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राजनाथ जीतेंगे या टूटेगा बीजेपी का 28 साल का तिलिस्म? मगर अब समझाइए कि कैसे!

वोटों का जातीय विश्लेषण और मौजूदा माहौल लगभग तय कर चुका है पूनम की जीत

 अश्वनी कुमार श्रीवास्त� |  5 May 2019 3:39 AM GMT  |  दिल्ली

राजनाथ जीतेंगे या टूटेगा बीजेपी का 28 साल का तिलिस्म? मगर अब समझाइए कि कैसे!
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कुल साढ़े 19 लाख के आसपास मतदाता हैं, लखनऊ में ...यह खुद चुनाव आयोग का आंकड़ा है। इसके अलावा, जातीय आंकड़े मैंने जो लिए हैं, वे पुराने लोकसभा चुनावों से लेकर अभी इस वक्त के चुनाव में छप रही खबरों से लिये हैं।

जातीय आंकड़े बताते हैं, मीडिया रिपोर्ट के हिसाब से कि लखनऊ में चार से पांच लाख कायस्थ, इतने ही मुसलमान (जिसमें सुन्नी मतदाता 60-65 परसेंट और बाकी शिया), 3 से 4 लाख दलित पिछड़ा, एक लाख सिंधी और बाकी के 5-6 लाख में ब्राह्मण, बनिया, भूमिहार, राजपूत, सिख आदि आदि होंगे। अब मीडिया रिपोर्ट लगातार यही आंकड़े जारी करती रही हैं और इस चुनाव व पिछले सभी चुनाव में यही आंकड़े इस सीट के लिए छपते रहे हैं।

फिर पिछली बार की मोदी लहर यानी 2014 के चुनाव में लगभग 55 फीसदी मतदान हुआ था। यानी मान लीजिए कि 11 लाख लोगों ने वोट डाला था। उसमें से राजनाथ को अकेले 5 लाख 80 हजार वोट मिल गए थे मोदी जी की कृपा से। यानी सारा हिन्दू (दलित और पिछड़ा भी बड़ी तादाद में) राजनाथ के पास आ गया था। अब इसे इस बार दो वजहों से घटा लीजिये।

पहली यह कि मोदी लहर नहीं है इसलिए दलित पिछड़ा की घर वापसी हो जाएगी। दूसरी यह कि एन्टी इनकंबेंसी नाम की चिड़िया कुछ न कुछ वोट तो राजनाथ से उड़ा ही ले जाएगी। जीएसटी, नोटबन्दी आदि से कुछ तो वोटर परेशान ही हुआ होगा। यानी राजनाथ महोदय घट कर पांच लाख भी पहुंच सकते हैं...चार लाख भी आ सकते हैं। मेरा अनुमान है कि चार लाख से नीचे आ जाएंगे।

फिर आइये पूनम सिन्हा पर। पिछली बार सपा और बसपा का अलग अलग वोट सवा लाख से ज्यादा था। इस बार घर वापसी वाला 50 हजार से एक लाख वोट आएगा गठबंधन में। यानी दो से ढाई लाख वोट मिला पूनम सिन्हा को। फिर मुस्लिमों में सुन्नी वोट डेढ़ से दो लाख यानी पूरा का पूरा (उनके टोटल ढाई से तीन लाख का 55 परसेंट ही जोड़ रहा हूँ) मिलेगा पूनम को।

यानी पूनम के पास हुए साढ़े तीन से चार लाख वोट। इसमें अगर ढाई पौने तीन लाख कायस्थ वोट (चार से पांच लाख का 55 फीसदी ही जोड़ रहा हूँ) का महज 25 से 50 प्रतिशत यानी एक से डेढ़ लाख ही मिला लीजिए तो हुआ राजनाथ के चार से पांच लाख के मुकाबले लगभग बराबर या थोड़ा ज्यादा वोट।

लेकिन चूंकि यह कायस्थ वोट राजनाथ का ही वोट था पिछली बार तो राजनाथ के चार से पांच लाख में एक से डेढ़ लाख कायस्थ वोट घट भी जाएगा। जाहिर है, फिर राजनाथ तीन से चार लाख पर आ जाएंगे और पूनम सिन्हा चार से पांच लाख पर आ जाएंगी। अर्थात महज कायस्थों के वोट के इतने ही उलटफेर पर पूनम जीत जाएंगी।

अब अगर यह मान लें कि कहीं कोई बड़ा उलटफेर हो गया तो पूनम सिन्हा के वोट में कायस्थ वोट 50 प्रतिशत से ज्यादा भी जुड़ सकता है या सिंधी वोट का 50 हजार भी मिला या शिया वोट का 25 से 50 परसेंट भी यानी लाख पचास हजार भी आया...तो राजनाथ का डिब्बा गुल तो होगा ही और पूनम जीत जाएंगी...लेकिन हैरत वाली बात यह होगी कि ऐसी स्थिति में पूनम की जीत बहुत भारी अंतर से होगी।

रहे प्रमोद कृष्णन, तो लड़ाई छोड़िए, वह चर्चा में ही इसलिए नहीं हैं क्योंकि किसी भी सूरत में वह महज शिया वोट ही घसीट पाएंगे। सपा बसपा का दलित पिछड़ा वोट हो या सुन्नी वोट हो या फिर भाजपा का ब्राह्मण कायस्थ राजपूत बनिया सिंधी वोट हो, कृष्णन इनमें से कोई वोट इतनी संख्या में नहीं घसीट पाएंगे कि उससे चुनाव में कोई असर आये।

हां, शिया वोट वह चाहें तो पूरा लाख डेढ़ लाख भी घसीट लें या 25-50 हजार घसीट लें। पूरा शिया वोट भी ले जाएंगे तो भी पूनम सिन्हा का पलड़ा इसलिए भारी है क्योंकि उन्हें कायस्थ वोट और सिंधी वोट जितना भी मिलेगा, उतना ही राजनाथ के पिछले वोट से घटेगा भी। यानी राजनाथ का ग्राफ हर तरफ से चार लाख से नीचे ही आता दिख रहा है जबकि पूनम सिन्हा का ग्राफ हर तरफ से चार लाख से ऊपर जाता दिख रहा है।

अब इसका अध्ययन करके बताइये कि मैं कहाँ गलत जोड़ घटा रहा हूँ। और राजनाथ जीतेंगे तो कौन सी गणित से जीतेंगे?

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