-15 में यह राशि 13,492 करोड़ था जिसमें से मात्र 5,630 करोड़ खर्च किया गया।

5. देश का 40% हिस्सा जब त्रासदी से गुजर रहा है तो मनरेगा में भी लगभग 60,000 करोड़ के बड़े अनुदान की जरूरत थी। लेकिन वास्तव में 38,500 करोड़ की राशि ही आवंटित है जो देखने में ज्यादा इसलिये लग रहा है क्योंकि पिछले दो साल में बहुत कटौती हुई है। दरअसल यह आवंटित राशि अब बढ़कर साल 2011-12 के 39,000 करोड़ के आवंटन के आसपास हुई है।

6. 15000 करोड़ के ब्याज सब्सिडी में पिछले साल के 12000 करोड़ से मामूली बढ़त की गई है।

7. किसानों की मांग रही है कि आपदा भरपाई को बढ़ा कर 10000 रूपये प्रति एकड़ किया जाए लेकिन 3000-4000 रुपये प्रति एकड़ के वर्तमान स्वरूप में कोई बढ़ोतरी नहीं की गई है।

8. वर्तमान में काश्तकार और बटाईदार बैंक लोन से वंचित रहते हैं। उनको लोन की व्यवस्था में शामिल करने की कोई व्यवस्था नहीं की गई है।

9. किसानों के लिए अधिक न्यूनतम समर्थन मूल्य, बाजार हस्तक्षेप स्कीम या बाजार स्थिरता कोष आदि में कोई आवंटन नहीं किया गया है।

10. वर्षा अधारित खेती जो बड़े संकट से गुजर रही है उसके लिए कोई विशेष व्यवस्था नहीं की गई है।

'किसान संघर्ष समिति' और 'जय किसान आंदोलन' से जुड़े डॉ. सुनीलम ने केंद्रीय बजट पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि 'खेती को लाभकारी बनाने या जैविक कृषि को बढ़ावा देने का कोई बजट प्रावधान नहीं किया गया है। सभी कृषि उत्पादों पर लागत मूल्य से डेढ़ गुना मूल्य पर खरीद या फसल नुकसान के मुआवज़े के लिए भी बजट आवंटन नहीं किया गया है। पंचायत स्तर पर अन्न भंडारण या बीज उत्पादन केंद्र की व्यवस्था नहीं की गई है। जीएम खाद्य पर रोक की भी कोई घोषणा नहीं हुई।'

वहीं किसान-संसद में आये 'रैयतू स्वराज्ये वेदिके' से किरण कुमार विस्सा का कहना है कि 'जब तेलंगाणा, कर्णाटाका से लेकर पंजाब तक किसानों की आत्महत्या की शृंखला चल रही है, केंद्र सरकार से एक बड़ी पैकेज की आशा थी लेकिन यह बजट बिलकुल निराशाजनक निकला। किसानों की आमदनी सुरक्षा की बात तो वित्त मंत्री ने की लेकिन उसको हासिल करने का कोई उम्मीद इस बजट से तो नहीं है। सबसे बड़ा धोखा है की सिर्फ आंकड़ों के खेल से सरकार ढोंग रचाया है कि ये किसानों की बजट है।"

'जय किसान आंदोलन' के राष्ट्रीय संयोजक योगेन्द्र यादव ने भी केंदीय बजट से निराशा व्यक्त करते हुए इसे "काम का नहीं, वादों का बजट" करार दिया। उन्होंने कहा कि प्रायश्चित करने का वादा तो कर रही है लेकिन अभी तक वो वादा बजट की राशि आवंटन में दिखाई नहीं देता। योगेंद्र यादव ने यह भी ध्यान दिलाया कि अगर इतना ही संकट व्यापार या उद्योग में होता तो सरकार इसके लिए क्या करती।

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