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अबे, और खोद भाई, मैं एक ऊंट पर बैठा हुआ हूं

अबे, और खोद भाई, मैं एक ऊंट पर बैठा हुआ हूं
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आधी रात थी। कुत्‍ते बेतरह भौंक रहे थे। एक काली बिल्‍ली इधर से उधर चहलकदमी कर रही थी गोया उसकी जान पर बन आई हो। शरद पूर्णिमा की पूर्णता से ऊबा चांद चौथ मना रहा था। औरतें प्रवासी पतियों से वीडियो चैट कर के करवा तोड़ चुकी थीं। नींद आ रही थी लेकिन उस्‍मान चाचा के किस्‍से चालू थे।

एक मुसाफि़र बन्‍नी के मैदानों से गुज़र रहा था। उसे ज़मीन में कुछ हिलता दिखा। पहले देखा तो लगा कोई बरतननुमा चीज़ है। मिट्टी खोदी तो एक घड़ा निकला। घड़ा बाहर निकलने का नाम ही नहीं ले रहा था गोया भीतर से कोई खींच रहा हो। और मिट्टी खोदी तो एक सिर निकला। सिर जिंदा आदमी का था। आदमी ने कहा- मुझे बाहर निकालो। मुसाफि़र ने और खोदा। आदमी पूरा नहीं निकला। मुसाफिर मुड़ने को हुआ तो धंसे हुए आदमी ने कहा- अबे, और खोद भाई, मैं एक ऊंट पर बैठा हुआ हूं।

आधी रात जब मैं पानी पीने उठा और लगे हाथ झोंपड़े के बाहर चांद को देखने के लिए किवाड़ हटाया, तो सामने एक सियार काली बिल्‍ली को दबोचे मुझे देख रहा था। बिल्‍ली की आखिरी आवाज़ सुनी थी मैंने। मेरे घुड़कते ही वह उसे लेकर झाडि़यों में कहीं गुम हो गया। जितना दिखा, उससे कहीं ज्‍यादा छुपा रह गया। ऐसा रोज़ होता है हमारे साथ।

देखने के लिए सिर्फ नज़र नहीं चाहिए। सुनने के लिए सिर्फ कान नहीं चाहिए। रतजगे आंखें खोलते हैं। कान खोलते हैं। नींद तोड़ो। चांदनी रात में घूमते सियारों को देखो। उसके जबड़े में फंसी काली बिल्‍ली दीख जाएगी।

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