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ऐसा क्यों करते है- जब फांसी की सजा सुना देने के बाद जज तोड़ देते हैं कलम!

 Sujeet Kumar Gupta |  13 Dec 2019 10:50 AM GMT  |  नई दिल्ली

ऐसा क्यों करते है- जब फांसी की सजा सुना देने के बाद जज तोड़ देते हैं कलम!
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जब भी कभी किसी को जज के द्वारा फांसी की सजा सुनाई जाती है तो उसके बाद जज अपनी कलम तोड़ देते हैं। लेकिन क्या आप इसके पीछे कारण जाते हैं। अगर नहीं तो हम आपको बताते हैं कि आखिर क्यों मौत की सजा सुनाने के बाद पेन की निब तोड़ दी जाती है।

फांसी की सजा सुनाते ही कलम तोड़ने की प्रथा आज से नहीं बल्कि अंग्रेजों के जमाने से चलता रहा है। जब भारत में ब्रिटिश हुकूमत थी तभी भी सजा सुनाने के बाद कलम को तोड़ा जाता था, लेकिन आप सोच रहे होंगे कि आखिर का सजा और कलम का क्या संबंध है। हम आपको बताते हैं कि सजा और कलम इन दोनों में एक गहरा संबंध होता है।

जिस तरह कलम से लिखी हुई बात को कोई मिटा नहीं सकता उसी तरह कोर्ट के द्वारा दी हुई सजा को कोई भी ताकत नहीं रोक सकता है। जिस कलम से आरोपी को फांसी की सजा सुनाई जाती है उसे जज के द्वारा इसलिए तोड़ दिया जाता है कि दोबारा इस कलम से फिर किसी को फांसी की सजा नहीं मिले और ना ही कोई इस तरह का अपराध करें।

उल्लेखनीय है कि फांसी की सजा दुनिया की सभी सजाओं में सबसे बड़ी सजा होती है। जिसे किसी आम अपराधी को नहीं सुनाया जाता है। यह सजा किसी जघन्य अपराध की घटना को अंजाम देने वाले अपराधियों को सुनाई जाती है। सजा मुकर्रर होने के बाद कलम तोड़ने का एक और भी कारण बताया जाता है ।

जिसके मुताबिक जब भी किसी जघन्य अपराध करने वाले आरोपियों को फांसी की सजा मुकर्रर होती है तो उसकी जिंदगी समाप्त हो जाती है। एक इंसान की जिंदगी को समाप्त होने के बाद जज द्वारा कलम तोड़ दिया जाता है।

फांसी की सजा सुनाने से पहले उस सजा पर जज के द्वारा जिस कलम से हस्ताक्षर किया जाता है उसे तोड़ने का कारण यह भी माना जाता है कि यही कलम है जिसने उस शख्स की मौत लिखी है। वही किसी की जान लेने के कारण अपने आपको प्रायश्चित कराने के लिए जज के द्वारा कलम की निब तोड़ दी जाती है।

जब जज एक बार अपना फैसला सुना देते हैं तो उनके पास भी अपने फैसले को बदलने की ताकत नहीं होती है. इसलिए जज अपने फैसले को बदल ना सकें या उस पर पुनर्विचार ना करें इसलिए वो पेन की निब तोड़ देते हैं. और निब तोड़ने से ये साफ हो जाता है कि फांसी का फैसला एक बार सुनाने के बाद बदला नहीं जा सकता. इस फैसले को बदलने की ताकत सिर्फ उच्च न्यायालय के पास ही होती है।

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