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SBI बनाम जनता

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रामभरत उपाध्याय

2 जून 1806 में बैंक ऑफ कलकत्ता की स्थापना हुई। जिसको 1809 में जाकर बैंक ऑफ बंगाल कर दिया। इसके कुछ सालों बाद बैंक ऑफ बॉम्बे और बैंक ऑफ मद्रास अस्तित्व में आये।ये तीनों बैंक ब्रिटिश भारत में खूब फलने फूलने लगे। 27 जनवरी 1921 को बैंक ऑफ बंगाल, बैंक ऑफ बॉम्बे व बैंक ऑफ मद्रास का आपस में विलय होकर इम्पीरियल बैंक ऑफ इंडिया की स्थापना हुयी।आजादी के बाद 1 जुलाई 1955 को इम्पीरियल बैंक का नाम बदलकर स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया की स्थापना हो गई। वर्तमान में SBI की 22141 ब्रांचों में लगभग 3 लाख कर्मचारी कार्यरत हैं। SBI का शुद्ध मुनाफा सरकारी नीतियों की कृपा से निरन्तर बढ़ता ही जा रहा है।

SBI का उपर्युक्त परिचय भले ही कोई जानता हो या ना जानता हो। मगर SBI के अधिकांश कर्मचारियों के ग्राहकों के प्रति अमानवीय व्यवहार व निष्ठुरता से हर कोई परिचित जरूर होगा।

लीजिए SBI के साथ एक कड़वा अनुभव:-

स्कूल से 9 व 11वीं कक्षा के पंजीकरण शुल्क के चालान बैग में रखकर, मास्क व हैलमेट लगाकर बाइक को औसत से तेज भगाते हुए मैं SBI मैन ब्रांच छीपीटोला आगरा दोपहर 1 बजे पहुँच गया। आनन फानन में बाइक स्टैंड पर लगाकर गेट पर तैनात लम्बे चौड़े सिक्योरिटी गार्ड से थर्मल स्क्रीनिंग कराके अंदर घुश गया।

काफी बड़े वातानुकूलित भवन के इस ब्रांच में बीसों अलग अलग काउंटर हैं। जिनमें से लेनदेन के कुछ चुनिंदा काउंटरों पर काफी भीड़ पंक्तिबद्ध खड़ी रहती है। मैंने एक काउंटर पर शीशे व मार्बल की केबिन में बैठे एक sbi कर्मचारी से पूछा कि चालान फीस किस काउंटर पर जमा हो रही सर ? उसने नजरों से इशारा करते हुए बोला उस लाइन में लग जाओ।

मैं लगभग 30 लोगों के पीछे लाइन में लगकर अपनी बारी का इंतजार करने लगा। मैंने लाइन में लगे अन्य लोगों के हाव भाव देखकर आसानी से पता कर लिया कि उनमें से आधे वित्तविहीन स्कूलों के मास्टर ही हैं जो मेरी तरह ही अपने अपने स्कूलों के चालान जमा करने आये हैं। लगभग 20 मिनट लाइन में लगे समय में अभी पंक्ति से केवल 2 लोग ही फ्री होकर निकल पाये थे। अब तक लाइन में मेरे पीछे भी 6-7 लोग अन्य आ खड़े हुए थे। काउंटर पर धीमी गति से काम होते देख लोगों ने कुलबुलाना शुरू कर दिया था। केबिन में चालान कम्प्यूटर पर चढ़ाकर पैसे लेने वाली SBI कर्मचारी एक प्रौढ़ महिला थी। तो लाइन में लगे कुछ अति उत्साही व परेशान लोग दबी जुबान से उस महिला कर्मचारी को केंद्रित करके खरी खोटी सुना रहे थे। तभी वो महिला कर्मचारी लंच के लिए अपनी चेयर से खड़ी होकर चली गई। लेकिन लाइन अपनी यथा स्थिति में बनी रही क्योंकि लाइन से निकल कर इधर उधर बैठने में सबको अपना स्थान गंवाने का डर था।

मैं भी एक हाथ में बैग व एक हाथ में हेलमेट लिए कभी इस पैर पर वजन कभी उस पैर पर वजन लिए खड़ा रहा। 2 बजे करीब मैडम अपनी कुर्सी पर फिर विराजमान हो गई। कुछ लोग बिना लाइन के मैडम को अपना चालान देने की कोशिश करते तो अन्य लोग उन पर फुंफकार पड़ते और बोलते हम लोग पागल हैं क्या जो घण्टों से खड़े हैं यहाँ। लाइन में कुछ प्यार से समझाने वाले भी थे। अब अगले आधे घंटे में लाइन से मुश्किल से 4 लोग ही निबट पाये थे। अब लाइन में लगे भूंखे प्यासे लोगों का धैर्य जवाब दे रहा था।लेकिन मैडम ने चालान जमा करने की अपनी स्पीड को तनिक नहीं बढ़ाया।

"हराम की खा रहे हैं साले सब"

"भीड़ ज्यादा है तो अन्य काउंटर पर बांट नहीं सकते क्या"

इस बैंक का तो हमेशा का रवैया यही है" इस तरह से कुछ लोग तो भद्दी भद्दी बातें भी SBI कर्मचारियों के लिए बोल रहे थे। 3 बजने को थे तभी एक अन्य काउंटर पर किसी कर्मचारी ने चालान जमा करना शुरू कर दिया जानकारी होते ही आधी भीड़ उधर पहुंच गई।

इस तरह 4 बजते बजते अभी दोनों काउंटरों पर आधी भीड़ ही सिमट पाई होगी तब तक केबिन के अंदर बैठी महिला कर्मचारी अपनी बोतल से पानी पीकर खड़े होकर बोलती है कि अब किसी का चालान जमा नहीं हो पायेगा। सुबह आना आज कम्प्यूटर सही से काम नहीं कर रहा।

यह सुनकर लाइन में 2 घण्टे से खड़े लोगों की गुस्सा, क्षोभ व तनाव की सीमा ना रही। उनमें से कुछ बुदबुदाते हुए घर चले गए। फिर भी करीब10 लोग अभी भी काउंटर पर मोर्चा लिये खड़े थे उनमें से मैं भी था। कुछ देर बाद लाइन में खड़ी एक लड़की का व एक एसएसपी ऑफिस में कर्मचारी बताने वाले का चालान उस मैडम ने जमा कर लिया। यह देख हम सात आठ लोगों को भी उम्मीद जग गई। उनमें से तीन लोग अन्य काउंटर पर जमा कर आये। अब मैडम वाले काउंटर पर मुझ सहित चार लोग शेष थे। 5 बजने को थे।एक और चालान हाथ में लेकर मैडम हम तीन से बोली अब तुमारा कल जमा होगा।चूंकि अब अगला नम्बर मेरा ही था तो मैं मैडम से रिक्वेस्ट करते हुए बोला प्लीज मैम बहुत दूर से आया हूँ मेरा भी जमा कर लो। मैडम पर मेरी बात का कोई असर ना हुआ वह अपनी दिनभर की रोकड़ सम्भालने में लग गई।

कुछ क्षण रुककर मैंने फिर मैडम से चालान जमा करने की रिक्वेस्ट की।तो मैडम ने बड़ी क्रूरता से कहा"मैं नहीं जमा करूँगी सुना नहीं क्या" अब मेरा गुस्सा सातवें आसमान पर था। महिला के लिए कुछ मुंह से निकल नहीं जाए इसलिये मैं दूसरे काउंटर की तरफ बड़ गया।

दूसरे काउंटर पर घर जाने की जल्दी में बैठे अधेड़ उम्र के कर्मचारी ने भी मेरी एक ना सुनी।

वह बोला" 5 बज गये अब किसी का नहीं होगा। तो मैं अपनी गुस्सा को पीते हुए बोला सर हमारी वजह से5 नहीं बजे हम तो 1 बजे से लाइन में लगे हैं। इसपर वो बोला कि अब तुम जाओगे कि सिक्योरिटी को बुलाऊँ ।

इतना सुनते ही मैं गुस्सा व उत्तेजना में चीखता दहाड़ता हुआ बोला , "बुलाओ सिक्योरिटी को" फिर उसकी मेज पर पूरी ताकत से हाथ मारते हुए चीखा-दहाड़ा कि,"आज अब या तो मेरा चालान जमा होगा या मेरी लाश उठेगी यहाँ से । पता नहीं मुझे अचानक क्या हुआ मैं मरने मारने पर उतारू हो गया। कुछ ही क्षणों में मेरी तेज आवाज को सुनकर मैनेजर, सिक्योरिटी सहित सभी कर्मचारी इकट्ठे हो गए। बैंक मैनेजर ने मुझे प्यार से शांत करते हुए मेरी समस्या पूछी। मैं अपनी आवाज थोड़ा धीमे करके बोला ,"सर दोपहर से भूंखा प्यासा चालान जमा करने लाइन में खड़ा था अब ये समय की दुहाई देकर चालान जमा करने से मना कर रहे हैं।" तब मैनेजर ने अपने कर्मचारियों को हल्का सा डांटते हुए मेरा चालान तत्काल जमा कराया।


Shiv Kumar Mishra
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