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मोदी सरकार के लिए चुनौती बनी इकोनॉमी, क्या है जीडीपी का खेल जिसमें बीजेपी लगातार हो रही है फेल?

मोदी सरकार के लिए चुनौती बनी इकोनॉमी, क्या है जीडीपी का खेल जिसमें बीजेपी लगातार हो रही है फेल?
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गिरीश मालवीय

कोई माने या न माने लेकिन अब यह साबित हो गया है कि देश के आर्थिक दुर्भाग्य की शुरुआत उसी दिन से हो गयी जब मोदी सरकार द्वारा नोटबन्दी ओर बिना प्लानिंग के जीएसटी लागू करने का निर्णय लिया था. पिछली 6 तिमाही से लगातार जीडीपी की ग्रोथ रेट गिरती ही जा रही हैं. ओर आने वाले समय मे इसमें सुधार होने की कोई उम्मीद नही दिख रही हैं क्योंकि मार्केट में कोई डिमांड ही नही दिखाई दे रही है त्यौहारी ओर शादी ब्याह का सीजन लगने के बावजूद मार्केट में सुस्ती छाई हुई है. ध्यान दीजिएगा कि यह आँकड़े जो जारी हुए हैं यह सितंबर तक के है और हम देख रहे हैं कि मार्केट अक्टूबर ओर नवम्बर में भी नही सुधर पाया है, यानी तीसरी तिमाही में भी सुधार के लक्षण नही दिखाई दे रहे है.

जब नोटबन्दी कि गयी तब ही पूर्व प्रधानमंत्री एवं विश्व में मान्यता प्राप्त अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह ने इसे संगठित लूट और सुनियोजित कानूनी दुरूपयोग बताते हुये दो प्रतिशत कमी आने की आशंका जीडीपी के लिये बता दी थी ओर यह बात कालांतर में बिल्कुल सच साबित हुई लेकिन उस वक्त तो भक्तों पर भक्ति का नशा छाया हुआ था, वो नशा अब धीरे धीरे हिरन हो रहा है

पिछले साल देश के मुख्य आर्थिक सलाहकार रहे अरविंद सुब्रमण्यम ने भी साफ साफ कह दिया था कि नोटबंदी का फैसला देश की अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा झटका साबित होगा.

कल बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने तीसरी तिमाही के जीडीपी ग्रोथ रेट के आंकड़ों पर सवाल उठाते हुए कहा कि असलियत में जीडीपी ग्रोथ रेट 4.5 नही वह 1.5 प्रतिशत है. यानी यह झूठे आँकड़े दिखाकर जनता को भरमाया जा रहा है. इसी बात को सितंबर 2014 से जून 2018 तक नरेंद्र मोदी सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार रह चुके अरविंद सुब्रमण्यन ने हावर्ड यूनिवर्सिटी से प्रकाशित एक रिसर्च पेपर में सिद्ध करके बताया था.

अरविंद सुब्रमण्यम ने इस शोधपत्र में जो सबसे महत्वपूर्ण बात कही थी, वह यह थी कि जीडीपी ग्रोथ रेट की गणना साल 2011 से पहले मैन्यूफैक्चरिंग उत्पादन, मैन्यूफैक्चरिंग उत्पाद और औद्योगिक उत्पादन सूचकांक और मैन्यूफैक्चरिंग निर्यात से निकाली जातीं थी लेकिन बाद के सालों में इस संबंध को लगातार विस्मृत कर दिया जाता रहा है.

सुब्रमण्यम ने अपने शोध पत्र में दिखाया कि किस तरह नेशनल सैंपल सर्वे ऑफिस NSSO ने इस फर्जीवाड़े को अंजाम दिया है. दरअसल उसने एमसीए-21 के नाम से एक नया डाटाबेस बनाया है और उसी से जीडीपी ग्रोथ के आंकड़े निकाले है. जाँच में पता चला है कि उस MCA-21 में शामिल 38% कंपनियां या तो अस्तित्व में ही नहीं थी या फिर उन्हें गलत कैटेगरी में डाला गया था। ऐसा किये जाने से आर्थिक वृद्धि दर औसतन 2.5% ऊंची हो गई हैं

यह फर्जीवाड़ा आज भी चल रहा है

आपको जानकर हैरानी होगी कि इस साल की पहली छमाही में बुनियादी उद्योगों की वृद्धि दर महज 1.3 फीसदी रही जबकि पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में इसमें 5.5 फीसदी का इजाफा हुआ था। जीएसटी संग्रह भी अक्टूबर महीने में लगातार तीसरे महीने 1 लाख करोड़ रुपये से कम रहा है। राजस्व संग्रह पिछले साल अक्टूबर महीने की तुलना में 5.3 प्रतिशत कम रहा। अक्टूबर माह में चालू वित्त वर्ष के 7 महीनों में कर संग्रह में सबसे तेज गिरावट दर्ज की गई है. ताजा आँकड़े तो मैन्युफैक्चरिंग दर को शून्य के भी नीचे बता रहे हैं. यानी भविष्य के आसार बद से बदतर हो रहे हैं.

सबसे बड़ी बात तो यह है कि देश का राजकोषीय घाटा अक्टूबर के अंत में 7.2 लाख करोड़ रुपये पुहंच गया है. और बजट में पूरे साल के लिए लगभग 7.1 लाख करोड़ का अनुमान लगाया गया था यानी कि सिर्फ 7 महीने में साल भर का घाटा हो गया है. हालात इतने बदतर है कि मोदी सरकार द्वारा राज्यो को जीएसटी लगाने से हुई क्षतिपूर्ति की रकम भी नही दी जा रही हैं.

इतना सब होने का बाद भी मोदी सरकार का झूठा घमंड टूटने को राजी नही है वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण तो इसे मंदी मानने से भी इंकार कर रही है. शायद तब इसे मंदी माना जाएगा जब छोटे मोटे रोजगार में लगे हर आदमी के हाथ मे कटोरा आ जाएगा, ओर ऐसा ही चलता रहा तो वह दिन भी दूर नही है.

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