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इविवि दीक्षांत समारोह में बोले नोबेल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी कुलपति हांगलू ऊर्जा से भरे व्यक्ति

इविवि दीक्षांत समारोह में बोले नोबेल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी कुलपति हांगलू ऊर्जा से भरे व्यक्ति
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शशांक मिश्रा

शिक्षक दिवस के अवसर पर इलाहाबाद विश्वविद्यालय में आयोजित दीक्षांत समारोह में बोलते हुए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित कैलाश सत्यार्थी ने इविवि के कुलपति प्रो रतन लाल हांगलू को ऊर्जा से भरा व्यक्ति कहा। उन्होंने कहा कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय में आज 22 साल बाद आपमें से कई लोगों को यह दिन देखने का अवसर मिल रहा है, कई को पहली बार देखने को मिल रहा है।

मुझे इस बात कि बेहद खुशी है कि आज इलाहाबाद विश्वविद्यालय में जितनी बेटियों को मेडल मिला उसने साबित कर दिया कि बेटियां किसी से कम नहीं है। मैं सबको बधाई देता हूँ जिन्हें डिग्री मिली। आज आपका एक संकल्प पूरा हुआ और आपके लिए एक नए संकल्प का भी दिन है। अब आपके कंधे पर विश्वविद्यालय का प्रतिनिधित्व करने की बड़ी जिम्मेदारी आ गई है।

मैं यहां आकर गर्व का भाव महसूस कर रहा हूँ। सबसे पहले मैं यहां आकर शहीद चंद्रशेखर आज़ाद की प्रतिमा का दर्शन करने गया। क्योंकि किसी को अगर सच में देश के लिए सर्वस्व समर्पण करने की प्रेरणा लेनी है तो उसे चन्द्रशेखर आज़ाद की प्रतिमा पर जाकर, उनके चरण पर शीश झुकाना चाहिए।

कैलाश सत्यार्थी ने सन 1995 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अपनी पुरानी यात्रा का भी जिक्र किया।उन्होंने कहा कि रीवा से चलकर यहां आने वाले शहीद लाल पद्मधर से भी छात्रों को प्रेरणा लेनी चाहिए। युवाओं को उनसे प्रेरणा लेनी चाहिए जिन्होंने अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय को ऑक्सफ़ोर्ड ऑफ ईस्ट कहा जाता है ।मैं वहाँ व्याख्यान देने गया हूँ और मैंने वहां के सीनेट हाल में भी व्याख्यान दिया है। पर मेरा मानना है कि ऑक्सफ़ोर्ड में बैठे हुए लोग कहें कि हम इलाहाबाद विश्वविद्यालय हैं, न कि आप कहें कि हम ऑक्सफ़ोर्ड ऑफ ईस्ट हैं।

मैं चाहता हूं कि आपका यह सीनेट हाल उससे भी बड़ी गरिमा हासिल करें ।और मुझे विश्वास है कि आप सब ऐसा कर लेंगे।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय ने देश के लिए प्रधानमंत्री तो दिए ही पड़ोसी देश के लिए भी प्रधानमंत्री दिए हैं। आपकी एक बड़ी समृद्ध विरासत है।

शिक्षा, प्रशासन और विज्ञान के क्षेत्र में इस विश्वविद्यालय ने महती भूमिका निभाई है।

आज जिन जिन के हाथ मे डिग्री है, मैडल है, मैं उन सबसे कहना चाहता हूँ कि आप युवा ऊर्जा से भरे हुए अग्नि पुंज है। यह अग्नि सकारात्मक से भरी होनी चाहिए। जब तक आप अपना अहम , अपना अहंकार नहीं छोड़ेंगे तब तक आप राष्ट्र निर्माण ने कुछ योगदान नहीं दे सकते।

आज शिक्षक दिवस भी है। समाज में जो अंधरा है। उसे शिक्षक ही दूर कर सकता है। शिक्षक को तो माँ के समान होना चाहिए । उसे प्रसव पीड़ा से गुजर कर सृजन करना होता है। जैसे शिशु गर्भ में हाथ पैर मारता है, वैसे ही कई बार कुछ छात्र भी शिक्षक को परेशान करते हैं, तंग करते हैं। शिक्षक को दर्द सहकर निर्माण करना होता है। जिस शिक्षक में धौर्य नहीं होगा, वह इस ज्ञान के मार्ग पर नहीं चल सकेगा। गुरु में मातृत्व भाव होना चाहिए। जैसे माँ की करुणा हर हाल में शिशु के साथ होती है।



आपके सामने सफलता और असफलता के सुलभ और दुर्गम दोनों मार्ग हैं। आपको यह मार्ग चुनना होगा। अपने आप को विस्तार देना होगा। संकुचित होना मौत की निशानी है और विस्तार ही जीवन है।

मेरे माँ बाप चाहते थे कि मैं इंजीनियर बनूँ पर मैं जयप्रकाश नारायण जी के आंदोलन में शामिल होने के करण अपनी डिग्री लेने नहीं जा पाया।पर आज आपको डिग्री दे रहा हूँ तो मुझे अच्छा भी लग रहा है।

आप हमेशा अपने दिल की आवाज़ सुने। दुनिया इन दिनों बहुत फैल रही है। हम 4g की पीढ़ी में हैं। आज जब डिजिटल वर्ल्ड में जीना चाहते हैं। हम स्पेस में जा रहे हैं पर आपस का स्पेस सिकुड़ रहा है। दुनिया मे गरीबों की संख्या निरंतर बढ़ रही है। हम इस बात पर परेशान है कि अगले 20 साल में पानी का क्या होगा, क्या साफ हवा मिलेगी हमें , क्या वृक्ष बचेंगे। आपके सामने अब अपना जीवन बचाने की नहीं बल्कि सृष्टि बचाने की चुनौती है।




हम छोटी छोटी दायरों में उलझ कर अपनी असीमित ऊर्जा बर्बाद कर देते हैं। दूसरों को धक्का देने में लगे रहते हैं।

दुनिया में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जगह लेता जा रहा है। हम रोबॉट पर निर्भर होते जा रहे हैं। क्या अगले 30 साल बाद आम छात्र शिक्षक पर निर्भर रहेंगे या फिर वे तकनीक का सहारा लेंगे ।

आज हार्ट ट्रांसप्लेनेट डॉक्टर के बजाय रोबोट से करवाया का रहा है। मानव की भूमिक सीमित होती जा रहा है।

शायद भविष्य में क्लास रूम में शिक्षक की जरूरत न पड़े ।

करुणा का विस्तार करो : हमें करुणा किसी से उधार नहीं लेना है। यह तो हमारे अंदर ही है। चतेना ओर करुणा दोनों जरूरी है

चेतना का विस्तार तो हो रहा है पर करुणा का महत्व कम होता जा रहा है। दुनिया मे जितने भी धर्म पैदा हुए, जितनी भी सामाजिक क्रांति हुई, जितने भी बड़े बदलवाव हुए उसके पीछे बुद्धि नहीं करुणा है।

नौजवान जिस वक्त सवाल उठाना बंद कर दे वह समाज रुक जाता है। पर सवाल उठा कर, हल्ला मचाकर, आग लगा कर भाग जाने से बदवाल नहीं होता। सवाल जब मन मे आये तो उसके समाधान का हिस्सा भी आपको बनाना चाहिए।

क्रोध या आवेश एक ऊर्जा है।

जब सूरज सबसे ज्यादा गर्म होता है, जब तेज हवा चलती है, जब समुंदर में तेज तूफान उठते हैं तभी बिजली पैदा होती है, तभी पवन चक्की चलती है। संघर्ष और रचना साथ साथ चलती है।।

मैं भी एक समय नेता बनने के चक्कर मे था। पर मैं जल्द ही नेताओं का पाखंड समझ गया।

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