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आंदोलन धरना प्रदर्शन फिर कहाँ किया जाय ? पूर्व आईपीएस ने बताई 1987 और 88 के धरनों की सच्चाई

जब तक जन सरोकार से जुड़ी समस्याएं उपजती रहेंगी, तब तक आंदोलन तो होंगे ही। ऐसे जन आक्रोश से उत्पन्न जन समस्याओं के समाधान के लिये, सरकार को जनता से संवाद बनाये रखने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं है।

 Shiv Kumar Mishra |  8 Oct 2020 2:34 AM GMT  |  दिल्ली

आंदोलन धरना प्रदर्शन फिर कहाँ किया जाय ? पूर्व आईपीएस ने बताई 1987 और 88 के धरनों की सच्चाई
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सार्वजनिक स्थानों पर लंबे समय तक कब्ज़ा कर के धरना प्रदर्शन नहीं किया जा सकता है।

पर कितने समय तक धरना प्रदर्शन करने के लिये सार्वजनिक स्थलों पर टिका रहा जा सकता है ?

यह अवधि अदालत तय करेगी या सरकार ?

विजय शंकर सिंह

शाहीन बाग बहुत लंबे समय तक चलने वाला आंदोलन रहा है। आज सुप्रीम कोर्ट जो यह निर्देश दे रहा है, उसी ने सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ एडवोकेट संजय हेगड़े और एक अन्य सीनियर एडवोकेट को, शाहीन बाग भेज कर उनसे वहां की स्थिति की रिपोर्ट मंगवाई थी। फिर सब कुछ करने के बाद उसने आंदोलनकारियों को सार्वजनिक स्थल को हटाने के लिये, सरकार को किसी प्रकार का निर्देश देने से मना कर दिया था। ज़ाहिर है सुप्रीम कोर्ट, पुलिस का काम नहीं कर सकता है।

शाहीन बाग के पहले 1987 में मेरठ में किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में मेरठ के मंडलायुक्त का आवास और कैम्प कार्यालय का घेराव किया गया था। यह घेराव एक महीने से भी अधिक दिनों तक चला। उस घेराव के दौरान दो किसानों की मृत्यु भी हो गई थी। उनके दाह संस्कार भी वहीं धरना स्थल पर ही किसानों ने किया था। तब वीर बहादुर सिंह मुख्यमंत्री थे और कांग्रेस की सरकार थी। बाद में सरकार ने किसानों की मांग स्वीकार कर ली और यह धरना खत्म हो गया।

इसी प्रकार 1988 में कानपुर में सूती मिलो के मजदूरों द्वारा जूही रेलवे अंडरपास के ऊपर मज़दूर संघठनो ने रेल का ट्रैक जाम कर दिया था। यह ट्रैक दिल्ली और कलकत्ता को जोड़ने वाला प्रमुख ट्रैक था। मैं तब कानपुर में ही नियुक्त था और धरना स्थल मेरे ही क्षेत्र में था। मुझे बराबर वहां रहना पड़ता था। धरना शांतिपूर्ण था।

सरकार ने कहा गया कि रेल यातायात बंद है, और मालगाड़ियों के आवागमन बंद होने से कोयले तथा अन्य वस्तुओं की आपूर्ति भी बाधित हो रही है। ट्रेनें इलाहाबाद से झांसी और फिर वहां से दिल्ली या दिल्ली से लखनऊ, वाराणसी होते हुए दौड़ाई जा रही है। उस समय भी यूपी में कांग्रेस की सरकार थी और, मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी थे।

लखनऊ से कहा गया कि बलप्रयोग करके ट्रैक खाली कराया जाय। पर तब के डीएम वृहस्पति शर्मा और एसएसपी विक्रम सिंह ने इसके लिये मना कर दिया था। क्योंकि पानी की बौछार और लाठी से कुछ नहीं होता। रेलवे ट्रैक पर चारो तरफ पत्थर पड़े थे। भीड़ ज़बरदस्त पथराव कर सकती थी। अंत मे पुलिस को गोली ही चलानी पड़ती। तब बहुत लोग हताहत हो सकते थे। अभी तक तो एनटीसी और बीआईसी की कपड़ा मिलों के ही मज़दूर इस धरने में शामिल थे। तब सभी ऑर्डिनेंस फैक्ट्रियों के मज़दूर भी इस धरने में शामिल हो सकते थे।

यह सारी जटिलतायें, सरकार को बताई गयी और तब जाकर भारत सरकार ने मज़दूरों की कुछ मांगो को माना और कुछ जो मानने का आश्वासन दिया। फिर एनटीसी, बीआईसी और लेबर कमिश्नर के कुछ प्रतिनिधि धरना स्थल पर गए। साथ मे मैं भी था और मेरे साथी एक सेंगर साहब मैजिस्ट्रेट भी थे। वहीं इस बात की घोषणा हुयी कि सरकार ने मांगे मान ली है। फिर डेढ़ दो घँटे में ट्रैक खाली हो गया। यह दुनियाभर में लंबे समय तक रेलवे ट्रैक जाम कर धरना देने का पहला रिकॉर्ड तब के अखबारों ने बताया था।

लोकतंत्र में जनता को अपनी बात कहने और शांतिपूर्ण आंदोलन करने का वैधानिक अधिकार है। इसी अधिकार के अंतर्गत, तरह तरह की यूनियनों के गठन की परंपरा है। धरना प्रदर्शन जब भी होंगे, सार्वजनिक स्थानों, सड़क, पार्क, मैदानों में ही होंगे और बहुधा जिलों में कचहरी में होते हैं क्योंकि वहां कलेक्ट्रेट और पुलिस कार्यालय होता है। उद्देश्य यह रहता है कि कलेक्टर को ज्ञापन दिया जाय और उसके माध्यम से सरकार को अपनी व्यथा बताई जाय।

सुप्रीम कोर्ट को सरकार को यह भी निर्देश देना चाहिए कि, वह लंबे समय तक, जनता द्वारा किये जा रहे धरना प्रदर्शनों के प्रति चुप्पी न साधे रहे। या तो आंदोलनकारियों से उन्हें बातचीत के लिये मेज पर ले आये या उनकी समस्याओं का समाधान ढूंढे।

लोकतंत्र में धरना प्रदर्शन तो होंगे ही और भारत ही नहीं दुनियाभर में ऐसे धरना प्रदर्शन होते हैं। फिर सरकार को एक जगह तय करनी पड़ेगी जहां लोग अपनी बात कह सकने के लिये एकत्र हो सकें। शांतिपूर्ण धरना प्रदर्शन पर किसी भी प्रकार की कोई रोक, आक्रोश को हिंसक बना देती है, यह बात ध्यान में रखना ज़रूरी है।

मेरा अनुभव कहता है कि जवाहरबाग या शाहीन बाग रातोरात नही होता है। सरकार का जब जनता या आंदोलनकारियों से संवाद कम या बंद हो जाता है तो ऐसे बड़े आंदोलन खड़े हो ही जाते हैं। दो दिन जब, निजीकरण और बिजलीघर बेचो अभियान के खिलाफ, पूरे पूर्वी उत्तर प्रदेश की बिजली बंद रही तो सरकार के होश ठिकाने आ गए और सरकार ने बिजली कर्मचारियों की बात मान ली। कल अगर किसान अपने आंदोलन के क्रम में, नेशनल हाइवे जाम कर के बैठ जाए तो सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश लागू कैसे कराया जाएगा, यह मुझे नहीं मालूम है ।

जब तक जन सरोकार से जुड़ी समस्याएं उपजती रहेंगी, तब तक आंदोलन तो होंगे ही। ऐसे जन आक्रोश से उत्पन्न जन समस्याओं के समाधान के लिये, सरकार को जनता से संवाद बनाये रखने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं है।

#vss

( उत्तर प्रदेश के गृह विभाग का एक पुराना सर्कुलर भी है जो आप पढ़ सकते है। )

लेखक यूपी कैडर के पूर्व आईपीएस अधिकारी है

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