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भाजपा ने तो कायस्थों को टिकट देने से लेकर मंत्री पद देने तक बरती कोताही, अब उठे विरोध

 अश्वनी कुमार श्रीवास्त� |  12 Oct 2018 6:14 AM GMT  |  दिल्ली

भाजपा ने तो कायस्थों को टिकट देने से लेकर मंत्री पद देने तक बरती कोताही, अब उठे विरोध

कायस्थों का एक बेहद मजबूत धड़ा अब जाकर सही राजनीतिक कदम उठाता नजर आ रहा है। वरना जातिवादी समूह बनाकर किसी भी राजनीतिक दल या नेता को अपनी शर्तों पर समर्थन देकर आगे बढ़ रहीं तमाम अन्य जातियों के मुकाबले कायस्थों ने भाजपा को बिना शर्त समर्थन देते रहकर खुद को तकरीबन राजनीतिक रूप से खत्म ही कर लिया है।


पहले कांग्रेस फिर भाजपा को लगभग शत प्रतिशत वोट देने वाले कायस्थ कांग्रेस और भाजपा, दोनों में ही नाममात्र के लिए सरकार के अहम पदों पर बिठाये जाते रहे हैं। भाजपा ने तो कायस्थों को टिकट देने से लेकर उन्हें मंत्री बनाने या अन्य अहम पद देने तक इस कदर उपेक्षित किया है कि मुझे आश्चर्य होता है कि उसके बाद भी कायस्थ आखिर क्यों भाजपा का ही गुणगान करते हैं। देश को पहला राष्ट्रपति, दूसरा प्रधानमंत्री, दशकों तक ढेरों मुख्यमंत्री या आजाद भारत में पहली क्रांति करके सत्ता पलट कर देने वाले नेता देने वाली कायस्थ बिरादरी का कब्जा आजादी के बहुत समय बाद तक भी सरकारी नौकरियों के पदों पर आधे से भी ज्यादा का था। जबकि आज हालात ये हैं कि कायस्थ न सिर्फ राजनीति बल्कि सरकारी नौकरी से भी तेजी से घटते जा रहे हैं।


आरक्षण की समर्थक पार्टियों या नेताओं से कायस्थ अभी तक इसलिए दूर रहते आये हैं क्योंकि आरक्षण की मार का असर कलम-दवात की पूजा करने और खुद को चित्रगुप्त का वंशज मानने वाली इसी जाति पर सबसे ज्यादा हुआ है। चाहे हजारों बरस पहले से चले आ रहे राजाओं-महाराजाओं का दौर रहा हो या फिर मुगलों-अंग्रेजों का...या फिर आज का लोकतंत्र... भारत में कायस्थ ही हमेशा अहम शासकीय पदों से लेकर गांव-कस्बे के सरकारी पदों पर काबिज होकर शासन-प्रशासन संभालते आये हैं। लेकिन आरक्षण लागू होते ही कायस्थ अब समाज में अपनी इस ताकतवर भूमिका से दूर होते जा रहे हैं।


मगर आरक्षण अब वह सच्चाई है, जिसे कायस्थों को स्वीकारना होगा और उसका विरोध करने की बजाय उसके साथ जीने और आगे बढ़ने की आदत डालनी होगी। जाहिर है, आरक्षण अगर किसी भी तरीके से हटाया जा सकता या फिर कम किया जा सकता था तो कम से कम भाजपा इसे प्रचंड बहुमत के अपने इस स्वर्णिम काल में जरूर कर देती। लेकिन ऐसा होना अब सम्भव नहीं है और इसकी झूठी आस लेकर भाजपा का पिछलग्गू बनना भी कायस्थों के लिए आत्मघाती ही साबित हो रहा है।


भाजपा कायस्थों से वोट लेकर उनके लिए कुछ भी करने को तैयार नहीं है जबकि इससे पहले यूपी के विधानसभा चुनाव में इस बार बसपा और सपा ने कायस्थों को खासी अहमियत दी थी। बसपा ने तो अकेले लखनऊ में ही कायस्थ बाहुल्य सीटों पर तीन-चार कायस्थों को टिकट दिया था। मगर कायस्थ हमेशा की तरह भाजपा के पिछलग्गू बने रहे।


बनारस में भी पिछली बार के विधानसभा चुनाव में भाजपा द्वारा कायस्थों के सम्मानित नेता का टिकट काटे जाने से उपजी नाराजगी और विपक्ष में कायस्थ उम्मीदवार के खड़े हो जाने से खुद नरेंद्र मोदी को आखिरी के तीन दिन वहां रुक कर स्वर्गीय लाल बहादुर शास्त्री जी के स्मारक जाकर व कायस्थ संगठनों के जरिये अपील व दौरे करने पड़ गए थे।


कायस्थ तब नरेंद्र मोदी व भाजपा के झांसे में आ गए। इसका नतीजा जो होना था, वही हुआ। आज भाजपा के राज में कायस्थ हाशिये पर हैं। अगर उपेक्षा का यही आलम रहा तो वह दिन भी ज्यादा दूर नहीं, जब कायस्थों को भाजपा भी नहीं पूछेगी। इसलिये बेहतर यही होगा कि आज यूपी में तो कम से कम कायस्थों को उसी दल या नेता को चुनना चाहिये, जो कायस्थों के हित की बात करे। फिर चाहे वह अखिलेश हों, राहुल हों या फिर मायावती हों।

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