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जब पूर्व वायुसेना कर्मी ने सबकी वीडियो बना डाली और दरोगा जी की सारी दरोगई निकल गयी!

पटना का पुनाईचक थाना। प्रसिद्ध बेली रोड (जवाहरलाल नेहरू मार्ग) पर मुख्यमंत्री आवास एवं सचिवालय के बिल्कुल पास स्थित।

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पटना का पुनाईचक थाना। प्रसिद्ध बेली रोड (जवाहरलाल नेहरू मार्ग) पर मुख्यमंत्री आवास एवं सचिवालय के बिल्कुल पास स्थित। दिन भर हजारों गाड़ियाँ बेली रोड से गुजरती हैं।

थाने में एक दरोगा- भोला राय पदस्थापित है। काम- सड़क पर खड़े होकर वाहनों की जाँच-पड़ताल करना। किसी भी वाहन में कोई भी कमी दिख गयी, तो यदि वाहन चालक को भारी चालान से बचना है तो बगल में सड़क किनारे बने सुधा डेयरी की दुकान से एक किलोग्राम पेड़ा खरीद कर दो!

फिर पीड़ित भारी चालान से बचने के लिए सुधा डेयरी की उक्त दुकान पर जाता है। वहाँ दुकान सम्भाल रहा कम उम्र युवक जब तक पेड़ा तौलगा, तब तक फोन आ जायेगा कि 360/-₹ रख लो उपर्युक्त पीड़ित से। पेड़ा मत देना। 360/-₹ ही क्यों! क्योंकि सुधा का पेड़ा 360/-₹ प्रति किलोग्राम है!

यदि प्रत्येक घण्टे ऐसे चार भी पकड़े गये तो दिन भर के आठ घण्टे के हिसाब से भी माने तो 32×360= 11,520/-₹ रोज! यह न्यूनतम राशि है। यह बढ़कर 20,000/-₹ या कुछ भी हो सकती है। महीने भर में एक दरोगा की कमाई सोच लीजिये। तनख्वाह इससे इतर है। फिर सरकारी राजस्व को जो चूना लग रहा, वह दीगर।

सुधा डेयरी वाला लड़का खुश होकर बताता है (वीडियो बन रहा पर उसे पता नहीं चलता है) कि इसमें दरोगा भोला राय उसे कुछ नहीं देते हैं। जब ड्यूटी खत्म करके आते हैं, तब एक-एक पैसा वसूल कर चले जाते हैं। हाँ, अब दरोगा भोला राय इसमें अपने साथियों के साथ कितना बाँटते होंगे, ऊपर वरिष्ठों को कितना देते होंगे या अकेले खा जाते होंगे, यह नहीं पता!

हुआ यूँ कि भारतीय वायुसेना में पूर्व में कार्यरत एक युवक जा रहा था अपनी बाइक पर। कुछेक दिन पूर्व ही उसके पॉल्युशन सर्टिफिकेट की वैधता समाप्त हो गयी थी। इसी पर दरोगा भोला राय ने उसे पकड़ा। फिर उसे भारी जुर्माने का भय दिखाया तथा बचने का उपर्युक्त रास्ता भी।

पूर्व वायुसेना कर्मी ने सबकी वीडियो बना डाली और दरोगा जी की सारी दरोगई निकल गयी। तभी हमारे यहाँ भोजपुरी में कहा जाता है कि "दरोगा" मने - 'द', अब चाहे 'रो' के, आ चाहे 'गा' के (दो, अब या तो रो कर या गा कर)!

यदि मैं किसी वरिष्ठ पुलिस अधिकारी से इसकी शिकायत करूँगा, तो कई को देखता हूँ कि वह अपने एक्सटेंडेड फैमिली यानी कनिष्ठ कर्मचारियों के बचाव की मुद्रा में आ जाते हैं। फिर आदतन पुलिसिया रवैया दिखाते हुए कहेंगे कि सामने वाले की भी तो गलती रहती है, तभी तो पुलिस वाले लेते हैं!

एक युवा डीएसपी हैं बिहार में। बिहार के बाहर के। एक परिचित गये थे अपने काम के सिलसिले में। तो अपना रोना लेकर बैठ गये डीएसपी कि बताइये नहीं लेगा पुलिस वाला, तो काम कैसे चलेगा! सरकार कुछ देती है! एक ढँग का ऑफिस भी नहीं दी है। फिर बदले में आपका भी काम होता है कि नहीं! कोई फ्री में थोड़े ही आपसे लेता है! और यह कह कर ₹30 हजार झटक लिए मेरे मूर्ख परिचित से, तब जब इनका मामला जेन्युइन था!

खैर, बिहार में सुशासन तो हैं ही। बिहार क्या पूरे भारत में ही है। कभी-कभी सोचता हूँ कि क्या जिले के पुलिस कप्तान को यह सब नहीं पता रहता होगा कि कौन थाना प्रति महीने कितनी कमाई कर रहा! एक ईमानदार पुलिस कप्तान चाह जाये तो मजाल है कि नीचे के पुलिसकर्मी पैसा बना लेंगे! पर जैसे लेने वाले, वैसे ही देने वाले। फिर पैसा ऐसी चीज़ है न, कि भगवान तो नहीं, पर भगवान से कम भी नहीं! ॐ शांति

कुमार प्रियांक
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