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23 दिसंबर 1949 की सुबह उजाला होने से पहले फैली यह बात, जानिये कैसे रातोंरात प्रकट हुई रामलला की मूर्ति

 Special Coverage News |  8 Nov 2019 4:24 AM GMT

23 दिसंबर 1949 की सुबह उजाला होने से पहले फैली यह बात, जानिये कैसे रातोंरात प्रकट हुई रामलला की मूर्ति

राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद यूं तो काफी पुराना है लेकिन जिस भूमि विवाद पर जल्द ही सुप्रीम कोर्ट का फैसला आना है. उस विवाद की शुरुआत 1949 में हुई थी जब 22/23 दिसंबर 1949 की रात मस्जिद के भीतरी हिस्से में रामलला की मूर्तियां रखी गईं. 23 दिसंबर को पुलिस ने मस्जिद में मूर्तियां रखने का मुकदमा दर्ज किया था, जिसके आधार पर 29 दिसंबर 1949 को मस्जिद कुर्क कर उस पर ताला लगा दिया गया था. कोर्ट ने तत्कालीन नगरपालिका अध्यक्ष प्रिय दत्त राम को इमारत का रिसीवर नियुक्त किया था और उन्हें ही मूर्तियों की पूजा आदि की जिम्मेदारी दे दी थी.

अयोध्या में उस दिन अलग ही था नजारा

23 दिसंबर 1949 की सुबह उजाला होने से पहले यह बात चारों तरफ जंगल की आग की तरह फैल गई कि 'जन्मभूमि' में भगवान राम प्रगट हुए हैं. राम भक्त उस सुबह अलग ही जोश में गोस्वामी तुलसीदास की चौपाई 'भये प्रगट कृपाला' गा रहे थे.

सुबह 7 बजे यूं हुई प्रशासन को खबर

सुबह 7 बजे के करीब अयोध्या थाने के तत्कालीन एस.एच.ओ. रामदेव दुबे रूटीन जांच के दौरान जब वहां पहुंचे तब तक वहां सैकड़ों लोगों की भीड़ इकट्ठा हो चुकी थी. रामभक्तों की यह भीड़ दोपहर तक बढ़कर करीब 5000 तक पहुंच गई . अयोध्या के आसपास के गांवों में भी यह बात पहुंच गई थी. जिस वजह से श्रद्धालुओं की भीड़ बालरूप में प्रकट हुए भगवान राम के दर्शन के लिए टूट पड़ी थी. पुलिस और प्रशासन इस घटना को देख हैरान था.

रामलला चबूतरा वाली मूर्ति ही पहुंची थी मस्जिद के अंदर

23 दिसंबर 1949 की सुबह बाबरी मस्जिद के मुख्य गुंबद के ठीक नीचे वाले कमरे में वही मूर्ति प्रकट हुई थी , जो कई दशकों या सदियों से राम चबूतरे पर विराजमान थी और जिनके लिए वहीं की सीता रसोई या कौशल्या रसोई में भोग बनता था. राम चबूतरा और सीता रसोई निर्मोही अखाड़ा के नियंत्रण में थे और उसी अखाड़े के साधु-संन्यासी वहां पूजा-पाठ आदि विधान करते थे.

एफआईआर में है पूरी घटना का जिक्र

पूर्व प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव ने अपनी किताब 'अयोध्याः 6 दिसंबर 1992' में उस एफआईआर का ब्यौरा दिया है, जो 23 दिसंबर 1949 की सुबह लिखी गई थी. एस.एच.ओ. रामदेव दुबे ने भारतीय दंड संहिता की धारा 147/448/295 के तहत एफआईआर दर्ज की थी. उसमें घटना का जिक्र करते हुए लिखा गया था, "रात में 50-60 लोग ताला तोड़कर और दीवार फांदकर मस्जिद में घुस गए और वहां उन्होंने श्री रामचंद्रजी की मूर्ति की स्थापना की. उन्होंने दीवार पर अंदर और बाहर गेरू और पीले रंग से 'सीताराम' आदि भी लिखा. उस समय ड्यूटी पर तैनात कांस्टेबल ने उन्हें ऐसा करने से मना किया लेकिन उन्होंने उसकी बात नहीं सुनी. वहां तैनात पीएसी को भी बुलाया गया, लेकिन उस समय तक वे मंदिर में प्रवेश कर चुके थे."

तत्कालीन जिलाधिकारी ने नहीं मानी थी पंडित नेहरू की बात

जब यह घटना घटी उस वक्त देश में पंडित जवाहर लाल नेहरू पीएम थे और गृह मंत्रालय लौहपुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल के पास था. वहीं यूपी में पंडित गोविंद वल्लभ पंत मुख्यमंत्री थे और गृह मंत्रालय लाल बहादुर शास्त्री संभाल रहे थे. देश और प्रदेश की सरकारों ने यह तय किया कि अयोध्या में पूर्व स्थिति बहाल की जाए. उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्य सचिव भगवान सहाय ने फैजाबाद के जिलाधिकारी और उप-आयुक्त के.के. नायर को लिखित आदेश दिया था कि अयोध्या में पूर्व स्थिति बहाल की जाए यानी रामलला की मूर्ति को मस्जिद से निकालकर फिर से राम चबूतरे पर रख दिया जाए. यह आदेश 23 दिसंबर 1949 को ही दोपहर ढाई बजे नायर तक पहुंचा दिया गया था. मुख्य सचिव का आदेश था कि इसके लिए बल प्रयोग भी करना पड़े तो संकोच न किया जाए. लेकिन के.के. नायर ने सरकार का आदेश मानने से इनकार कर दिया था.

नायर के जवाबों में उलझ गई सरकार

के.के. नायर ने मुख्य सचिव भगवान सहाय को जो जवाब भेजा उसमें बताया कि 'रामलला की मूर्तियों को गर्भगृह से निकालकर राम चबूतरे पर ले जाना संभव नहीं है. ऐसा करने से अयोध्या, फैजाबाद और आसपास के गांवों-कस्बों में कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ सकती है. जिला प्रशासन के अधिकारियों, यहां तक कि पुलिस वालों की जान की गारंटी भी नहीं दी जा सकती.' नायर ने सरकार को बताया कि 'अयोध्या में ऐसा पुजारी मिलना असंभव है जो विधिपूर्वक रामलला की मूर्तियों को गर्भ-गृह से हटाने को तैयार हो और इसके लिए अपने इहलोक के साथ-साथ परलोक को भी बिगाड़े. ऐसा करने से पुजारी का मोक्ष संकट में पड़ जाएगा और कोई भी पुजारी ऐसा करने को तैयार नहीं होगा.'

नायर के जवाब से असंतुष्ट उत्तर प्रदेश की पंत सरकार ने दोबारा आदेश दिया कि पुरानी स्थिति बहाल की जाए. जवाब में के.के. नायर ने 27 दिसंबर 1949 को दूसरी चिट्ठी लिखी. इसमें उन्होंने इस्तीफे की पेशकश की. साथ ही सरकार के लिए एक रास्ता भी सुझा दिया. नायर ने सरकार को सलाह दी कि विस्फोटक हालात को काबू में करने के लिए इस मसले को कोर्ट पर छोड़ा जा सकता है. कोर्ट का फैसला आने तक विवादित ढांचे के बाहर एक जालीनुमा गेट लगाया जा सकता है, जहां से श्रद्धालु रामलला के दर्शन तो कर सकें, लेकिन अंदर प्रवेश ना कर सकें. उन्होंने यह भु सुझाव दिया कि रामलला की नियमित पूजा और भोग लगाने के लिए नियुक्त पुजारियों की संख्या तीन से घटाकर एक की जा सकती है और विवादित ढांचे के आसपास सुरक्षा का घेरा सख्त कर उत्पातियों को वहां फटकने से रोका जा सकता है.

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