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एक थे कर्पूरी ठाकुर

आज 24 जनवरी है . कर्पूरी जी का जन्मदिन . मुझे नहीं लगता ,यह उनका असली जन्मदिन होगा .

 प्रेम कुमार मणि |  2018-01-24 13:12:25.0  |  पटना

एक थे कर्पूरी ठाकुर

आज 24 जनवरी है . कर्पूरी जी का जन्मदिन . मुझे नहीं लगता ,यह उनका असली जन्मदिन होगा . कर्पूरी जी जिस तरह के परिवार से ताल्लुक रखते थे , वैसे परिवारों में बच्चों के जन्म के रिकार्ड रखने का प्रचलन उस दौर में नहीं था . बच्चे जब गुरूजी के पास जाते थे , 'नाम लिखाने ' के रस्म के समय अभिभावक और गुरु एक संक्षिप्त संवाद के उपरांत खता - बही में कोई तारीख लिख देते थे . अभिभावक तो अधिक से अधिक मौसम और त्योहारों के इर्द -गिर्द का समय बता पाते थे . तारीख -वर्ष निर्धारित करना गुरूजी का काम होता था . लेकिन यह तारीख अब कर्पूरी जी की तारीख हो चुकी है . इसलिए आज उन्हें याद किया जाना बिलकुल उचित है .

सब जानते हैं ,उनका जन्म एक गरीब पिछड़े नाई परिवार में हुआ . मुश्किलों के बीच पढाई हुई और फिर पढाई छोड़कर वह स्वाधीनता आंदोलन में कूद पड़े . उनका सूबा बिहार स्वाधीनता आंदोलन के साथ अन्य कई तरह के आंदोलनों का केंद्र था . स्वामी सहजानंद सरस्वती के नेतृत्व में किसानों का मुक्ति संघर्ष चल रहा था ,तो पिछड़े वर्गों का त्रिवेणी संघ अभियान भी . 1934 में पटना में ही जयप्रकाश नारायण के प्रयासों से कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना की गई थी . 1939 में इस सूबे में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का भी जन्म हो गया था . ऐसे में स्वाभाविक था कर्पूरीजी वन्दे मातरम छाप स्वाधीनता आंदोलन से न जुड़कर उद्देश्यपूर्ण समाजवादी समझ वाली आज़ादी की लड़ाई से जुड़े . उनके राजनैतिक संघर्ष का लक्ष्य समाजवादी समाज की स्थापना था .
आज़ादी के बाद , जैसा कि सबको मालूम है सोशलिस्ट लोग कांग्रेस से अलग हो गए . कर्पूरी जी धीरे -धीरे समाजवादी पार्टी और आंदोलन के प्रमुख नेता बने और फिर दो बार बिहार के मुख्य मंत्री भी . न ही वह समाजवादी आंदोलन के सबसे बड़े नेता थे ;और न ही लम्बे समय तक रहने वाले मुख्यमंत्री . सब मिलाकर मुश्किल से वह तीन -साढ़े तीन साल सरकार में रहे होंगे . उनसे अधिक समय तक मुख्यमंत्री रहने वाले अनेक लोग हुए . लेकिन उनलोगों ने वैसी छाप नहीं छोड़ी, जैसी कर्पूरी जी ने . वह आज इस शिद्दत से याद किये जाते हैं तो इसका कारण यह है कि उनने राजनीति को नए अर्थ और रंग दिए .
जब भी वह सत्ता में आये अपनी ताकत का इस्तेमाल गरीब -गुरबों के लिए किया . 1967 की संयुक्त विधायक दल की सरकार में वह उपमुख्यमंत्री थे . शिक्षा विभाग उनके पास था . उस वक़्त स्कूलों में छात्रों को हर महीने शुल्क देना होता था . इसके कारण तेजी से ड्राप आउट होता था .गरीब बच्चे अर्थाभाव में स्कूल छोड़ देते थे . कर्पूरीजी ने फीस ख़त्म कर दी . अंग्रेजी की अनिवार्यता के कारण खासकर लड़कियों और किसान -मजूर परिवार के बच्चों की बीच में ही पढाई टूट जाती . नान मैट्रिक होने का उपहास वे झेलते रहते थे . कर्पूरीजी का मानना था अंग्रेजी के बिना भी कुछ क्षेत्रों में अच्छा किया जा सकता है . उनने अंग्रेजी की अनिवार्यता ख़त्म कर दी . इसे धूर्त ताकतों ने इस तरह प्रचारित किया मानों ,उन्होंने अंग्रेजी की पढाई ही बंद करवा दी . अंग्रेजी की अनिवार्यता ख़त्म होने से शिक्षा का ज्यादा प्रसार हुआ ,जो स्वाभाविक था . 1971 में कुछ समय केलिए मुख्यमंत्री हुए तब अलाभकर जोतों से मालगुजारी खत्म कर दी . 1977 में मुख्यमंत्री हुए तब पिछड़े वर्गों को सरकारी सेवाओं में आरक्षण देने सम्बन्धी मुंगेरीलाल कमीशन की सिफारिशें लागू कर दी . पूरे उत्तर भारत में इसी के साथ सामाजिक न्याय की राजनीति की शुरुआत हुई . इसके कारण उन्हें मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा . लेकिन वह अपनी लड़ाई से डिगे नहीं . गरीबों ,मजदूर -किसानों , महिलाओं और हाशिये के लोगों को मुख्यधारा में लाना ही उनकी राजनीति का मक़सद था . उन्होंने हमेशा राजनीति को विचार और संवेदना से जोड़कर देखा . कवि मुक्तिबोध संवेदनात्मक ज्ञान और ज्ञानात्मक संवेदना की बात करते थे . कर्पूरी जी राजनैतिक प्राणी थे और उन्होंने हमेशा संवेदनात्मक राजनीति को प्रश्रय दिया . 1977 में वह मुख्यमंत्री थे ,तब नगर निगम के एक सफाई कर्मचारी ठकैता डोम की पुलिस हाज़त में हत्या हो गयी . कर्पूरी जी ने मामले की लीपापोती नहीं की ,जैसा कि ऐसे मामलों में सरकारें करती हैं .उन्होंने पुलिस की गलती मानी .ठकैता को उन्होंने पुत्रवत खुद मुखाग्नि दी . यह थे कर्पूरी ठाकुर .
कहते हैं एक बार उनके मुख्यमंत्री रहते उनके पिता को गांव के मनबढ़ू सामंतों ने अपमानित किया . जिला मजिस्ट्रेट अपराधियों पर कार्रवाई करना चाहते थे ,कर्पूरी जी ने रोक दिया . यह एक गांव की बात नहीं थी . गांव -गांव में ऐसा हो रहा था . वह ऐसे उपाय करना चाहते थे कि सामंतवाद की जड़ें सूख जाएँ . कुछ हद तक उन्होंने कर दिखाया . इसीलिए कर्पूरी ठाकुर को बिहार के सामंतों ने कभी मुआफ नहीं किया . 1980 के दशक में बिहार के ग्रामीण इलाकों में जब नक्सलवादी आंदोलन गहराया ,तब सामंती ताकतों के बीच से नारा उठा -' नक्सलबाड़ी कहाँ से आई ; कर्पूरी की माई बिआई .' सामंतों द्वारा घृणा का यह पुरस्कार ऐरे -गैरे नेताओं को नहीं मिलता है . इसके लिए गरीबों से प्रतिबद्धता प्रदर्शित करनी होती है .
कर्पूरी ठाकुर के चित्रों और मूर्तियों पर आज चाहे जितना माल्यार्पण हो जाय ,मुझे मालूम है उनके रास्ते पर चलने का साहस कोई नहीं कर पायेगा . भूमिसुधार आयोग और कॉमन स्कूल सिस्टम के लिए गठित आयोग की सिफारिशें ठन्डे बस्ते में धरी -पड़ी हैं . न कोई इसे लागू कर रहा है ,न इसे लागू करने केलिए कोई आंदोलन कर रहा है . गरीबों की चिंता किसी को नहीं है . ऐसे उदास माहौल में कर्पूरी जी कुछ ज्यादा ही याद आते हैं .

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