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सपा के बाद अब मोदी की नजर बसपा पर, टूट सकते हैं छह सांसद

 Special Coverage News |  22 Aug 2019 10:11 AM GMT  |  लखनऊ

सपा के बाद अब मोदी की नजर बसपा पर, टूट सकते हैं छह सांसद

राज्य मुख्यालय लखनऊ। साम्प्रदायिक सियासत का बोलबाला होने के बाद देश का सियासी परिदृश्य बदल गया है जो नेता या पार्टियाँ धर्मआधारित सियासत के खिलाफ चलती थी या चलते थे वह अब धर्मआधारित सियासत का चोला पहनने से नही हिचकिचा रहे है या रही है सियासी दलों में विचारधारा के कोई मायने नही रहे है सँपेरे की बीन के आगे सभी नाग नाच रहे है और सँपेरा नागों को अपने पिटारे में बंद किए जा रहा है। चाहे किसी भी दल की बात करो सबका यही हाल है। कांग्रेस , सपा , वाईएसआर कांग्रेस , टीआरएस , बीजू पटनायक वाला बीजू जनता दल , बिहार के सुशासन बाबू का जनता दल यू व बसपा सहित सभी दल किसी न किसी तरह सरकार के सामने लाचार खड़े दिखाई दे रहे है हाँ अगर आज तक कोई नेता या दल साम्प्रदायिकता आगे घुटने टेकता नज़र नही आया तो वह अकेला दल है राष्ट्रीय जनता दल यानी लालू प्रसाद यादव नही सबका बहुत बुरा हाल है या यूँ कहे कि वो सब जनता के सामने जो दिखते है या दिखाने कोशिश करते है वह सब उनका ड्रामा है।

असल में वह भी कही न कही साम्प्रदायिकता को पंसद करते है बस दिखाई नही देना चाहते है उसी का परिणाम है कि आज मोदी की भाजपा जो चाह रही है वही कर रही है चाहे संविधान उस काम को कह रहा है या नही कोई कुछ बोलने की हिम्मत नही कर रहा और अगर कोई कर रहा है तो उसके पीछे सरकारी तोतों को लगा दिया जा रहा है सीबीआई और ईडी इन्कम टैक्स।एक-एक कर सभी दलों को तोडकर अपनी पार्टी में शामिल किया जा रहा है अब बसपा प्रमुख मायावती की मुश्किलें बढऩे वाली हैं। उप्र में उपचुनाव के लिए 12 सीटों पर अपने प्रत्याशी अकेले उतारने की घोषणा के बाद मोदी की भारतीय जनता पार्टी इस नीति पर काम कर रही है कि कैसे बसपा का मनोबल तोड़ा जाए। पिछले लोकसभा चुनाव में एक भी सीट न जीत पाने वाली बसपा मुसलमानों की वजह से मायावती इस बार लोकसभा में सपा के साथ गठबंधन कर अपने दस सांसद जिता लेने में कामयाब रही।इससे उनका मनोबल बढ़ा हुआ है। शायद यही वजह है मायावती ने सपा कंपनी से अपने गठबंधन को तोड़कर अलग चुनाव लडऩे की घोषणा की है। बसपा पहली बार उप चुनाव में उतरने जा रही है। यूपी में 12 सीटों पर उपचुनाव होने हैं।

सपा कंपनी के बाद अब बसपा में तोडफ़ोड़ की कवायद मोदी की भारतीय जनता पार्टी ने लोकसभा में पूर्ण बहुमत के बाद तेज कर दी है।राज्यसभा में बहुमत पाने के लिए सबसे पहले तेलगू देशम पार्टी के राज्यसभा सांसदों को तोडऩे का काम किया। इसके बाद उसकी नजर सपा कंपनी के सांसदों पर रही। सपा कंपनी के तीन राज्यसभा सांसद मोदी की भाजपा ने तोड़ लिए।उसमें समाजवाद के सबसे बड़े अलंबरदार माने जाने वाले पूर्व प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर के पुत्र नीरज शेखर ने साम्प्रदायिक चोला पहन लिया है और मोदी की भाजपा से राज्यसभा सांसद चुने भी जा चुके हैं। मोदी की भाजपा की नजर अब उप्र में प्रमुख विपक्षी दल बसपा पर है। 2019 में उप्र से जीते बसपा के सांसद 1.अफजाल अंसारी-गाजीपुर 2.कुंवर दानिश अली-अमरोहा 3.हाजी फजलुर्रहमान-सहारनपुर 4.संगीता आजाद-लालगंज 5.गिरीश चंद-नगीना 6.मलूक नागर-बिजनौर 7.राम शिरोमणि-श्रावस्ती 8.श्याम सिंह यादव-जौनपुर 9.रितेश पांडेय-अंबेडकरनगर 10.अतुल कुमार-घोसी शामिल है। उच्च सूत्रों के हवाले से कहा गया है कि मोदी की भाजपा के अध्यक्ष और पार्टी के स्वयंभू चाणक्य के निर्देश पर बसपा में भी संभावनाएं तलाशी जा रही हैं। माना जा रहा है कि बसपा में तोडफ़ोड़ की कवायद की जिम्मेदारी पश्चिमी उप्र के एक सांसद को सौंपी गयी है। यह सांसद बसपा सुप्रीमो से नाखुश चल रहे हैं।

ओबीसी से आने वाले इस सांसद को जिम्मा दिया गया है कि वह बसपा के कम से कम छह सासंदों को तोडकऱ मोदी की भाजपा में शामिल कराएं। 10 में से 6 सांसदों के टूट जाने पर पार्टी में दल बदल का कानून भी नहीं लागू होगा। मोदी की भाजपा का मानना है कि मायावती और उनकी पार्टी का मनोबल तोडऩे के लिए बसपा में भी टूट जरूरी है। वैसे भी सांसदों को लग रहा है कि अगले पांच साल तक तो उन्हें कोई बड़ा लाभ बसपा में रहते हुए नहीं मिलने वाला। इसलिए वह भी दल बदल को तैयार हो सकते हैं। बसपा से जीतने वाले सांसदों में से तीन तो मुस्लिम हैं जिनका टूटना मुश्किल माना जा रहा है इनके बसपा से दलबदल करने की उम्मीद बेहद कम है। बाकी बचे 7 सांसदों में से कम से कम छह को तोडऩे की कवायद की जा रही है।

हालांकि मायावती को इसकी भनक लग चुकी है और वह अपने सांसदों पर कड़ी नजर रख रही हैं।असल में बसपा सुप्रीमो की गलत नीतियाँ ही बसपा को नुक़सान पहुँचा रही है अगर वह अपने रूख में थोड़ा बदलाव करे तो मनुवादियो के दुष्प्रचार से जो नुक़सान हो रहा है उससे बचा जा सकता है लेकिन मायावती अपनी नीति में बदलाव करने को तैयार नही है जिसकी वजह से मान्यवर कांसीराम के मिशन को नुक़सान हो रहा है और मनुवादी अपनी रणनीति में सफल हो रहे है।बसपा में जो संभावित टूट को देखा जा रहा है उसमें मनुवादी ख़ून ज़्यादा होगा ऐसी ही संभावना व्यक्त की जा रही है तीनों मुसलमान सांसद नही टूटेंगे ऐसा सियासी लोगों का मानना है।

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