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सत्तू की तासीर.... भूजे की नफासत.... और चाय की चुस्की

नून मरीचा संग खाने पर उसका स्वाद अद्भुत होता है... मगर मुझ अमावस की नजर पूनम को लग गई... सूई डोरा... सूई डोरा... दो चार बार उचार देने मात्र से उन दिनों नजर उतर भी जाती थी...

 Shiv Kumar Mishra |  6 Jun 2020 5:06 AM GMT  |  दिल्ली

सत्तू की तासीर.... भूजे की नफासत.... और चाय की चुस्की
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विजय शंकर पाण्डेय

लॉकडाउन की शुरुआत में जो सबसे बड़ी दिक्कत थी, वह यह भूजा की दुकान बंद होना.... वैसे इसे दुकान कहना तकनीकी तौर पर गलत है मेरी समझ से.... यह मूल तौर पर पूर्वांचल के गांवों के गोसार का सिटी एडिशन है.... जहां ताजा अनाज भूज कर कस्टमर को मिर्च की चटनी संग गरमागरम थमाया जाता है.... उम्दा सत्तू भी यहां सहज सुलभ है... यहां के मिर्च की चटनी भी चटकदार होती है... मगर वह उतनी लजीज नहीं, जितनी मीरा के हाथ बनी चटनी होती थी...

मीरा मेरी मौसी थी... मेरी मां की कजिन... लेकिन मेरी हम उम्र... या यूं कह लीजिए कुछ छोटी ही होगी... एक मेरे हम उम्र मेरे मामा भी हैं... कृष्णदेव मिश्र... लेकिन वे कुछ महीने ही बड़े होंगे... वे भी मेरी मां के कजिन ही थे.... मेरे ननिहाल का कुनबा कुछ ज्यादा ही हट्ठा कट्ठा था.... खांटी दीयर वाला... लगभग चार दशक के अंतराल पर पिछले दिनों कृष्णदेव मामा से हावड़ा प्रवास के दौरान मुलाकात हुई... वे पश्चिम बंगाल में ही कल्याणी इलाके में रहते हैं... मिले तो वह कृष्णदेव नदारद थे... जो बचपन में होते थे... खुरापात में उन दिनों उन के नाम का डंका बजता था... मगर लगा जिम्मेदारियों ने उन्हें कुछ ज्यादा ही गंभीर और समय से पहले बुजुर्ग बना दिया... इसलिए पहचान तो गए हम एक दूसरे को, मगर सहसा यकीन नहीं हो रहा था... वे जरा झेपते भी नजर आए

मैं एक तो नाती/भगीना, ऊपर से बहरवासु... वह भी कलकतिया.... इसलिए ननिहाल में भौकाल जरा ज्यादा ही टाइट था मेरा... समर वैकेशन में या अन्य मौके पर ननिहाल (कोट मझरिया, बलिया) पहुंचने पर हम तीनों साथ साथ ही खेलते कूदते थे... दिन में खेत में ताजा खोटे गए चने का साग खाने का एक अलग ही मजा था... उसके संग नमक मिर्च की चटनी.... हम सब तब प्राइमरी के स्टूडेंट होंगे... मगर गांव की आम लड़कियों की तरह तभी मीरा की गृहस्थी की ट्रेनिंग शुरू हो गई थी... सो वह चटनी की व्यवस्था कर ही निकलती थी.... साग खोटने में भी वह माहिर थी... एक दो बार मैं खुद कोशिश किया तो पता चला कि पौधा ही बेढ़ब ढंग से उखाड़ लिया... मीरा का ज्ञान सुनने को मिला... तहरा कुछ अइबो करेला बीजे शंकर... चुपचाप खड़ा रह... असल में पौधे के अतिनाजुक हिस्से को बड़ी नजाकत के साथ निकाला जाता है... नून मरीचा संग खाने पर उसका स्वाद अद्भुत होता है... मगर मुझ अमावस की नजर पूनम को लग गई... सूई डोरा... सूई डोरा... दो चार बार उचार देने मात्र से उन दिनों नजर उतर भी जाती थी...

तब लोग नदी और नहरों का पानी सीधे पी लेते थे... बिना किसी हिचक के... इंफेक्शन की डर था ही नहीं... मेरे पैतृक गांव (बसुधरपार, बलिया) पर भी लोग कुएं का ही पानी पीते थे... हां, हावड़ा में इंडस्ट्री ज्यादा होने के चलते प्रदूषण था... इसलिए टाइम कल (नगर निगम की आपूर्ति) का पानी पीते थे... जिसे आम लोग दाल गलाने वाला पानी कहते थे... और नमक बोरे वाला... जो मवेशियों के लिए भी प्रयोग में लाया जाता था... वही लोग खाते थे... न न मेरी जानकारी में तो कोई घेघा या गलगंड का शिकार नहीं हुआ... यहां तक कि कलकत्ता में भी यही नमक चलन में था... यह सब तब शुरू हुआ जब मल्टीनेशनल कपंनियों का वर्चस्व बढ़ा और हमने भी प्रकृति को जमकर दूह दिया....

मैं तो शाश्वत रिफ्यूजी हूं.... कभी मेरे वरिष्ठ पत्रकार मित्र रणविजय सिंह सत्यकेतु ने 'वर्तमान वाणी' (भविष्य वाणी हो सकता है तो...) की थी कि आपको गंगा तीर वाला महानगर ही सूट करता है.... मैं पैदा हुआ बंगाल में... वहां तब हुगली (जिसे परंपरागत तौर पर देश गंगा मानता है) किनारे के औद्योगिक इलाके पूरबिया बहुल थे... तकनीकी वजह तो इसकी जूट मिलें थी... वहीं इर्द गिर्द कामगार बसते थे... मगर दूसरे पेशे से गए लोगों के लिए भी वही सुविधाजनक लगा... इसकी वजह भूगोल ज्यादा थी.... हुगली को मानता हूं लिखने की वजह यह है कि हुगली नाम की एक नदी स्वतंत्र रूप से वहां हुआ करती थी... जिसे कभी विश्वास घाति नदी भी माना जाता था..... वह नवद्वीप के पास भागीरथी और जलांगी नदियों के मेल से बनती है... यह गंगा की ही धारा है... जो घनी आबादी वाले इंडस्ट्रीयल बेल्ट से होते हुए बंगाल की खाड़ी में जाकर समाहित हो जाती है.... मुर्शिदाबाद से हुगली सिटी तक भागीरथी ही गंगा है... और इसके बाद बंगाल की खाड़ी तक हुगली...

कलकत्ता छूटा तो वाया मेरठ और जालंधर पहुंच गया बनारस... खांटी गंगा किनारे वाले शहर में... कानपुर भी इसी श्रेणी का महानगर है... बल्कि कलकत्ता से काफी हद तक मिलता जुलता... वैसे ये दोनों महानगर अंग्रेजों की देन हैं... मगर जो भूजा बनारस में मिलता है, वह कानपुर में नहीं मिलता... वहां भून कर डिब्बा में रख देते हैं... अधिक से अधिक कस्टमर मांगा तो गरम करके थमा देते हैं... इसका टेस्ट बदल जाता है...

बनारस पहुंचा तो अमर उजाला दफ्तर के पास ही इसी टाइप की दुकान मिल गई... बल्कि पूरा एडिटोरियल थोक के भाव में सामूहिक भूजा भोज रोज शाम को करता था.... मैं तो अकेले रहने के दौरान महीनों एक वक्त भूजा खाकर ही रह जाता था.... क्योंकि देर रात को दफ्तर से लौटता तो सुबह देर तक सोता रहता... जगता तो अखबार पढ़ता.... इसके बाद आलस्य... नहाते धोते लहरतारा स्थित ढाबे पर पहुंचता तो पता चलता खाना खत्म हो गया.... फिर भूजा के सिवाय कोई विकल्प नहीं बचता.... इसी नमक मिर्च की चटनी संग... ऊपर से विक्की की चाय...

भूजा वैसे बलिया शहर का भी लजीज होता है... स्टेशन के इर्द गिर्द ठेले वाले ताजा भूज कर बेचते हैं... गांवों में बचपन में ही गोसारी देखा हूं.... अब तो चर्चा भी नहीं होती... वैसे पहले स्पेशली बलिया से सत्तू खुद लाता था या किसी से मंगवा लेता था... मगर अब इसी भूजा वाले के भरोसे हूं... अब ब्रांडेड सत्तू भी सहज सुलभ है.... मगर जायके में जमीन आसमान का फर्क है...

जालंधर में रहने के दौरान भी एक बार सत्तू की तलाश में रेलवे स्टेशन तक पहुंचा था.... मगर उसने ठग दिया.... या फिर मैं सही जगह पहुंच ही नहीं पाया... खैर, सत्तू के बने पराठे फेंकने पड़े....

भोपाल के प्रवास के दौरान जरूर हाथ लग गया था... वहां उन दिनों मेन सिटी से दूर टिका था... आसपास के कायदे के होटल/ढाबे नहीं थे... सो हम पत्रकारों का समूह एक वक्त ही खाकर गुजारने का फैसला किया... शाम होते सभी एक साथ बस पर सवार हो गांधी कुटिया (शायद यही नाम था) पहुंचते और अपना राशन उदरस्थ करते.... वैसे भोपाल मुझे तब महंगा शहर भी लगा था.. इसी दौरान घुमते घुमते एक जगह सत्तू हाथ लग गया.... फिर तो मुझे थोड़ी राहत हो गई....

कलकत्ता के बड़ा बाजार (सत्यनारायण पार्क के पास) एक दुकान हुआ करती थी... जहां लोग हाथों में ब्रीफकेस लिए लंबी लाइन में खड़े होकर सत्तू या अन्य देसी अनाज खरीदते थे... उस दुकान पर चांदी का वर्क लगा मीठा सत्तू भी रेडीमेड मिलता था... मेरे पिता के एक मारवाड़ी मित्र के यहां से अक्सर बिटिया या बहू की बिदाई या वापसी के वक्त यह बायन आता था... आप चाहे तो इसे पूर्वांचल के गुड़ सत्तू का महानगर में कमासुत बड़का भईया मान ले... हां, वाया कलकत्ता मारवाड़ तक पहुंचते पहुंचते उसमें थोड़ा आभिजात्य या एलिट टच तो आ ही जाएगा....

बासुदेव टिकमानी की उन दिनों हावड़ा में फाउंड्रियां थी... सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद सभी फाउंड्रियां बंद करनी पड़ी... इस बात को लेकर उद्योगपति परेशान थे... टिकमानी जी हावड़ा चेम्बर आफ कार्मस ऐंड इंडस्ट्री के चेयरमैन भी थे... मुझे बहुत मानते भी थे.... मानते मुझे इंटक नेता गणेश पाठक भी थे....वजह यह भी थी कि उद्योगपतियों और मजदूरों की दिक्कतों को लेकर मैं लगातार जनसत्ता (कलकत्ता) में लिख रहा था... टिकमानी जी ने एक दिन मुझे अपने घर खाने पर बुलाया... उनके और भी कई गेस्ट थे... मैं पहुंचा तो कहे कि चलिए आपको बाटी खिलाते हैं... मेरे दिमाग में लिट्टी चोखा घूम रहा था... सो मैं तैयार हो गया... पहुंचा तो देखा कि शुद्ध देसी घी में आकंठ डूबी हुई बाटी (रसगुल्ले की तरह)... मेरी तो घिग्घि बंध गई... खैर किसी तरह एक खाया... मगर घी की अधिकता की वजह से मुंह बंध सा गया... दूसरी उठाने की हिम्मत नहीं हई...

डॉ. कृष्णबिहारी मिश्र जी के घर पर काफी पहले उनके मित्र रेवती बाबू ने एक किस्सा सुनाया था... रेवती बाबू उर्फ रेवती लाल शाह... आईआईटी खड़गपुर के टॉपर थे... उर्दू साहित्य के मर्मज्ञ... एक बार फिराक गोरखपुरी कलकत्ता पहुंचे... बड़े बड़े धन कुबेरों के यहां से निमंत्रण था... रेवती बाबू बारी बारी से सबके यहां उन्हें लेकर गए... शाम होते ही फिराक साहब ने रेवती बाबू से चाय की फरमाइश कर दी... उन्हें आश्चर्य हुआ कि दिन भर जगह जगह इतना नाश्ता पानी हुआ... चाय भी कई जगह पी गई... फिर.... खैर फरमाइश पूरी करने से इन्कार कैसे करते.... मुंहलगे थे सो पूछ भी दिए... कई बार तो चाय पीए... फिर भी... फिराक साहब ने तपाक से कहा, चाय कहां पी.... किसी ने कस्तूरी वाली थमा दी.... तो किसी के यहां कुछ और.... आभिजात्य का प्रदर्शन... कोई चाय के नाम पर काढ़ा ही पिला दिया... चाय का असली जायका तो उस लीकर (सिर्फ पत्ती वाली चाय) में है, जो आम तौर पर अब बंगाली पीना पसंद करते हैं.... दूध वाली चाय अंग्रेज भी नहीं पीते थे... लीकर ही पीते थे.... मुझे कड़क लीकर चाय चाहिए...

वैसे पर्चा आउट टाइप राज की बात यह है कि यूपी/बिहार तो जब तक चाय को अवट न दे... मतलब जमकर खौला न दे... उसकी चाय बनती ही नहीं... शायद इसी मर्ज की शिकार यहां की राजनीति भी है

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