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पृथ्वी का सबसे नजदीकी तारा अल्फा सेंटोरी विस्फ़ोट से नष्ट हो जाये तो हमें यहां इसका पता 4 बरस 3 महीने बाद लगेगा

 अश्वनी कुमार श्रीवास्त� |  8 Jan 2019 3:45 AM GMT  |  दिल्ली

पृथ्वी का सबसे नजदीकी तारा अल्फा सेंटोरी विस्फ़ोट से नष्ट हो जाये तो हमें यहां इसका पता 4 बरस 3 महीने बाद लगेगा

यह जो असीमित आकाश और असंख्य तारे टिमटिमाते हुए हम देखते हैं, यह दरअसल वर्तमान नहीं है। बल्कि हम इस क्षण से पहले के पलों को अर्थात इस सृष्टि के इतिहास को अभी देख रहे हैं। वर्तमान में सृष्टि कैसी है, यह हमसे सैकड़ों/हजारों/करोड़ों/अरबों/खरबों साल बाद ही यहां धरती पर कोई देख पायेगा।

पृथ्वी पर जीवन देने वाला खुद हमारा तारा यानी सूरज भी हमें 8 मिनट पहले का ही नजर आता है। हमारे सौरमंडल से बाहर का सबसे नजदीकी तारा अल्फा सेंटोरी भी 4 बरस 3 माह पहले जैसा था, वैसा इसे हम आज देख रहे हैं। यानी इस ब्रह्मांड में हमें नजर आने वाले असंख्य तारे कम से कम 4 साल 3 माह से लेकर अरबों-खरबों साल पहले जैसे हुआ करते थे, वैसे हमें आज नजर आ रहे हैं। आज यह कैसे हैं...हैं भी या नहीं हैं...इसका पता धरती पर रहने वाले इंसानों को कम से कम 4 साल 3 महीने से लेकर अरबों/खरबों बरस बाद ही लग पायेगा।

इसे ऐसे समझिए कि यदि सूरज पर यदि अचानक रोशनी गुल हो जाये तो हम इसे यहां धरती पर रहकर 8 मिनट बाद ही जान पाएंगे, जब यहां भी उसी वक्त अचानक अंधेरा छा जाएगा। जबकि पृथ्वी का सबसे नजदीकी तारा अल्फा सेंटोरी यदि अचानक विस्फ़ोट से नष्ट हो जाये तो हमें यहां इसका पता 4 बरस 3 महीने बाद ही लगेगा।

इसलिए क्या यह सम्भव नहीं है कि 4 साल 3 महीने की समय दूरी वाले अल्फा सेंटोरी से लेकर सैकड़ों/हजारों/लाखों/अरबों/खरबों बरस समय दूरी वाले जिन तारों को हम इस वक्त आकाश में टिमटिमाते हुए देख रहे हों, शायद इनमें से ज्यादातर अब वजूद में ही न हों या ठंडे होकर अंधियारे गोले में बदल गए हों।

इस असीमित सृष्टि और अनंत ब्रह्मांड में इंसान कितना निरीह और नगण्य है...इंसान तो इस सृष्टि के वर्तमान तक को नहीं देख पाता और अरबों/खरबों बरस पहले की दुनिया को आज देख पा रहा है...तो भला कैसे इसे बनाने वाले रचयिता यानी ईश्वर को देख/सुन/समझ या उसकी कल्पना भी कर पायेगा!!

जिस ईश्वर को समय से भी परे बताया गया है, उस ईश्वर की धरती पर रहने वाला वह तुच्छ इंसान कल्पना भी कैसे कर पायेगा, जो समय के सामने इतना बेबस है कि वर्तमान देखने के लिए भी जरूरी अरबों-खरबों बरस की समय दूरी में से महज 100 बरस ही उसके पास हैं।

पहले तो सृष्टि में ज्ञात अभी तक सबसे तेज रफ्तार से चलने वाली लाइट की स्पीड पकड़ पाना ही किसी और पदार्थ के लिए सम्भव नहीं है क्योंकि आईन्स्टीन की थ्योरी के मुताबिक ऐसा करते ही कोई भी पदार्थ खुद भी एटम्स में बदलकर खंड-खंड हो जाएगा।

और एक बार को अगर मान भी लें कि हम किसी न किसी तरह से कभी भविष्य में लाइट की स्पीड से चल कर ब्रह्मांड की सैर करने भी लगेंगे तो भी अपने जीवनकाल यानी 100 बरस में हम ब्रह्मांड में शायद उतना ही चल पाएंगे, जितना कि एक चींटी अपने एक कदम में पृथ्वी पर चल पाती होगी।

मैंने अभी हाल ही में एक अंग्रेजी टीवी कार्यक्रम में एक किरदार को दूसरे से यह कहते हुए सुना कि जल्दी जल्दी अपनी बात पूरी करो और बेकार समय नष्ट न करो...क्योंकि समय हम दोनों समेत सारी सृष्टि को मारने वाला है। इसी बात में इस सृष्टि का वह सत्य उजागर हो रहा है, जिसे जानकर गौतम बुद्ध ने कभी अपने प्रिय शिष्य आनंद से कहा था कि ईश्वर के विषय में जानने की कोशिश इंसान के लिए उसी तरह से निरर्थक है, जिस तरह से किसी तीर से घायल होकर मरणासन्न पड़े किसी व्यक्ति के लिए अपनी जान बचाने के उपाय करने की बजाय तीर किसने चलाया, यह जानने की उत्सुकता दिखाना निरर्थक है। क्योंकि हर वह इंसान से जो दुनिया में आ गया है, उसके पास से भी तीर से घायल व्यक्ति की ही तरह समय तेजी से निकल रहा है।

उसे दुनिया में लाने वाला कौन है, कैसा है, कहाँ है, क्यों है...आदि सवाल पूछने और उन्हें जानने में इंसान अपनी जिंदगी गंवाए दे रहा है जबकि उसके पास समय का वैसे भी अभाव है। बुद्ध के अनुसार, जिस तरह तीर से घायल व्यक्ति को अपने जीवन को बचाने के लिए उपचार पर ध्यान देना चाहिए, उसी तरह इंसानों को भी जीवन किस तरह जीना है, इस पर ध्यान देना चाहिए। क्योंकि अंत समय में यदि हम सत्य जान भी गए तो भी जीवन व्यर्थ गंवाने की गलती तो हमसे हो ही जाएगी। इसी वजह से बुद्ध हमेशा ईश्वर के होने या न होने, दोनों पर ही मौन रहे और जीवन जीने के तरीके ही दुनिया को बताते रहे।

बहरहाल, ईश्वर की बनाई इस सृष्टि में ईश्वर ने हमें समय के ऐसे मायाजाल में फंसाया है, जिसे तोड़ पाना हमारे लिए फिलहाल तो असम्भव ही नजर आ रहा है। वैज्ञानिक लगातार इस कोशिश में हैं कि पहले तो किसी तरह लाइट की स्पीड से चलने की कुव्व्वत पैदा की जाए ताकि इंसान अपने सौरमंडल यानी सूरज की बसाई हमारी दुनिया से तो बाहर जाकर किसी और तारे की बसाई हुई दुनिया में झांक आये। जबकि बुद्ध की नजर में इस कवायद को तीर से घायल उसी मरणासन्न व्यक्ति की निरर्थक कवायद जैसा ही माना जायेगा...जिसके पास एक तो वैसे ही समय का अभाव है...और उस पर वह इसे निरर्थक सवालों में उलझ कर और गंवाए दे रहा है।

लेकिन विज्ञान साधु/संत, योगी-ध्यानी या पीर-पैगम्बर की किसी बात को भला क्यों माने...उसे तो हर सवाल का जवाब चाहिए। भले ही उसे भी यह पता हो कि अरबों/खरबों बरस दूर बैठे जिन तारों की टिमटिमाहट से आकर्षित होकर वह उधर जाने की कोशिश कर रहा है, वहां का सफर शुरू करते ही किसी पतंगे की तरह उसे शुरुआत में ही दम तोड़ देना है...

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