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पत्रकार का शत्रु स्वंय पत्रकार, चौथे स्तंभ में लगा ज़ंग, पत्रकारो का हाल बेहाल

 शिव कुमार मिश्र |  2018-01-02 10:02:31.0  |  दिल्ली

पत्रकार का शत्रु स्वंय पत्रकार, चौथे स्तंभ में लगा ज़ंग, पत्रकारो का हाल बेहाल

चाँद फ़रीदी की रिपोर्ट

सत्ता, सदन, सड़क, गलियारा, पक्ष, विपक्ष, संस्था, संस्थान, उपक्रम, फ़िल्म, जनता, समस्या और ना जाने कहा कहा, जो मीडिया की चमक और ख़बर के बिना अधूरा औऱ अधूरा ही रहता हैं।

सत्ता, सदन, सड़क, गलियारा, पक्ष, विपक्ष, संस्था, संस्थान, उपक्रम, फ़िल्म, जनता, समस्या और ना जाने कहा कहा, जो मीडिया की चमक और ख़बर के बिना अधूरा औऱ अधूरा ही रहता हैं।

टीवी, अखबार और खबर ज़िन्दगी का एक हिस्सा बन चुका है, बच्चो से युवा, युवा से बुढ़ापे तक हर कोई खबर का इस तरह आदी हो चुका है, कि सुबह की चाय बिना खबर और टीवी के अधूरी रहती हैं।मीडिया ने समाज, सत्ता औऱ छूते-अनंछुते पहलू को ज़िन्दगी का अध्याय बना दिया हैं।

मीडिया, वास्तविकता औऱ सच्चाई से परे एक पहलू का सामना जो पत्रकार करता है, पत्रकार के उस असहनीय दर्द को शायद ही कोई समझता हो, या समझने का प्रयास करता हो।गांधी स्टाईल पत्रकार समाज से लुप्त हो चुके है, परन्तु साइकिल या बाइक द्वारा पत्रकारिता युग मे पत्रकार का रंग बदल चुका है। पत्रकारिता के बदलते परिवेश में पत्रकार दिन रात, सर्दी गर्मी और बरसात में अपने ऊपर सैकड़ों सितम ढा कर, छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी खबर को आम आदमी तक पहुचाने के काम को अंजाम देता है।

आज का पत्रकार नगर हो ग्रामीण परिवेश में खबर पर नज़र बनाए रखने के अधिकार और फ़र्ज़ को निभाने के लिये तत्यपर और आतुर रहता हैं।

पत्रकार के इस कठिन परिश्रम में पत्रकार को कुछ चन्द संस्थान द्वारा आंसू पोछने वाला मात्र सहयोग प्राप्त होता हैं, वरना अनगिनत संस्थान अपने पत्रकार का शोषण करना अपना एकमात्र अधिकार समझते है। पत्रकार को अपनी दिनचर्या में चाय और पेट भरने के लिए दो रोटी मुश्किल से ही प्राप्त होती है।ख़बर बनाने में समाज औऱ समाजिक उत्त्पीडऩ, समस्या और आम आदमी की लड़ाई लड़ने वाले पत्रकार की मुहिम को कोई अंजाम देने में कोई अपना साथ देने का प्रयास नही करता है। पत्रकार का शत्रु स्वयं पत्रकार ही बन रहा है, पत्रकार की सवेंदना से खिलवाड़ करने वाले पत्रकार संगठन भी अपना उल्लू सीधा करते रहते हैं, पत्रकार संगठन में मुख्यता दो चार पत्रकार अपने निजी स्वार्थ के चलते अपनो को ही ठेंगा और सब्ज़ बाग दिखाने का काम करते हैं। जिसके चलते समाज मे पत्रकार का दिन प्रतिदिन शोषण, उत्त्पीडऩ औऱ गोली का शिकार होना आम बात हो रही है। मगरमच्छ आँसू बहाने वाले पत्रकार संगठन शोक सभा, श्रंद्धाजलि के नाम पर सरकार के ऊपर दबाव बना कर दुनिया से बेज़ार हो चुके पत्रकार के परिवार को चन्द रुपये दिलवाने का काम कर अपनी इतिश्री समझ लेते है।

छोटा परिवार सुखी परिवार, यह कहावत पत्रकार समुदाय पर कदापि लागू नही होती हैं, छोटा परिवार होने के पश्चात पत्रकार अपना पेट तो भर नही पाता है, जुगाड़ की गाड़ी से अपना जीवनयापन्न प्रतिस्पर्धा के तौर पर करता है, बच्चो की आवयश्कता को पूरा करने औऱ नकामी से बचने के लिए अधिक से अधिक समय घर से बाहर रह कर अपने दायतिव्व का ढिंढोरा पीटना पत्रकार अपना लक्ष्य मान लेता हैं। घर, परिवार, पत्नी और बच्चो से सदैव आँख मिचौली का खेल औऱ अपने सम्बंधो के मध्य दिनचर्या का हिस्सा बन जाती हैं।

कभी कभी लाइव एनकाउंटर, दुर्घटना स्थल और रात के तीसरे पहर में अपना जीवन दांव पर लगा कर खबर पर पैनी नज़र रखते हुए, आम आदमी तक खबर पहुचाते पहुचाते अपनी जीवन लीला को समाप्त कर लेता है।घर, परिवार, पत्नी और बच्चो को सांत्वना के अतिरिक्त औऱ कुछ नही मिलता हैं।

पत्रकार सवेंदना पर यदि लिखता रहूं, तो लिखने का दर्द कभी समाप्त नही हो सकता हैं, पत्रकार के दर्द को समझना होगा, पत्रकार हित की बात धरातल पर उतारना होगा तथा पत्रकार की मूलभूत सुविधा को पत्रकार आसानी से प्राप्त कर सके, या अत्यंत आवश्यक हैं।पत्रकार संगठन अनगिनत ना होकर संगठित होकर, पत्रकार हित की लड़ाई लड़ी जाए, छोटा बड़ा, सीनियर जूनियर की खाई को समाप्त कर 'पत्रकार, पत्रकार का शत्रु ना बने'।

टीवी, अखबार और खबर ज़िन्दगी का एक हिस्सा बन चुका है, बच्चो से युवा, युवा से बुढ़ापे तक हर कोई खबर का इस तरह आदी हो चुका है, कि सुबह की चाय बिना खबर और टीवी के अधूरी रहती हैं।मीडिया ने समाज, सत्ता औऱ छूते-अनंछुते पहलू को ज़िन्दगी का अध्याय बना दिया हैं।
मीडिया, वास्तविकता औऱ सच्चाई से परे एक पहलू का सामना जो पत्रकार करता है, पत्रकार के उस असहनीय दर्द को शायद ही कोई समझता हो, या समझने का प्रयास करता हो।गांधी स्टाईल पत्रकार समाज से लुप्त हो चुके है, परन्तु साइकिल या बाइक द्वारा पत्रकारिता युग मे पत्रकार का रंग बदल चुका है। पत्रकारिता के बदलते परिवेश में पत्रकार दिन रात, सर्दी गर्मी और बरसात में अपने ऊपर सैकड़ों सितम ढा कर, छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी खबर को आम आदमी तक पहुचाने के काम को अंजाम देता है।
आज का पत्रकार नगर हो ग्रामीण परिवेश में खबर पर नज़र बनाए रखने के अधिकार और फ़र्ज़ को निभाने के लिये तत्यपर और आतुर रहता हैं।
पत्रकार के इस कठिन परिश्रम में पत्रकार को कुछ चन्द संस्थान द्वारा आंसू पोछने वाला मात्र सहयोग प्राप्त होता हैं, वरना अनगिनत संस्थान अपने पत्रकार का शोषण करना अपना एकमात्र अधिकार समझते है। पत्रकार को अपनी दिनचर्या में चाय और पेट भरने के लिए दो रोटी मुश्किल से ही प्राप्त होती है।ख़बर बनाने में समाज औऱ समाजिक उत्त्पीडऩ, समस्या और आम आदमी की लड़ाई लड़ने वाले पत्रकार की मुहिम को कोई अंजाम देने में कोई अपना साथ देने का प्रयास नही करता है। पत्रकार का शत्रु स्वयं पत्रकार ही बन रहा है, पत्रकार की सवेंदना से खिलवाड़ करने वाले पत्रकार संगठन भी अपना उल्लू सीधा करते रहते हैं, पत्रकार संगठन में मुख्यता दो चार पत्रकार अपने निजी स्वार्थ के चलते अपनो को ही ठेंगा और सब्ज़ बाग दिखाने का काम करते हैं। जिसके चलते समाज मे पत्रकार का दिन प्रतिदिन शोषण, उत्त्पीडऩ औऱ गोली का शिकार होना आम बात हो रही है। मगरमच्छ आँसू बहाने वाले पत्रकार संगठन शोक सभा, श्रंद्धाजलि के नाम पर सरकार के ऊपर दबाव बना कर दुनिया से बेज़ार हो चुके पत्रकार के परिवार को चन्द रुपये दिलवाने का काम कर अपनी इतिश्री समझ लेते है।
छोटा परिवार सुखी परिवार, यह कहावत पत्रकार समुदाय पर कदापि लागू नही होती हैं, छोटा परिवार होने के पश्चात पत्रकार अपना पेट तो भर नही पाता है, जुगाड़ की गाड़ी से अपना जीवनयापन्न प्रतिस्पर्धा के तौर पर करता है, बच्चो की आवयश्कता को पूरा करने औऱ नकामी से बचने के लिए अधिक से अधिक समय घर से बाहर रह कर अपने दायतिव्व का ढिंढोरा पीटना पत्रकार अपना लक्ष्य मान लेता हैं। घर, परिवार, पत्नी और बच्चो से सदैव आँख मिचौली का खेल औऱ अपने सम्बंधो के मध्य दिनचर्या का हिस्सा बन जाती हैं।
कभी कभी लाइव एनकाउंटर, दुर्घटना स्थल और रात के तीसरे पहर में अपना जीवन दांव पर लगा कर खबर पर पैनी नज़र रखते हुए, आम आदमी तक खबर पहुचाते पहुचाते अपनी जीवन लीला को समाप्त कर लेता है।घर, परिवार, पत्नी और बच्चो को सांत्वना के अतिरिक्त औऱ कुछ नही मिलता हैं।
पत्रकार सवेंदना पर यदि लिखता रहूं, तो लिखने का दर्द कभी समाप्त नही हो सकता हैं, पत्रकार के दर्द को समझना होगा, पत्रकार हित की बात धरातल पर उतारना होगा तथा पत्रकार की मूलभूत सुविधा को पत्रकार आसानी से प्राप्त कर सके, या अत्यंत आवश्यक हैं।पत्रकार संगठन अनगिनत ना होकर संगठित होकर, पत्रकार हित की लड़ाई लड़ी जाए, छोटा बड़ा, सीनियर जूनियर की खाई को समाप्त कर 'पत्रकार, पत्रकार का शत्रु ना बने'।

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