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सुमेधा का तेरह वर्षीय पुत्र प्रज्ञ पिछले कुछ महीनों से 'अलग' व्यवहार कर रहा है

लेकिन टीन-एज के दौरान हो रहे मस्तिष्कीय बदलावों पर बीते कई सालों में अनेक शोधों ने नयी-नयी बातें हमारे सामने रखी हैं।

 Shiv Kumar Mishra |  6 Jun 2020 3:55 PM GMT  |  दिल्ली

सुमेधा का तेरह वर्षीय पुत्र प्रज्ञ पिछले कुछ महीनों से

आशू कुमार वत्स

सुमेधा का तेरह वर्षीय पुत्र प्रज्ञ पिछले कुछ महीनों से 'अलग' व्यवहार कर रहा है। या यों कहें कि जिस तरह का व्यवहार वह कर रहा है , वह उसकी माँ को भिन्न लग रहा है। उसने अपने पहनावे में अनेक बदलाव किये हैं और हेयरस्टाइल भी अजीब कर ली है। वह तरह-तरह के गाने सुनता है और अपने कमरे में देर तक अकेले रहा करता है। उसका जीवन अपने अकेलेपन और मित्रों के साथ बीतने लगा है : सुमेधा के सवाल-जवाब करने पर वह कई बार उखड़ जाता है और ज़बान लड़ाते हुए अजीब स्थिति पैदा कर देता है।

टीन-एज या कैशोर काल का समय न बचपन का समय है और न यौवन का। लेकिन इसे कई बार दीर्घतर बाल्यकाल या यौवनारम्भ-भर मानने की भूल कर दी जाती है। इस कारण से लोग उम्र के पड़ाव से गुज़र रहे लोगों को कभी बच्चा तो कभी वयस्क समझने की ग़लती कर बैठते हैं। कैशोर काल में लोग उच्छृंखल , अतिभावुक और विद्रोही व्यवहार क्यों प्रदर्शित करते हैं ? यह जाने बिना इस वयःसन्धि से गुज़रते लोगों के प्रति हम उचित बर्ताव सुनिश्चित नहीं कर सकते। अब तक यही माना जाता रहा था कि इस उम्र में यौवन-सम्बन्धी हॉर्मोनों का स्राव होता है , जिसके कारण ये लोग आवेगी और अधिकारवान् के प्रति विरोध का प्रदर्शन करने लगते हैं। लेकिन टीन-एज के दौरान हो रहे मस्तिष्कीय बदलावों पर बीते कई सालों में अनेक शोधों ने नयी-नयी बातें हमारे सामने रखी हैं।

तेरह-चौदह-पन्द्रह साल की उम्र तक मस्तिष्क का विकास परिपूर्ण नहीं होता , यह जीवन के तीसरे दशक तक ( पच्चीस की उम्र के पार ) चला करता है। टीन-एज के दौरान मस्तिष्क में अनेक बदलाव आया करते हैं। मस्तिष्क में नयी न्यूरॉन-कोशिकाओं का निर्माण नहीं होता , पर अनेक न्यूरॉनों के लम्बे एग्ज़ॉन-नामक अंगों के चारों ओर मायलिन नामक पदार्थ को लपेटा जाता है। ( यह ठीक उसी तरह है जिस तरह किसी नंगे तार के चारों ओर रबड़ की कोई परत लपेटी जाए। ) न्यूरॉनों के एग्जॉनों के चारों ओर मायलिन के लिपटाव से न्यूरॉनों का परस्पर सूचना-संचार तीव्रतर हो जाता है। यह मायलिनीकरण मस्तिष्क के पिछले हिस्सों से शुरू होता है और आगे की ओर बढ़ता जाता है। मस्तिष्क का अगला हिस्सा --- जिसे प्रीफ्रॉन्टल कॉर्टेक्स नाम दिया गया है --- अन्त में मायलिनीकृत होता है। किशोरों के मस्तिष्क में प्री-फ्रॉन्टल कॉर्टेक्स में पर्याप्त मायलिनीकरण न होने के कारण उनमें सुचारु प्लानिंग , उचित निर्णय लेने की क्षमता और भाषा व सामाजिक व्यवहार में उचित-अनुचित का पर्याप्त बोध नहीं पाया जाता। इसी कारण वे जोखिम लेते हैं और कई बार विद्रोही व्यवहार भी प्रदर्शित कर दिया करते हैं।

टीन-एजर कल-परसों-नरसों या अगले महीने की प्लानिंग में इसीलिए चूकते हैं , क्योंकि उनका प्रीफ्रॉन्टल कॉर्टेक्स अभी वयस्कों की तरह विकसित नहीं हो पाया है। वहीं मस्तिष्क के एक दूसरे हिस्से लिम्बिक सिस्टम में भी अनेक बदलावों से वे गुज़र रहे हैं। यह स्थान मानव-भावनाओं का नियन्त्रण-केन्द्र है। इसमें होने वाले बदलावों के कारण ही किशोरों में अतिभावुकता और अतिजोखिम में स्वयं को डालने की परिस्थितियाँ पैदा होती हैं। प्रीफ्रॉन्टल कॉर्टेक्स लिम्बिक सिस्टम पर नियन्त्रण रखता है , जिस तरह कोई सारथी घोड़ों पर। पर चूँकि कैशोर काल में सारथी अभी अपनी दक्षता में निपुण नहीं हो सका है , इसलिए उसके घोड़े अपनी मनमर्ज़ी से यहाँ-वहाँ सरपट दौड़ लगाया करते हैं।

कैशोर काल ही वह समय है , जब अनेक मानसिक रोग ( लगभग 70 % ) प्रकट होते हैं। इनमें एंग्ज़ायटी , मूड-सम्बन्धी , भोजनकर्म-सम्बन्धी रोग व सायकोसिस प्रमुख हैं। तरह-तरह की लतें में भी इसी समय किशोरों में अपनी पैठ बनाया करती हैं। लत दरअसल एक क़िस्म की मस्तिष्कीय शिक्षा है। लत को पूरा करने से किशोर के भीतर पुरस्कार पाने जैसी तृप्ति पैदा होती है : यही कारण है कि वह लत पैदा करने वाले पदार्थ का सेवन या काम को बार-बार करना चाहता है। किशोर जल्दी काम सीख सकते हैं , बेहतर सीख सकते हैं , पर वे ही लत के शिकार भी आसानी से और जल्दी हो सकते हैं।

टीन-एज का समय मस्तिष्क की रीवायरिंग का समय है। ऐसा समय जब न्यूरॉन आपस में पुराने सम्बन्धों को अधिक सुचारु बना रहे हैं और पुराने सम्बन्धों की छँटनी कर रहे हैं। इन्हीं बदलावों के कारण किशोरों में अनेकानेक बौद्धिक और सर्जनात्मक प्रतिभाओं का प्रस्फुटन होता है। लेकिन इसी समय तरह-तरह के मानसिक रोग भी अपने-आप को प्रकट करते हैं। यह विरोधाभास अनोखा है : एक ओर दिमाग़ बेहतर बन रहा है , तो दूसरी ओर वह बीमार भी पड़ सकता है।

किशोरों को समझने के लिए उनके दिमाग़ों को समझना ज़रूरी है। जितनी हममें उनकी मस्तिष्कीय समझ होगी , उतना हम उनके प्रति संवेदनशील बनेंगे। इसी संवेदनशीलता से वयस्क-किशोर-सम्बन्ध बेहतर होगा और इसी से किशोरों को बेहतर वयस्कों में ढालने में मदद मिलेगी।

( एक चित्र में प्रीफ्रॉन्टल कॉर्टेक्स व एमिग्डेला की स्थिति। एमिग्डला लिम्बिक सिस्टम का हिस्सा है और भावुकता में भूमिका निभाता है। प्रीफ्रॉन्टल कॉर्टेक्स तर्कपूर्ण व्यवहार और आवश्यक प्लानिंग तय करता है और इसके द्वारा एमिग्डला पर आवश्यक नियन्त्रण रखा जाता है। )

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