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पहले बिहार में बहार के दावे को समझ तो लें!

 Shiv Kumar Mishra |  18 March 2020 4:24 PM GMT  |  दिल्ली

पहले बिहार में बहार के दावे को समझ तो लें!

प्रो0 दिग्विजय नाथ झा

इसे क्रूर विडम्बना नहीं तो और क्या कह सकते हैं कि बौद्धधर्म के संस्थापक गौतम बुद्ध, जैन समुदाय के 14वें तीर्थंकर भगवान महावीर, मर्यादा पुरूषोत्तम की अर्द्धांगिनी सीता, सिखों के दसवें गुरू गोविंद सिंह, दुनिया के महानतम सम्राटों में से एक सम्राट अशोक, प्राचीन भारत के महानतम गणितज्ञ व ज्योतिषशास्त्री आर्यभट्ट, कामसूत्र के रचियता आचार्य वात्स्यायन, मौर्य साम्राज्य के संस्थापक चाणक्य, प्रथम संस्कृत महाकाव्य रामायण के रचियता महर्षि वाल्मीकि, सर्जरी के सृजनहार सुश्रुत, मशहूर शहनाईवादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खान, अमर शहीद जुब्बा सहनी व रामफल मंडल, संविधान सभा के अध्यक्ष डा0 राजेन्द्र प्रसाद, सम्पूर्ण क्रांति आंदोलन के प्रणेता जयप्रकाश नारायण समेत नालंदा व विक्रमशिला विश्वविद्यालय तथा दुनिया के सबसे पुराने गणराज्यों में से एक लिच्छवी गणराज्य की जन्मस्थली व कर्मस्थली बिहार की पहचान आज की तारीख में 14.4 फीसदी यादव, 6.5 फीसदी कुशवाहा, 3.9 फीसदी कुर्मी, 11.8 फीसदी महादलित, 4.2 फीसदी दलित, 4.0 फीसदी भूमिहार, 5.7 फीसदी ब्राह्मण, 5.2 फीसदी राजपूत, 1.8 फीसदी कायस्थ, 0.8 फीसदी जनजाति, 24.1 फीसदी अन्य पिछड़ी जाति, 0.7 फीसदी सिख, बौद्ध, जैन, ईसाई व पारसी तथा 16.9 फीसदी मुस्लिम सरीखे जाति और धर्म पर आधारित सामाजिक समूहों को दिग्भ्रमित करनेवाले राजनीतिक दलों के पालनहार प्रदेश की बन गई है, जबकि संयुक्त राष्ट्र संघ की ओर से जारी वैश्विक बहुआयामी गरीबी सूचकांक की ताजा रिपोर्ट चीख-चीख कर बयां कर रही है कि भारत का सबसे गरीब राज्य बिहार के कुल 38 जिलों में से 17 जिले ऐसे हैं, जहां कि आधी से अधिक आबादी पूर्णतः दरिद्र है।

दुःखद तो यह कि बिहार की कुल आबादी में गरीबी रेखा से नीचे जीवन बसर करनेवाले लोगों की तादाद 33.7 फीसदी है और गरीबी रेखा से मामूली ऊपर जीवन बसर करनेवाले लोगों की संख्या 20.5 फीसदी के आसपास है। बेशक, नीतीश कुमार के मुख्यमंत्रित्वकाल में राज्य में गरीबी कम हुई है, लेकिन राष्ट्रीय औसत (21.92 फीसदी) और बिहार की गरीबी (33.7 फीसदी) के बीच का अंतर बढ़ा है, क्योंकि वर्ष 2001 में गरीबी के भारतीय औसत और बिहार की गरीबी के बीच सिर्फ आठ फीसदी का अंतर था। सबसे कम प्रति व्यक्ति सालाना आय वाले भारत के पांच राज्यों में बिहार प्रथम स्थान पर है, जबकि सबसे अधिक प्रतिव्यक्ति सालाना आय वाले पांच राज्यों के मुकाबले औसतन कर की दर बिहार में सर्वाधिक है।

मसलन, केन्द्रीय वित्त मंत्रालय की ताजा रिपोर्ट बताती है कि गोवा में सर्वाधिक 3,75,554 रूपये प्रतिव्यक्ति सालाना आय पर लोगों को 34438 रूपये, दिल्ली में 3,29,093 रूपये प्रतिव्यक्ति सालाना आय पर लोगों को 21029 रूपये, सिक्किम में 2,97,765 रूपये प्रतिव्यक्ति सालाना आय पर लोगों को 30133 रूपये, पंजाब में 2,42,386 रूपये प्रतिव्यक्ति सालाना आय पर लोगों को 24820 रूपये एवं पुडुचेरी में 1,98,156 रूपये प्रतिव्यक्ति सालाना आय पर लोगों को 20528 रूपये कर देना पड़ता है, यानी कि प्रतिव्यक्ति सर्वाधिक सालाना आय वाले गोवा, दिल्ली, सिक्किम, पंजाब एवं पुडुचेरी सरीखे भारतीय राज्यों में प्रतिव्यक्ति औसतन कर भार कुल आय का क्रमशः 9.17, 6.39, 10.12, 10.24 एवं 10.36 फीसदी है, जबकि बिहार में सबसे कम 33,629 रूपये प्रतिव्यक्ति सालाना आय पर लोगों को 8007 रूपये औसतन कर देना पड़ता है, जो कि प्रतिव्यक्ति औसतन कुल आय का 23.81 फीसदी है।

वर्ष 2011 की अंतिम जनगणना रिपोर्ट में राज्यवार अंकित सालाना जनसंख्या वृद्धि दर तथा सरकारी एवं गैर सरकारी प्राथमिक स्कूलों में राज्यवार छात्र-छात्राओं की संख्या में हुई सालाना बढ़ोत्तरी के आधार पर बिहार की जनसंख्या आज की तारीख में तकरीबन 12 करोड़ के आसपास है, जो कि भारत की कुल आबादी का 8.6 फीसदी है। परंतु जनसंख्या के आधार पर यह भारत का तीसरा सबसे बड़ा राज्य है। बिहार का कुल क्षेत्रफल 94164 वर्ग किलोमीटर है, जो कि देश के कुल क्षेत्रफल का 2.86 फीसदी है और क्षेत्रफल के हिसाब से यह भारत का 12वां सबसे बड़ा राज्य है। बिहार का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 93.60 लाख हेक्टेयर है, जिनमें से 79.76 लाख हेक्टेयर भूमि कृषि योग्य है, किंतु 30 फीसदी कृषि योग्य भूमि पर खेती सिर्फ व सिर्फ इसलिए नहीं होती है कि राज्य में 43.86 लाख हेक्टेयर भूमि पर ही सिंचाई की सुविधाएं उपलब्ध है, बावजूद इसके कि बिहार की 76 फीसदी आबादी आज भी कृषि पर आजीविका के लिए निर्भर है, परंतु नीति आयोग की वर्ष 2019 की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक शर्मनाक हकीकत यह है कि कृषि क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन करनेवाले शीर्ष 15 राज्यों की सूची में बिहार का नामो-निशां नहीं है।

यद्यपि, सुशासन सुप्रीमो नीतीश बाबू को कौन समझाए कि वर्ष 2015 एवं 2020 के दिल्ली विधानसभा चुनावों में अरविन्द केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने विकास के मुद्दे पर उस प्रधानमंत्री को लगातार दूसरी मर्तबा चारो खाने चित्त कर दिया जिसकी छवि अपनी पार्टी एवं भारत की मीडिया की नजरों में विकास के पर्याय सरीखी रही है और इतना ही नहीं वर्ष 2014 के लोकसभा चुनावों में गुजरात के मुख्यमंत्री ने बिहार में उस इंजीनियर मुख्यमंत्री को चारो खाने चित्त कर दिया था जिसकी छवि अपनी पार्टी एवं बिहार की मीडिया की नजरों में आज की तारीख तक न्याय के साथ विकास के पर्याय सरीखी रही है, पर न्याय के साथ विकास के नीतीश के दावे की इससे अधिक स्याह हकीकत क्या हो सकती है कि वर्ष 2001 के मुकाबले वर्ष 2011 में बिहार में महिलाओं की आबादी में 0.5 फीसदी की जबर्दस्त गिरावट आई है और नारियों की संख्या में आई व्यापक गिरावट के मामले में बिहार देश का अव्वल राज्य है। बिहार की कुल आबादी में महिलाओं की तादाद 47.27 फीसदी है तथा प्रति एक हजार पुरूषों पर सूबे में स्त्रियों की संख्या 918 है।

पूरे देश में वर्ष 2001 से 2015 के बीच महिलाओं की प्रजनन दर जहां 23 फीसदी घटी है, वहीं बिहार में महिलाओं की प्रजनन दर महज 7.8 फीसदी घटी है। यानी कि पूरे देश की तुलना में बिहार में प्रजनन दर तीन गुनी धीमी गति से घट रही है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण की ताजा रिपोर्ट बताती है कि बिहार की 76 फीसदी शादीशुदा महिलाओं ने वर्ष 2001 से 2015 के बीच कभी भी किसी तरह के परिवार नियोजन के तरीके का इस्तेमाल नहीं किया और इसी का नतीजा है कि राष्ट्रीय स्तर पर महिलाओं का प्रजनन दर 2.18 के मुकाबले बिहार की महिलाओं का प्रजनन दर भारत में सबसे ज्यादा 3.40 है। नीतीश बाबू के मुख्यमंत्रित्वकाल में बिहार की 42 फीसदी बालिकाओं की शादी 17.5 साल की उम्र पूरी करने से पहले हो गयी है, जबकि बाल विवाह निषेध अधिनियम के प्रावधानों के मुताबिक विवाह की न्यूनतम आयु बालिकाओं के लिए 18 वर्ष निर्धारित है, परंतु बाल विवाह निषेध अधिनियम के प्रावधानों की अनदेखी के मामले में देश के अव्वल दस राज्यों में बिहार द्वितीय स्थान पर है।

भारत में सबसे अधिक प्रजनन दर वाले राज्य बिहार में निरक्षर महिलाओं की तादाद भी सबसे अधिक 26.8 फीसदी है। इससे अधिक हास्यास्पद स्थिति और क्या हो सकती है कि राष्ट्रीय स्तर पर भारत के उच्च शैक्षणिक संस्थानों में महिला शिक्षकों की तादाद 42.20 फीसदी है, जबकि बिहार के उच्च शैक्षणिक संस्थानों में महिला शिक्षकों की तादाद महज 21.03 फीसदी है और पुरूष शिक्षकों की तादाद 78.97 फीसदी है। उच्च शैक्षणिक संस्थानों में पुरूषों की तुलना में सबसे कम महिला शिक्षकों के मामले में देश में बिहार प्रथम और झारखंड द्वितीय स्थान पर है, बावजूद इसके कि बिहार की सरकारी नौकरियों में महिलाओं के लिए 35 फीसदी सीटें आरक्षित है। बिहार की पंचायती राज संस्थाओं में महिला जनप्रतिनिधियों की तादाद तकरीबन 65 फीसदी के आसपास है, जबकि राज्य में 60 फीसदी से अधिक महिलाएं एनीमिया (खून की कमी) की शिकार हैं और 43 फीसदी से अधिक महिलाएं घरेलू हिंसा से त्रस्त है।

बहरहाल, एनडीए बिहार में नीतीश कुमार की सरकार का 15 साल बनाम लालू-राबड़ी की सरकार का 15 साल के मुद्दे पर वर्ष 2020 के आगामी विधानसभा चुनाव लड़ने का एलान कर चुका है और नीतीश बाबू का दावा है कि वर्ष 2004-2005 में बिहार विधानसभा में पेश बजट 23885 करोड़ रूपये के मुकाबले 2020-2021 में बिहार विधानसभा में पेश बजट 211761 करोड़ रूपये का हो गया है और देश की मौजूदा आर्थिक विकास दर जहां 5.5 फीसदी के आसपास है, वहीं बिहार की मौजूदा आर्थिक वृद्धि दर 10.53 फीसदी है। परंतु सवाल यह है कि वर्ष 2004-05 में बिहार की जीडीपी में कृषि क्षेत्र की हिस्सेदारी 32 फीसदी के मुकाबले 2019-20 में घटकर 16 फीसदी क्यों हो गई ? प्रति व्यक्ति आय का राष्ट्रीय औसत 92 हजार 565 रूपये के मुकाबले बिहार में औसतन प्रति व्यक्ति आय 33629 रूपये ही क्यों है ? क्यों देश के 18 प्रमुख राज्यों के मुकाबले सबसे कम 12 फीसदी लोग ही बिहार में नौकरी करते हैं ? बिहार के सभी सरकारी नौकरियों में महिलाओं के लिए जब 35 फीसदी सीटें आरक्षित है, तो फिर क्यों राज्य के सरकारी प्रतिष्ठानों में महिलाकर्मियों की मौजूदगी 20 फीसदी के आसपास है ? बिहार में बेरोजगारी दर 10.7 फीसदी के मुकाबले दिल्ली में सर्वाधिक बेरोजगारी दर 22.2 फीसदी, जम्मू कश्मीर में 21.4 फीसदी, हरियाणा में 20.7 फीसदी, हिमाचल प्रदेश में 16.8 फीसदी, पंजाब में 11.1 फीसदी एवं राजस्थान में 11.0 फीसदी है तो फिर क्यों गरीबी रेखा से नीचे जीवन बसर करने वाले लोगों की संख्या बिहार में सर्वाधिक 33.7 फीसदी है। वर्ष 2018-19 में देश में प्रति व्यक्ति सालाना बिजली की खपत 1181 किलोवाट रही, जबकि बिहार में प्रति व्यक्ति सालाना बिजली की खपत सबसे कम 258 किलोवाट रही है। कटु सत्य तो यह है कि नरेन्द्र दामोदरदास मोदी के प्रधानमंत्रित्वकाल में जहां देश में प्रति व्यक्ति बिजली की खपत में 170 किलोवाट की सालाना बढ़ोतरी हुई है, वहीं नीतीश कुमार के मुख्यमंत्रित्वकाल में बिहार में प्रति व्यक्ति बिजली की खपत में महज 70 किलोवाट की सालाना वृद्धि हुई है। हम इससे सौ फीसदी सहमत हैं कि वर्ष 2004-05 की अपेक्षा वर्ष 2020-21 का बिहार का बजट आठ गुणा बड़ा है, परंतु बेशर्मी की हद यह कि शिक्षामद में कुल बजट का 10.04 फीसदी यानी 21264 करोड़ रूपये ही व्यय करने का प्रावधान वर्ष 2020-21 के बजट में किया गया है, जबकि, वर्ष 2019-20 में कुल बजट का 10.12 फीसदी यानी 20309 करोड़ रूपये शिक्षामद में व्यय करने का प्रावधान किया गया था।

निःसंदेह वर्ष 2020-21 का बजट दस्तावेज शिक्षा के प्रति नीतीश कुमार की बेरूखी के प्रमाणिक साक्ष्य हैं। बिहार के सीएम संभवतः इससे बिल्कुल भी अनजान नहीं होंगे कि राज्य के 40 फीसदी स्कूलों में बिजली की सुविधा नहीं है, 92 फीसदी स्कूलों में कम्प्यूटर नहीं हैं, 38 फीसदी स्कूलों में खेल का मैदान नहीं है, 48 फीसदी स्कूलों में लड़कियों के लिए शौचालय की सुविधा नहीं है, 62 फीसदी स्कूलों में शुद्ध पेयजल उपलब्ध नहीं है, राज्य में स्कूली शिक्षकों के 28 फीसदी पद दस सालों से रिक्त पड़े हैं, बिहार के मौजूदा शिक्षामंत्री के खुलासे पर यकीन करें तो बिहार के कुल स्कूली शिक्षकों में से 37 फीसदी अप्रशिक्षित हैं। बिहार में पांचवीं कक्षा के 65 फीसदी स्कूली बच्चे किसी भी भाषा में ब्लैकबोर्ड पर लिखे चार अक्षरों से निर्मित शब्द को सही-सही नहीं पढ़ पाते हैं। दसवीं तक की पढ़ाई पूरी करने से पहले बच्चों के स्कूल छोड़ने की दर बिहार में सबसे अधिक है। यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इन्फॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन की ताजा रिपोर्ट बताती है कि बिहार में बीते दस सालों में कक्षा एक से पांच के बीच ड्रॉपआउट बच्चों की औसतन संख्या कुल छात्र-छात्राओं के तकरीबन 40 फीसदी है, जबकि कक्षा छह से दस के बीच ड्रॉपआउट छात्र-छात्राओं की औसतन संख्या कुल बच्चों के करीब 21 फीसदी है। राज्य में 18 से 23 आयु वर्ग के युवक-युवतियों की तादाद सवा तीन करोड़ के आसपास है, पर बिहार में ग्रेजुएट लोगों की संख्या महज 25 लाख 97 हजार 611 है और इनमें महिलाओं की संख्या सिर्फ 5 लाख 13 हजार 27 है। देश को सबसे ज्यादा आईएएस, आईपीएस व इंजीनियर देनेवाला राज्य बिहार में कॉलेज व यूनिवर्सिटी शिक्षकों के आधे से अधिक पद बीते पांच सालों से रिक्त पड़े हैं। इससे अधिक पीड़ा दायक बात और क्या हो सकती है कि 20वीं सदी में देश दुनिया में ऑक्सफोर्ड ऑफ द ईस्ट के नाम से मशहूर भारतीय उपमहाद्वीप का सातवां सबसे प्रतिष्ठित पटना यूनिवर्सिटी नीतीश बाबू के मुख्यमंत्रित्वकाल में इस कदर शैक्षणिक गुणवत्ता के मानदंडों पर पिछड़ गया है कि राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद (नैक) की ओर से वर्ष 2019 में जारी ग्रेडिंग में पटना विश्वविद्यालय को बी प्लस ग्रेड मिला है। बिहार में फर्जी डिग्रीधारी शिक्षकों की तादाद लगभग चालीस हजार से अधिक है तथा बीते तेरह सालों से वह विद्यालयों में बच्चों को पढ़ा रहे हैं और राज्य के मौजूदा शिक्षामंत्री विद्यालयों में फर्जी डिग्रीधारी शिक्षकों की मौजूदगी को जल्दबाजी में शिक्षकों की हुई नियुक्ति का दुष्प्रभाव करार दे रहे हैं।

कुल मिलाकर शिक्षा की हालत बिहार में बद से बदतर है और नीतीश मैट्रिक, इंटरमीडिएट व स्नातक में फस्ट डिविजन लाने वाले बच्चों को नगद इनाम देने के अलावा पोषाक तथा साइकिल बांटने में मशगूल हैं, ताकि लाभान्वित बच्चों के परिवारों में सरकार के प्रति हमदर्दी कायम रहे। जबकि भारत में स्कूली शिक्षा पर प्रति छात्र व्यय सबसे कम 5298 रूपए नीतीश बाबू के मुख्यमंत्रित्वकाल में हुई है और बिहार से सात गुना अधिक 39343 रूपए प्रति छात्र व्यय हिमाचल प्रदेश की सरकार ने किया है। बिहार में शिक्षा बजट का सबसे ज्यादा 68 फीसदी हिस्सा शिक्षकों के वेतन एवं पेंशन पर खर्च किया जाता है और 20 फीसदी के आसपास बगैर खर्च किए प्रत्येक वित्तीय वर्ष के आखिरी महीने में वित्त विभाग को वापस लौटा दिया जाता है। नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल (यू) वर्ष 2015 के बिहार में बहार है के नारे फिर से 2020 में इन दिनों लगा रही है, जबकि यूज एंड थ्रो की राजनीति के चैम्पियन नीतीश इस नारे के सृजनहार व मशहूर चुनावी रणनीतिकार सह जनता दल (यू) के पूर्व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर के सवालों से खुद को किनारे करने के प्रयास में लगे हैं और लंदन स्कूल ऑफ इकॉनोमिक्स से पब्लिक एडमिस्ट्रेशन में मास्टर डिग्री प्राप्त जद(यू) के वरिष्ठ नेता व पूर्व विधानपार्षद डा0 विनोद कुमार चैधरी की बेटी व प्लूरल्स पार्टी प्रेसिडेंट पुष्पम प्रिया चैधरी बिहार में बहार के नारे को बकवास बता रही है तथा सूबे की राजनीति में नए नैरेटिव को गढ़ने की कोशिश में लगी है। बहरहाल, इससे कतई भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि सुशासन के नीतीश के दावे और भ्रष्टाचार के खिलाफ शून्य सहनशीलता की उनकी नीति भी सिर्फ व सिर्फ प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की स्टोरी तक सीमित है और वह भी इसलिए कि वर्ष 1999-2000 से वर्ष 2004-2005 के बीच राबड़ी देवी की सरकार ने जहां विज्ञापन मद में महज 23 करोड़ 48 लाख रूपए खर्च किए थे वहीं नीतीश कुमार की सरकार ने वर्ष 2014-2015 से वर्ष 2019-2020 के बीच विज्ञापन मद में 498 करोड़ रूपए खर्च किए हैं। अन्यथा सुशासन एवं भ्रष्टाचार के खिलाफ शून्य सहनशीलता की नीति के प्रति नीतीश कुमार की प्रतिबद्धता की कड़वी हकीकत यह है कि बदतर शासन व्यवस्था के मामले में देश के शीर्ष पांच राज्यों की सूची में झारखंड पहले व बिहार चैथे स्थान पर है और पांच सब से भ्रष्ट भारतीय राज्यों की सूची में राजस्थान प्रथम एवं बिहार द्वितीय स्थान पर है।

केन्द्रीय कार्मिक मंत्रालय की वर्ष 2019 की सूशासन सूचकांक के मुताबिक बेहतर शासन व्यवस्था के मामले में तमिलनाडु देश का अव्वल राज्य है। हत्याओं के मामले में देश के पांच कुख्यात राज्यों में बिहार दूसरे स्थान पर है, अनुसूचित जाति के लोगों पर अत्याचार के मामले में भारत के आठ कुख्यात राज्यों में बिहार द्वितीय स्थान पर है। बच्चों के खिलाफ अपराध के मामले में देश के आठ कुख्यात राज्यों में बिहार सातवें स्थान पर है, महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामले में आठ कुख्यात भारतीय राज्यों में बिहार आठवें स्थान पर है। बिहार में 18 से 23 आयुवर्ग के प्रति एक लाख की युवा आबादी पर सिर्फ सात कॉलेज है, जबकि इसका राष्ट्रीय औसत 27 कॉलेजों का है। बिहार में स्नातक के 47 छात्रों को एक लेक्चरर पढ़ाते हैं, जबकि इसका राष्ट्रीय औसत 24 छात्रों का है। बिहार के अस्पतालों मंर 8645 लोगों पर एक बेड है, जबकि इसका राष्ट्रीय औसत 1908 लोगों पर एक बेड का है, इतना ही नहीं बिहार में 28391 लोगों पर एक डॉक्टर है जबकि इसका राष्ट्रीय औसत 1700 व्यक्तियों पर एक डॉक्टर का है। केन्द्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की ताजा रिपोर्ट बताती है कि बिहार में 53 हजार की आबादी पर एक प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र है और वह भी राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के गुणवत्ता मानको के अनुरूप नहीं है तथा स्वास्थ्य व चिकित्सा सेवाओं के मोर्चे पर बिहार में जारी गिरावट का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। चिकित्सा सेवा के क्षेत्र में बदतर प्रदर्शन करनेवाले पांच भारतीय राज्यों की सूची में बिहार प्रथम पायदान पर है। बीते दस सालों में बिहार में नेशनल हाईवे में 1211 किलोमीटर की हुई बढ़ोत्तरी के बावजूद राज्य में प्रति एक लाख की आबादी पर राष्ट्रीय उच्च पथों की लम्बाई मात्र 4.87 किलोमीटर है, जबकि इसका राष्ट्रीय औसत प्रति एक लाख की आबादी पर 7.50 किलोमीटर है।

इसी तरह स्टेट हाईवे में 1610 किलोमीटर की बिहार में हुई पथों की लंबाई में वृद्धि के बावजूद राज्य में प्रत्येक एक लाख की आबादी पर राजकीय उच्च पथों की लंबाई मात्र 201 किलोमीटर है, जबकि इसका राष्ट्रीय औसत 371 किलोमीटर है। दुःखद तो यह कि वर्ष 2006 से 2013 के बीच निर्मित बिहार की अधिकांश पक्की सड़कें इन दिनों जर्जर स्थिति में है। नीतीश बिहार में हर घर नल का जल पहुंचने का ढ़ोल पीट रहे हैं, जबकि राज्य के कुल 45103 गांवों में से 24306 गांवों में फ्लोराइड, आर्सेनिक अथवा कि अत्यधिक लौह युक्त जल की मौजूदगी ने ग्रामीणों का जीना मुहाल कर दिया है। अशुद्ध पेयजल आपूर्ति के मामले में देश के पांच बदतर राज्यों में बिहार पहले स्थान पर है। जहां तक उद्योग-धंधों का संबंध है तो बिहार में आज की तारीख में छोटे-बड़े इंडस्ट्री की कुल संख्या 3345 है यानी कि भारत के कुल इंडस्ट्री का 1.5 फीसदी ही बिहार में है और यही वजह है कि सूबे के 27 प्रखंडों में एक भी बैंक नहीं है। बिहार में 21 हजार की आबादी पर बैंक की एक शाखा है, जबकि इसका राष्ट्रीय औसत 15 हजार की आबादी पर बैंक की एक शाखा की है। बावजूद इसके विकास के नीतीश के दावे बेशुमार हैं पर विकास के लगभग सभी प्रमुख मानको पर राष्ट्रीय औसत के मुकाबले बिहार काफी पीछे है।

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