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अबे, लग रहा है सब पागलखाने से छूट कर भागे हैं!

पता नहीं कौन कवि लिखा था कि आवाज़ भी एक जगह है!

अबे, लग रहा है सब पागलखाने से छूट कर भागे हैं!
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अभिषेक श्रीवास्तव

कल एक मित्र ने फोन किया। लंबे समय बाद। बोले, "आपकी तो आदत है यार गप और टाइमपास करने की, फिर भी बताइए नया क्या कर रहे हैं। लोग तो मिल नहीं रहे, न आप चट पा रहे हैं न चाटने का मौका है, फिर खाली वक़्त को कैसे भर रहे हैं?" सवाल सुनकर कुरकुरे के विज्ञापन का सूत्र वाक्य याद आ गया। सवाल टेढ़ा था, पर आदमी मेरा था। उसका दिल दुखाना भी ठीक नहीं था। मैंने उसे एक नुस्खा दिया: "फेसबुक पर जितने भी वीडियो आपके दोस्त पोस्ट करें, सबको म्यूट कर के देखिए। आवाज़ बंद रहे, केवल चेहरे की भंगिमाओं और हिलते होंठ पर ध्यान लगाइए। कुछ फील हो, तो पलट कर बताइए।"

मित्र दो कदम आगे निकल गए। न केवल मित्रों के ज्ञान वाले वीडियो या फेसबुक लाइव, बल्कि समाचार चैनल के एंकरों को भी उन्होंने म्यूट कर के दिन भर देखा। आधी रात उनका संदेश आया: "अबे, लग रहा है सब पागलखाने से छूट कर भागे हैं! पूरी दुनिया पागल टाइप लग रही है। और कुछ बताओ गुरु!" मैंने दूसरे चरण में प्रवेश का जो नुस्खा उन्हें बताया है, यहां सार्वजनिक कर रहा हूं: बाहर सब्ज़ी, दूध आदि खरीदने निकलें तो खुद को म्यूट कर लें। सामने वाला जो कुछ बोले, केवल सुनें, चेहरे के भाव से संप्रेषण करें, मुंह न खोलें। घर लौट कर कैसा फील हुआ, उस पर सोचें।

वास्तविक दृश्यों में ध्वनियों को सुनना, आभासी दृश्यों में ध्वनियों को देखना, दोनों जगह ज़बान बंद रखना, यही सूत्र है। हमारे पास पांच इन्द्रियां हैं, छठवीं अतीन्द्रिय है। डॉक्टर ने नहीं कहा है कि सारी इन्द्रियों को हर वक़्त काम पर लगाए रखो। आभासी दुनिया में अतिसक्रिय और दूरदर्शन प्रेमी मित्रों को बिना सुने सिर्फ देखना, इस बात से आश्वस्त करता है कि आपकी कोई बस नहीं छूट रही है। आजादी के आंदोलन में कूद पड़ने जैसा लोभ संवरण करने में इससे आसानी होती है। बाहर चौराहे पर सिर्फ लोगों को सुनना इस बात से आश्वस्त करता है कि भौतिक दूरी या निकटता महज आवाज़ का मसला है, उससे सामाजिकता का ह्रास नहीं होता। पता नहीं कौन कवि लिखा था कि आवाज़ भी एक जगह है!

अगर आप वाकई घर बैठे किसी ग्लानि या हीन ग्रंथि से जूझ रहे हैं, तो ये दोनों अभ्यास करने के कुछ दिन बाद शायद आपको लगने लगे कि आपकी निष्क्रियता और दूसरों की सक्रियता के बीच खास फर्क नहीं है। हो सकता है आपको दूसरे की सक्रियता पर हंसी आवे, अपनी निष्क्रियता पर सुख मिले। ये भी संभव है कि आपको वाकई अपनी निष्क्रियता पर भयंकर ग्लानि होने लगे। उसके बाद आप जिस कर्म या अकर्म में जुटेंगे, वह स्थिति सच्ची होगी, जेनुइन। अगर आप स्वभाव से अलहदी हैं, तो कर्म और अकर्म से पार जाकर शॉर्ट टर्म मोक्ष को प्राप्त हो सकेंगे। प्रत्येक स्थिति में न्यूनतम एक ज्ञान तो ज़रूर हो जाएगा, कि इस धरती को आपकी ज़रूरत न थी, न है। आप बस हैं। आने के लिए कोई टेंडर नहीं भरा था। जाने की भी मुनादी करने की कोई ज़रूरत नहीं है।

#CoronaDiaries

Shiv Kumar Mishra
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