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अब कौन शेर की तरह दहाड़ेगा भोला बाबू

शायद प्रकृति को यही मंजूर था कि भोला बाबू अंतिम समय में भी सलामी लेकर ही विदा हुए भोला बाबू आप कभी पूर्व नही हुए अभूत पूर्व रहे. लेकिन उस जनता का क्या होगा जिसे शेर की दहाड़ सुनने की आदत आपने पिछले पांच दशको में लगा डाली .

 Special Coverage News |  2018-10-21 13:06:38.0  |  बेगुसराय

अब कौन शेर की तरह दहाड़ेगा भोला बाबू

अशोक मिश्र

गुरूवार को नवमी के दिन मेरे आवास पर सामाजिक कार्यकर्ता रामअनुग्रह शर्मा दुर्गापूजा की बधाई देने पहुंचे.मुलाकात के साथ ही उन्होनें भोला बाबू के स्वास्थ्य के बारे में जानकारी दी. साथ ही अफसोस भी जताया कि बेगूसराय जिले के एक मात्र नेता की हालत नासाज है. साथ ही उन्होने जोड़ा कि भोला बाबू जैसा कोई नेता जिला में नही. मैने उसमें थोड़ा संशोधन किया और कहा भोला बाबू के अलावे रामजीवन बाबू और शत्रुध्न बाबू के बाद जिला में कोई ऐसा नेता नही जिसे जिले के बारे में जानकारी हो या पूरे जिला के लोग उन्हें अपना नेता मानता हो. फिर दशमी की देर शाम दिल्ली से एक मित्र का फोन आया कि आपके भोला बाबू नही रहे.


हालांकि इस बार पारिवारिक कारणो से मेरा दशहरा अच्छा नही रहा लेकिन भोला बाबू की मौत की खबर के बाद तो मानो सब कुछ खत्म. भोला बाबू से हमारी पहली मुलाकात उनके कभी खासम खास राजनीतिक सहयोगी रहे कुमार गोविंद झा ने करायी थी. वह 1980 -85 का दौर था और भोला बाबू कांग्रेस से विधायक हुआ करते थे. दिव्य पर्सनैलिटी शुद्ध हिन्दी में बातचीत जिधर कदम बढ़े समर्थको की लंबी फौज. फिर तो गृह राज्यमंत्री रहे या फिर शिक्षा राज्यमंत्री भोला सिंह की कोई शानी नही. भोला बाबू के बारे में काफी कुछ लिखा जा चुका है कि किस तरह उन्होनें कपड़े की तरह दल बदले. लेकिन उनके समर्थको के दिल में भोला भोला ही रहे.इसकी वजह क्या थी एक दो छोटे उदाहरण से आप समझ सकते है. राम अनुग्रह शर्मा कांग्रेस के कार्यकर्ता है. भाजपा के सांसद होने के बावजूद भोला बाबू ने राम अनुग्रह शर्मा के आवास के पास सोलर लाइट लगायी. भाजपा समर्थको ने भोला बाबू से शिकायत की तो भोला बाबू ने कहा कि जो खंभा गड़ गया है उसे अब भोला सिंह उखाड़ने नही जायेगा. यह था भोला सिंह का चरित्र.


पुराने लोग बताते है कि किस तरह हर्ऱख कोठी की कृपा से जी डी कालेज में प्रोफेसर की नौकरी पाने वाले भोला सिंह ने नौकरी की फिक्र छोड़ कर कोठी का विरोध किया.बगावत जर्रे जर्रे में . यही वजह रही कि जिस दल में रहे उसके नेतृत्व से ही टकराया. डा0 जगन्नाथ मिश्र के विरोध का खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ा.जब तक डा0 साहब की चलती रही भोला सिंह हाशिये पर रहे. बिन्दश्वरी दूबे के समक्ष ही पथ निर्माण मंत्री हरिहर महतो की बखिया उधेड़ डाली . कहा इनके गाल के गड़्ढे भर गये लेकिन सड़को के गड्ढे नही.चाहे नीतीश सरकार में नगर विकास मंत्री हो या भाजपा में रहकर विधान सभा के उपाध्यक्ष . भोला बाबू कभी अपनी पार्टी के वफादार नही रहे. मुझे पूरी तरह से याद है कि राजद से नाता तोड़ जब वे भाजपा के दरवाजे पर दस्तक दे रहे थे एक सभा बरौनी फ्लैग में स्व कैलाशपति मिश्र जी की हुई थी. उसमें उन्होनें कैलाश जी की जमकर तारीफ की और कहा कि आप कैलाश पति मैं भोला. आप अगर शरण नही देेगे तो मै कहा रहूगा. कैलाश जी ने भी ईशारो में कहा था भोला बाबू कैलाश पर्वत पर भी भोला को स्थिर रहना पड़ता है. लेकिन भोला यहा भी बगावती रूप नही छोड़ा.


पटना के नेता उनके बयानबाजी से परेशान होकर उन्हें नवादा का रास्ता दिखाया लेकिन भोला तो भोला ठहरे. मुझे पूरी तरह याद है नवादा चुनाव के एक दिन पहले लोजपा प्रदेश कार्यालय में मैने सूरजभान जी से पूछा कि नवादा में क्या हाल है तो उन्होनें दावे के साथ कहा कि चुनाव मै जीतूगा. जब परिणाम आय़ा तो सूरजभान चुनाव हारे भोला बाबू ने फतह हासिल की. पत्रकारिता के अलावे व्यक्तिगत रिश्ता भोला बाबू ने खूब निभाया. यही वजह रही कि जब भी कभी बरौनी से गुजरते तो मुलाकात जरूर हो जाती. करीब करीब हर पारिवारिक कार्यक्रम में उन्होने शिरकत किया.जब भी किसी को कोई कठिनाई हो लोग सीधे भोला बाबू के पास दौड़ते. नगर विकास मंत्री बनने के बाद पहले दिन कार्यालय में पदभार संभाला तो मै भी उस अवसर पर था.भोला बाबू की निगाहे मुझे बार - बार देख रही थी. लगता था कि वे आज काफी सुकून में थे. एक दिन उन्होनें मुझसे कहा कि बरौनी के हमने नगर निगम और तेघड़ा को नगर पंचायत और बीहट को नगर परिषद बना दिया. हालांकि स्थानीय कारणो से बरौनी को यह नसीब नही हुआ. जब भी चुनाव हुआ मतदान के दिन सुबह बूथ पर लाइव के लिये मेरे आग्रह पर तैयार रहते थे.लेकिन इन सबके बावजूद भोला बाबू की राजनीति उपलब्धि को गौर से देखे तो उनके व्यक्तित्व के हिसाब से जहा राजनीति में उनकी उपलब्धि बेहतर नही कही जा सकती वही जिला को भी कोई खास फायदा नही मिल पाया .


लेकिन इन सबके के बावजूद बेगूसराय जिले को लोग इस बात से खुश थे कि उनके पास भोला बाबू थे. मंच पर शेर की तरह गरजने वाला नेता. अधिकारियों से पुचकार कर या फिर भिडंत कर काम कराने वाला नेता पत्रकारो के मन के अनुरूप बयान देने वाला नेता . लेकिन शेर की तरह दहाड़ने वाले नेता की अंतिम सांस विजया दशमी के दिन यानि शेरे वाली की विदायी के साथ ही हो जाती है बिहार केसरी श्री कृष्ण सिंह की जयंति के दिन उनकी गाथाओं को गाने वाला भोला पंच तत्व में विलीन हो जाता है. वामपंथ विचार धारा के साथ बोल्गा की प्रशंसा घर - घर करने वाले भोला की अंतिम यात्रा दक्षिणपंथ के साथ गंगा में विलीन के साथ ही समाप्त होता है. शायद प्रकृति को यही मंजूर था कि भोला बाबू अंतिम समय में भी सलामी लेकर ही विदा हुए भोला बाबू आप कभी पूर्व नही हुए अभूत पूर्व रहे. लेकिन उस जनता का क्या होगा जिसे शेर की दहाड़ सुनने की आदत आपने पिछले पांच दशको में लगा डाली . ऐसे तो सैकड़ो संस्मरण है लेकिन लिखना संभव नही . विनम्र श्रद्धांजलि.शत , शत नमन आपको.

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