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शहादते इमाम हुसैन रज़ि आखिर क्यों?

कत्ले हुसैन अस्ल में मरगे यजीद है, हिजरी कैलेंडर के महीने मुहर्रम की दस तारीख इस्लामी इतिहास का बहुत ही ऐतिहासिक दिन है।

 Majid Khan |  2017-09-30T11:40:22+05:30  |  New Delhi

शहादते इमाम हुसैन रज़ि आखिर क्यों?

डॉक्टर सलीमुद्दीन

कत्ले हुसैन अस्ल में मरगे यजीद है, हिजरी कैलेंडर के महीने मुहर्रम की दस तारीख इस्लामी इतिहास का बहुत ही ऐतिहासिक दिन है। पैगंबरे इस्लाम मुहम्मद सल्लल्लहु अलैहि वसल्लम के नवासे हजïïरत इमाम हुैसन और उनकेे परिवार वालों समेत चालीस लोगों की बगदाद स्थित कर्बला में वक्त केे शासक यजीद के सैनिकों द्वारा कत्ल किये जाने की घटना इस्लामी इतिहास में एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है। इस घटना के कारणों पर न जाकर यदि इस घटना केे प्रमुख संदेश पर विचार करेंगे।

हर साल मुहर्रम के महीने में मुसलमान हजऱत इमाम हुसैन रज़ि की शहादत पर रंजो व ग़म का इज़हार करते हैं। कुछ मुसलमान इस में इतने आगे बढ़ जाते हैं कि वह इस्लाम की असल रुह और तालीमात को भूल जाते हैं। हजऱत इमाम हुसैन ने आखिर अपने घर वालों के साथ जान का नजऱाना क्यों पैश किया?
उनके सामने आखिर वो बड़ा मक़सद क्या था? कि जो जान से भी ज़्यादा अज़ीज़ था? असल वजह खिलाफ़त से मलूकियत (बादशाहत ) की तरफ क़दम बढ़ गये थे! यह इतनी बड़ी तब्दीली थी और गाड़ी पटरी से उतरने की पहली सीढ़ी थी जिसको इमाम हुसैन ने अपनी और ख़ानदान के लोगों का जान का नजऱाना पेश करके कय़ामत तक के लिए उम्मते मुस्लिमां के लिए नमूना छोड़ा है।


इस्लामी रियासत (स्टेट, हुकूमत ) की खुसूसियत

मुल्क ख़ुदा का है, बाशिंदे ख़ुदा की रय्यत हैं. हुकूमत रय्यत के मामले में खुदा के सामने जवाबदेह है. न हुकूमत रय्यत की मालिक है और न रय्यत हुकूमत की ग़ुलाम।

इस्लामी रियासत का मकसद :


नेकियों को कायम करना
बुराईयों को मिटाना खत्म करना


इस्लामी रियायत की रूह : तक़वा ख़ुदातरसी (ईश परायणता)

लेकिन जब गाड़ी पटरी से उतरी तो यह मक़सद खत्म हो गये बल्कि इस्लामी दस्तूर (सविधान ) के बेसिक उसूलों में भी चेंजिंग आगयी। इस दस्तूर के सात अहम उसूल थे।
1- हुकूमत लोगों की आज़ादाना रज़ामंदी से कायम हो, बल्कि लोग अपने मश्ववरे से बहतर आदमी को चुनकर इक़्तिदार उसके सुपुर्द करें। इसके लिए बेअत (वोट ) का तरीका अपनाया गया लेकिन बेअत तलवार की नोक पर लीजाने लगी।


2- हुकूमत अपने सारे काम मश्ववरे से करेगी और मश्ववरे में भी नेक परहेजग़ार अपनी राय में पुख्ताकार लोगों को शामिल रखा गया। मगर बाद में बादशाहत आई तो वह खुद ज़ालिम थे ही उनके मुशीर बेकिरदार चापलूस खुशामद पसंद लोग हुए।

3- इज़हारे राय की आज़ादी : ख़िलाफ़ते राशिदा (यानी हुकूमत की वह अवधी जिसमे हज़रात अबूबकर सिद्दीक़, हज़रात उमर, हज़रत उसमान, हज़रात अली ने शासन किया) में हर व्यक्ति को टोकने टिप्पणी करने का अधिकार था। खलीफा तक पर लोगों ने उनके सामने अतराज़ किये। इस माहौल को पसंद की निगाह से देखा जाता रहा। मगर बाद में यह आज़ादी भी खत्म हो गई।


4- खलीफा और हुकूमत खुदा और रय्यत के सामने जवाब देह होती थी । अल्लाह के रसूल से लेकर खुलफाएराशीदीन तक बहुत सी मिसालें तारीख और सीरत की किताबों में दर्ज है। मगर जब बादशाहत आई तो जवाबदेही का एहसास खत्म हो गया।


5- बेतुलमाल : बैतुलमाल खुदा का माल और जनता की अमानत होता था। खुलफाएराशीदीन ने इस मामले में बहुत इहतियात से काम लिया। बहुत सी मिसालें हैं मगर यहां मौक़ा नहीं। मगर बाद बादशाहत आने के बाद उस में खुर्द बुर्द होने लगा।


6- अल्लाह व रसूल सल्ल के क़ानून की हुकूमत : एक आदमी से लेकर मुल्क को चलानेवाले तक सभी इन कवानीन से जकड़े हुए थे न जुडिशल मैजिस्ट्रेट पर या फौज के कमांडर पर कोई दबाव होता, खलीफा भी अपने मुकदमे के लिये अदालत का मोहताज होता। और एक आम आदमी को भी खलीफा के खिलाफ अदालत में जाने की आज़ादी होती। मगर बादशाहत के बाद कानून का उल्लंघन किया जाने लगा इंसाफ के पैमाने बदल गये मन मानी होने लगी।


7- बराबरी(समानता): मुसलमानों के बीच नस्ल वतन भाषा आदि का कोई फर्क नहीं था।सबके हुकूक बराबर था। श्रेष्ठता का पैमाना चरित्र नैतिकता काबलियत सलाहियत के एतबार से था। मगर बादशाहत जब आई तो रंग नस्ल कबीलों भाषाओं का भेदभाव होने लगा। यह थे वह हालात जिसमें यज़ीद की वलीअहदी बिगाड़ का पहला ज़ीना साबित हुआ !!!


जिसने आगे चलकर उक्त फितनों को जन्म देकर अपनी चर्म तक पहुंचाया । यही वह हालात थे जब इमाम हुसैन रज़ि बिगाड़ के खिलाफ उठ खड़े हुए और गर्दन कटा कर इस्लाम को दुबारा से ज़िंदा किया।

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