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कैराना उपचुनाव: बीजेपी के लिए ये सीट खतरे में जानते हो क्यों?

सभी विपक्षी पार्टियों के लामबंद होने से कैराना लोकसभा चुनाव भी बीजेपी के हाथ से निकल जाएगा.

 शिव कुमार मिश्र |  2018-05-07 10:15:19.0  |  शामली

कैराना उपचुनाव: बीजेपी के लिए ये सीट खतरे में जानते हो क्यों?

यूपी के कैराना संसदीय क्षेत्र और नूरपुर विधान सभा सीट पर 28 मई को होने वाले उप चुनाव के लिए सत्ताधारी बीजेपी और एकजुट विपक्ष ने कमर कस ली है. राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी समाजवादी पार्टी (सपा) ने अपनी चहेती उम्मीदवार तबस्सुम हसन को राष्ट्रीय लोक दल (रालोद) के टिकट पर कैराना से उतारा है, जबकि नूरपुर से सपा नेता नईमुल हसन उम्मीदवार बनाए गए हैं.

गठबंधन से पहले सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव और रालोद उपाध्यक्ष जयंत चौधरी के बीच शुक्रवार को बैठक हुई और सहमति बनी. इस गठबंधन को मायावती की बसपा का भी समर्थन प्राप्त है जबकि माना जा रहा है कि कांग्रेस भी गठबंधन उम्मीदवार को समर्थन करेगी. ऐसी सूरत में गठबंधन प्रत्याशी तबस्सुम हसन की जीत की संभावना बढ़ गई है क्योंकि पिछले लोकसभा की बात करें तो 2014 में बीजेपी के हुकुम सिंह को यहां करीब 50 फीसदी यानी 5.65 लाख वोट मिले थे. सपा के नाहिद हसन को 29.49 फीसदी (कुल 3.29 लाख), बसपा के कुंवर हसन को 14.33 फीसदी (कुल 1.60 लाख) और रालोद के करतार सिंह बढ़ाना को 3.81 फीसदी (कुल 42,706) वोट मिले थे. कैराना सीट बीजेपी सांसद हुकुम सिंह के निधन से खाली हुई है.


अगर इन तीनों वोटों को इकट्ठा ही कर देते है तो मुकाबला आमने सामने का हो जाता है लेकिन उस चुनाव में इस क्षेत्र में कुछ हवा और थी. विरोधियों की हालत बहुत पतली थी. अब चूँकि स्व हुकुम सिंह की बेटी के चुनाव लड़ने की उम्मीद है इसलिए उनके साथ सहानुभूति वोट भी बढ़ेगा लेकिन जाट वोट और मुस्लिम वोट इकट्ठा हुआ तो चुनाव बीजेपी के लिए मुश्किल ही नहीं नामुमकिन हो जाएगा.


साल 2014 में सपा, बसपा और रालोद तीनों ने अपने-अपने उम्मीदवार उतारे थे. हुकुम सिंह बीजेपी के पुराने और दबंग गुर्जर नेता थे, इस इलाके में गुर्जरों-जाटों की अच्छी आबादी है. साल 2014 में मोदी लहर भी थी. इस वजह से गुर्जरों के अलावा कई अन्य पिछड़ी जातियों ने भी हुकुम सिंह को वोट दिया था. अब चूंकि न तो हुकुम सिंह जीवित हैं और न ही पीएम मोदी की पहले जैसी लहर है, लिहाजा, माना जा रहा है कि बीजेपी के लिए राह बहुत मुश्किल हो सकती है.


उधर, बदले सियासी समीकरण में सपा, बसपा और रालोद अब एकसाथ हैं. इसलिए दलित, अल्पसंख्यक, जाट और अन्य पिछड़ी जातियों के वोटर्स लामबंद हो सकते हैं। अगर ऐसे जातीय समीकरण रहे तो बीजेपी के हाथ से इस साल तीसरी लोकसभा सीट भी छिन सकती है. सामाजिक समीकरण साध कर सपा गोरखपुर और फूलपुर संसदीय सीट बीजेपी की झोली से छीन चुकी है. उसी कहानी को कैराना में भी दोहराना चाह रही है. विपक्ष पूरी तरह से प्रदेश में 2019 लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी को कोई सीट जीतने नहीं देना चाहता है. ताकि कोई बीजेपी के पक्ष में अच्छा संदेश जाय.


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