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आरक्षण कोई विशेषाधिकार नहीं है - दिलीप सी मंडल

 Special Coverage News |  14 April 2019 10:36 AM GMT  |  दिल्ली

आरक्षण कोई विशेषाधिकार नहीं है  - दिलीप सी मंडल
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उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में 'फोरम फॉर क्रिटिकल एंड प्रोग्रेसिव थिंकिंग' के तत्वाधान में "उच्च न्यायालय, उच्चतम न्यायलय तथा निजी क्षेत्र में में प्रतिनिधित्त्व और आरक्षण: जाति जनगणना की मत्त्वपूर्ण ज़रूरत" के विषय पर कैफ़ी आज़मी अकादमी (निशातगंज, लखनऊ) में सारगर्भित चर्चा हुई. इस चर्चा में लगभग सभी राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि, सामाजिक विचारक, चिंतक तथा समाज के विभिन्न क्षेत्रों में काम करने वाले कार्यकता शामिल हुए. इस परिचर्चा में समाज के प्रबुद्ध श्रोताओं ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज की. चर्चा में सामाजिक न्याय तथा इससे जुड़े तमाम मुद्दों पर विस्तृत चर्चा हुई जिसमे देश, समाज, न्यायपालिका, विधायिका इत्यादि की भूमिका पर विभिन्न पक्ष रखे गए.

कार्यक्रम का संचालन अब्दुल हफीज़ गाँधी ने किया. मुख्य वक्ताओं में अपने निम्नलिखित पक्ष रखे. समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता अब्दुल हफीज गांधी ने कहा कि विविधता संविधान की मूल संरचना होनी चाहिए। सरकार के निर्णय लेने वाले संस्थानों में सभी समुदायों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व होना चाहिए। सार्वजनिक और निजी सभी संस्थानों में सभी की भागीदारी समाज के समग्र विकास के लिए होनी चाहिए।

वरिष्ठ पत्रकार दिलीप सी मंडल ने कहा है कि, "आरक्षण कोई विशेषाधिकार नहीं है बल्कि अपरोक्ष रूप से जो विशेषधिकार कुछ जातियों को मिलते रहे हैं उन्हें संतुलित करने की दिशा में उठाया गया क़दम है. न्यायपालिका के आरक्षण की मांग लम्बे वक़्त से उठती रही है. बिहार में एक दौर ऐसा था जब जातीय हिंसा ने ज़ोर पकड़ा. उसके बाद सजा देने के मामले में कोर्ट के रवैये को लेकर कई सवाल खड़े हुए. दो दशकों के लम्बे संघर्ष के बाद वहां न्यायपालिका में आरक्षण लागू हुआ. आज फिर से एक बार कुछ एकतरफा फैसलों ने इस ओर इशारा किया है. सवाल यही है कि बगैर पक्षपातपूर्ण रवैये से निजात पाना क्या संभव है? "

मेराज अहमद आज़ाद ने कहा है कि "सभी लोकतांत्रिक और संवैधानिक संस्थानों में विविधता को बनाए रखना ज़रूरी है। राज्य संस्थानों में बेहतर प्रतिनिधित्व समाज, लोकतंत्र को मजबूत करेगा, और समाज के समग्र विकास को सुनिश्चित करेगा "।

पसमांदा मुस्लिम महाज के प्रदेश अध्यक्ष नाहीदा अकील ने कहा कि पिछड़ा और दलित मुसलमानों को, लोकप्रिय रूप से पसमांदा कहा जाता है, उन्हें उचित प्रतिनिधित्व दिया जाना चाहिए। पसमांदा मुस्लिम की पहचान अल्पसंख्यक शब्द की आड़ में छिपाई नहीं जा सकती। "

प्रोफेसर खालिद अनीस अंसारी ने कहा है कि, " नव-उदारवादी नीति तथा न्यायालय के सामाजिक न्याय से सम्ब्नधित कुछ फैसलों के कारण जन हस्तक्षेप ज़रूरी हो गया है. उच्च न्यायालय में विविधता के सिद्धांत को स्थापित करने कि ज़रूरत है जिससे कि संविधान के आर्टिकल १६(४) को पूर्ण रूप से लागू किया जा सके. निजी क्षेत्र में भी प्रतिनिधित्तव कोटा के माध्यम से लागू किया जाना चाहिए. इस सन्दर्भ में कास्ट सेन्सस बहुत ज़रूरी हो जाता है. यहाँ ये ज़रूरी है कि राजनीतिक इक्षाशक्ति निर्णायक होगी "

सहायक प्रोफेसर रविकांत ने कहा है कि, "लोकतंत्र की सफलता न्यायपालिका की लोकतांत्रिक संरचना पर निर्भर करती है। कॉलेजियम प्रणाली को लोकतांत्रिक संस्था नहीं कहा जा सकता है। यह भी आवश्यक है कि जाति जनगणना को जारी किया जाना चाहिए ताकि आरक्षण के मुद्दे को बेहतर तरीके से समझा जा सके। इससे राज्य संस्थानों में सुधार सुनिश्चित होगा। " प्रोफेसर मंज़ूर अली ने कहा है कि, "सुप्रीम कोर्ट ब्राह्मणवाद को बचाने के लिए अंतिम उपाय है। सर्वोच्च न्यायालय सर्वोच्च है, लेकिन अचूक नहीं है "।

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