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आजादी के अवसर पर सुलगते सवाल, कितनी समस्याओं से कितने आजाद हैं हम!

हर वर्ष की भांति धूम धाम से सम्पूर्ण देश प्रदेश की राजधानियों में सरकारी तंत्र, व राज्य की सरकार बने मंत्री, मुख्यमंत्रियों ने देश की आजादी के समारोह में बढ़ चढ़कर भाग लिया। खूब भाषणों के बल पर नेताओं ने देश की जनता को विकास के लम्बे चोडे सब्ज बाग़ दिखाए।

 Arun Mishra |  2017-08-18 08:59:38.0

आजादी के अवसर पर सुलगते सवाल, कितनी समस्याओं से कितने आजाद हैं हम!

हमारे देशवासियों ने हाल ही में देश के आजादी प्राप्त करने का 71वां सालाना जश्न मनाया है। हर वर्ष की भांति धूम धाम से सम्पूर्ण देश प्रदेश की राजधानियों में सरकारी तंत्र, व राज्य की सरकार बने मंत्री, मुख्यमंत्रियों ने देश की आजादी के समारोह में बढ़ चढ़कर भाग लिया। खूब भाषणों के बल पर नेताओं ने देश की जनता को विकास के लम्बे चोडे सब्ज बाग़ दिखाए।

नेताओं के द्वारा दिए भाषणों में सम्पूर्ण झूठ ही हो ऐसा भी नही है। देश में आजादी के पश्चात विकास खूब हुआ है परन्तु इस विकास में देश के आम आदमी को क्या मिला यह प्रश्न विचारणीय है।
देश की आजादी की लड़ाई में अपने प्राणों की आहुति देने वाले देश के महान शहीदों के सपनों का भारत आज भी नजर नही आता। आजादी की लड़ाई में देश के सभी समुदायों ने समान रुप से भाग लिया था। आजादी की जंग ने हमे एकता के सूत्र में बांधा। साम्प्रदायिकता, भृष्टाचार विहीन अफसरशाही विहीन एक स्वतंत्र स्वयं भू राष्ट्र बनाने के सपने पराधीन भारत के नौजवानों को देश के लिए मर मिटने का संकल्प देते थे।
पराधीन भारत में अंग्रेजो की फूट डालो और राज करो की नीति हम भारत वासियों को कचोटती थी, परन्तु स्वतंत्र भारत के नेताओ के द्वारा आज भी अंग्रेजो की फूट डालो और राज करो की नीति का ही अनुशरण किया जा रहा है। आजादी प्राप्ति के बाद के देखे गये सपनो को आज पूर्ण करने में हम कहाँ तक सफल हुए है, आजादी के पावन अवसर पर इस पर विचार करने की आवश्यकता है। यदि आज के स्वतंत्र भारत राष्ट्र में भगत सिंह, महात्मा गांधी, चन्द्र शेखर आजाद, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान, सीमान्त गांधी , खान अब्दुल गफ्फार, नेहरु, सरदार पटेल यदि जीवित होते तो शायद समान रूप से कहते कि यह हमारे सपनो का भारत देश नही है। असहमति के ये शब्द देश के इन महान सपूतो की आत्मा से निकल कर हमे उनके सपनों का भारत नही बनाने के लिए उनकी पवित्र आत्माए दोषारोपण करती।
देश की आजादी के 70 वर्ष बीत जाने के बाद भी भारत राष्ट्र के तंत्र के सामने स्वतंत्र भारत के गणमान्य नागरिक बेबस और मजबूर बना दिए गये है। डॉ. भीम राव अम्बेडकर के सपनो के भारत में जाती विहीन समाज, सभी के लिए समान रूप से न्याय, प्रगति, शिक्षा, रोजगार के साधन उपलब्ध कराने के कार्य राज्य द्वारा करने थे। दुर्भाग्य से 70 वर्षो का समय बीतने के बाद भी आज देश में दलितों से भेदभाव करना आम बात है। समाज के कमजोर वर्गों के लिए शिक्षा, न्याय, रोजगार के साधन उपलब्ध कराने के मामलो में हम आज भी बहुत पीछे है। देश में आज सरकारी स्कूलो में शिक्षा स्तर गिर रहा है, जहाँ गरीब, किसान, मजदूरो के बेटे पढ़ते हैं। देश की प्रगति का पैमाना हमारी सरकारे चमकते हुए इण्डिया की चमक दमक से मापकर देश की जनता की आँखों में भ्रम पैदा करती है।
देश में अमीर गरीब की खाई बढती जा रही है। सम्पूर्ण देश में शहरी आबादी और ग्रामीण आबादी के बीच सरकारी सुविधाओं को प्राप्त करने में भारी अंतर है। हमारे चमकते हुए इण्डिया के शहरों में इलाज के लिए पांच सितारा सुविधाओं वाले निजी अस्पताल बन रहे है। इसके विपरीत ग्रामीण भारत में दाना मांझी अपनी पत्नी की लाश को कंधे पर ढोकर 10 किमी का सफ़र पैदल तय करता है। दाना मांझी जैसो के लिए सोचने का और कुछ करने का समय हमारी सरकारों के पास नही है।
हाल ही में योगी आदित्यनाथ के उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के बाबा राघव दास मेडिकल कॉलेज अस्पताल में ग्रामीण भारत के 60 से अधिक बच्चे महज इसलिए बेमोत मर गये, उन्हें समय पर ओक्सीजन नही मिली। गोरखपुर जिला उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का गृह जिला है। राज्य के मुख्यमंत्री के गृह जिले में इलाज की सरकारी सुविधाओं का हाल 60 बच्चो की मोत स्वयं ही बयान कर देती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन अनुसार 1000 व्यक्तियों पर 20 डॉक्टर होने चाहिए और हमारे देश में 20 हजार व्यक्तियों की आबादी पर एक डॉक्टर उपलब्ध है। सम्पूर्ण राज्यों मंे चल रही राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन योजना पूर्ण तया भृष्टाचार की भेंट चढ़ने के कारण आपेक्षित परिणाम देने में विफल साबित हो रही है।
देश में हरित क्रान्ति के बाद हमारा देश खाद्यान्न के मामलो के आत्म निर्भर हो गया है फिर भी केंद्र राज्य सरकारों की दोषपूर्ण नीतियों के कारण हमे दलहन का भारी आयात करना पड़ता है। देश में खेती करना जुएँ का व्यापार बन गया है। हमारे देश का किसान कभी सूखे की मार से तो कभी अल्प वृष्टि की मार झेलकर खेती करता है। जब फसल पक कर तैयार हो जाती है तब कर्ज में डूबा किसान अपनी फसल को बाजार मंडी में लेकर जाता है तो उसकी फसल की उचित कीमत उसे कभी नही मिलती है। देश की वर्तमान सरकारों की दोष पूर्ण कृषि नीतियों के कारण फसल के पककर तैयार होने के समय किसान को उसकी फसल का उचित मूल्य नही मिलता। बिचोलिये किसानो से ओने पोने दामो पर उसकी फसल खरीदकर उपभोक्ता को बहुत ऊंची कीमत पर भारी मुनाफे में बेचते है। इस प्रकार किसान और उपभोक्ता दोनों का बाजारवादी व्यवस्था दोहरा शोषण कर रही है I इसे रोकने में हमारी सरकारों की कोई रूचि नही है। इसके परिणाम स्वरुप देश में प्रतिवर्ष हजारो किसान आत्महत्या कर रहे है।
किसानो की बढती आत्म हत्याओं की चिंता देश की सरकारों को नही है। इसके विपरीत देश के सरकारी बेंको का 7 लाख करोड़ रुपया देश के उद्योग पतियों ने दबा रखा है। देश की केंद्र सरकार ने देश के अमीर उद्योग पतियों का एक लाख 10 हजार करोड़ रुपयों का लोन माफ़ कर दिया जबकि कर्ज माफ़ी की मांग के लिए देश के किसानो को सरकार गोलियां दे रही है। देश में प्रतिवर्ष प्राकृतिक आपदा, बाढ का शिकार देश की 15 प्रतिशत आबादी बन जाती है। हर वर्ष पंद्रह से बीस हजार करोड़ रूपये की किसानो की फसले बाढ़ के कारण नष्ट हो जाती है। बाढ़ से निपटने के साधन जितनी मात्र में होने चाहिए वे नही है। प्रतिवर्ष सैकड़ो आदमी बाढ़ के कारण देश में मर रहे है। आज भी देश के हजारो गाँव विद्युत से वंचित है।
आजादी के 70 वर्षो के बाद भी देश के 30 करोड़ लोग बिना बिजली के जीवन जी रहे है। यह बड़ी त्रासद स्थिति है इसके कारण परिवारों पर खासकर महिलाओ एवं बच्चो के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ता है। ये परिवार स्थायी रूप से गरीबी के चुंगल में फंस जाते है तथा इनकी उत्पादकता भी विद्युत् के अभाव में नष्ट हो रही है। इसके कारण हमारा औद्योगिक विकास भी अवरुद्ध हो रहा है । यह विडंबना ही है कि भारत में जैसे जैसे आधुनिकता और स्वंत्रता का विस्तार हुआ है, वैसे महिलाओ के प्रति संकीर्णता का भाव बढ़ा है।
देश में महिला संरक्षण हेतु ढेर सारे कानून बने है- जैसे अनैतिकता व्यापार निवारण, दहेज़ प्रताड़ना, घरेलु हिंसा, बाल विवाह अधिनियम, पोस्को जैसे कठोर कानून बनाने के बाद भी दिनों दिन महिलाओ व् बच्चियों के प्रति अपराध बढ़ते जा रहे है। वर्ष 2014 में राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो अनुसार प्रतिदिन 100 महिलाओ के साथ बलात्कार होता है। 364 महिलाए योन शोषण का शिकार बनती है। आंकड़ो के अनुसार वर्ष 2004 में बलात्कार के 18233 मामले दर्ज हुए जो प्रतिवर्ष बढ़ते हुए वर्ष 2014 में 36735 पर पहुँच गये। इस प्रकार कठोर कानून होने के बाद भी महिलाओ के प्रति देश में अपराध बढ़ रहे है। इसी प्रकार देश मे साम्प्रदायिकता तेजी से बढ़ रही है।
देश में आज गांधीवाद के स्थान पर गोडसे वादी विचारधारा को राज्य की सरकारों में बैठे मंत्री विधायको द्वारा ही बढ़ावा दिया जा रहा है। पराधीन भारत में हम अंग्रेजी शासन को फूट डालने व् राज करने के लिए दोषी मानकर उन्हें कोसते रहते थे। आजादी के 70 वर्षो के बाद भी हम देश में समरसता भाईचारे का वातारण बनाने में पूर्ण रूप से सफल नही हो सके है। वर्ष 1984 में दिल्ली के सिख विरोधी दंगो में व वर्ष 2002 के गुजरात के दंगो में राज्य प्रायोजित हत्या करने के आरोप सत्ताधारी दल के लोगो पर लग चुके है।
सांप्रदायिक दंगो में हमारी पुलिस आज भी निष्पक्ष रूप से समाज को सुरक्षा देने में विफल साबित हो जाती है। अच्छे भले रोज साथ बैठने वाले हमारे समाज के प्रबुद्ध शिक्षित जन भी दंगो में भावनाओ में बहकर हिन्दू-मुस्लिम-सिख बनकर एक दुसरे की जान के प्यासे क्यों हो जाते है। देश में भीड़ के न्याय के रूप में अब धार्मिक हिंसा का नया रूप सामने आया है। तथा कथित रूप से गो मांस रखने के शक में भीड़ की हिंसा में अब तक 100 से अधिक लोग मारे गये है।
पिछले वर्ष देश में हुए साम्प्रदायिक दंगो की संख्या 479 थी जिसमे 107 लोगो की जान गयी। देश में आज दुर्भाग्य से भाजपा के शासन वाले राज्यों में दलितों पर अत्याचार काफी बढ़ गये है। उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में दलित राजपूत संघर्ष नये रूप में सामने आया है। आमतौर पर दलितों के प्रति अपराधो में भी हमारी पुलिस पर भेदभाव पूर्ण, कार्यवाही करने के आरोप लगते है। आज भी हम दलितों के साथ समानता एवं सम्मानपूर्ण व्यवहार देने में कमजोर है। पेयजल की समस्या से आज भी देश की बड़ी आबादी झूझ रही है। बाहरी चुनोतियों के साथ आंतरिक रूप से भी हमारे राष्ट्र को आज हमारे समाज से ही गंभीर चुनोतियों मिल रही है।
देश की बड़ी आबादी के सर पर छत देने के काम करने में हम विफल रहे है। हमारे देश में मंदिर और मस्जिद की राजनीती के नकारात्मक प्रभाव वर्ष 1990 से पड़ने शुरू हुए थे।उनके प्रभाव आज भी हमारे देश की राजनीती, अर्थव्यवस्था पर दिखाई दे रहे है। हमारे देश के साथ ही आजाद हुए और पुन: निर्माण में लगे देशो ने वर्ष 1990 से 2017 तक बहुत उन्नति की है। कोरिया, जापान इंडोनेशिया, ताईवान और समूछे यूरोप महाद्वीप के देश इसके उदाहरण है। विश्व के ये राष्ट्र प्रगति करते रहे है और हमारे देश के नेता और जनता दोनों इन वर्षो में सम्प्रदाय के आधार पर मरने मारने का खेल खेलते रहे। यदि हम देश की राजनीती से धर्म, सम्प्रदाय, जाति को निकाल बाहर करके व्यक्ति और राज्य के विकास की राजनीती करते तो शायद आपेक्षित विकास के परिणाम हमे भी मिलते।
देश की जनता की समस्याओं से बड़ी समस्या मंदिर मस्जिद कहाँ बनेगा यह नही है। देश में आज कार्पोरेट घरानों व नेताओ के मध्य एक गाठजोड़ बना हुआ है। इस गाठजोड़ के इशारों पर देश का मीडिया व् राजनेता देश की जनता की समस्याओ से उसका ध्यान हटाकर काल्पनिक मुद्दे उछालकर आपकी सुविधा की राजनीति कर रहे है। यह देश के विकास के साथ देश की जनता के लिए शुभ नही है। देश में बढ़ता भृष्टाचार देश की गरीबो का दुश्मन बनकर उन तक सरकारी योजनाओं का लाभ नही पहुँचने देता है। देश के नेताओ और देश की जनता को काल्पनिक रूप से बनाए मिथकों के नाम पर राजनीती करने वाले नेताओ के जाल में फंसने से बचने के लिए पहल करनी होगी। यदि हम सभी समाज के लोग देश बदलने के लिए जागरूक बनकर कार्य करें तो देश की राजनीती भी बदलेगी और भारत विश्व में पुन विश्व गुरु यानी सुपर पॉवर बन सकता है।

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लेखक : मो. हफीज, व्यूरो चीफ, राजस्थान

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