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नीरव मोदी और चौकसी का नाम लेने से क्यों बचे पीएम मोदी ? 'कड़ी निंदा ' से काम चलेगा क्या ?

 शिव कुमार मिश्र |  2018-02-27 11:02:08.0  |  दिल्ली

नीरव मोदी और चौकसी का नाम लेने से क्यों बचे पीएम मोदी ? कड़ी निंदा  से काम चलेगा क्या ?


तो आखिरकार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी बैंकिंग घोटालेबाजों के खिलाफ 'कड़ी कार्रवाई ' वाला बयान दे दिया है . बीजेपी के बयानवीर नेताओं और सत्ताधीश मंत्रियों के बयानों के बाद शिखर से भी आवाज आई है हम 'कड़ी कार्रवाई' करेंगे . कड़ी कार्रवाई , कड़ी निंदा से आगे वाला बयान है . 'कड़ी निंदा' में कुछ न कर पाने की लाचारी छिपी होती है . 'कड़ी कार्रवाई' में थोड़ी हनक, धमकी या चेतावनी .

केन्द्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने तो अपनी ऊंगलियां घुमा -घुमाकर बीते साढ़े तीन सालों पर आतंकी घटनाओं की इतनी बार कड़ी निंदा की है कि लोग उन्हें 'निंदा मंत्री' कहने लगे हैं . सोशल मीडिया पर उनके निंदा भाव को लेकर सैकड़ों चुटकुले और जोक्स सर्कुलेट होते रहते हैं . सरहद पर जैसे ही कोई घटना होती है लोग कहने लगते हैं कि अब राजनाथ सिंह दो -चार 'निंदा बम' मारेंगे और पाकिस्तानी ढेर हो जाएंगे . अब बेचारे राजनाथ सिह कर भी क्या सकते हैं , अपने बयानों में ऐसे शब्द खर्च करने के सिवा . विपक्ष में रहकर बोलने वालों के लिए जब करने की बारी आती है तो उन्हें पता चलता है कि दोनों में फर्क क्या है . वरना हर शहीद जवान के सिर बदले दस -दस सिर ले न आते . सत्ता बड़े -बड़े बयानवीरों को बेचारा बना देती है . मनमोहन सिंह का तो सबने नामकरण ही मौनमोहन सिंह कर दिया था . वो वैसे भी कम बोलते थे . ऊपर से इतने घोटाले हो गए कि जो भी थोड़ा -बहुत बोलते , उसके लायक भी नहीं रह गए थे . तभी तो कोयला घोटाले पर जब संसद में बार -बार उनकी फजीहत हो रही थी तो उन्होंने 'खामोशी' पर तंज कसने वालों को शायराना अंदाज में जवाब देते हुए शेर पढ़ा, 'हज़ारों जवाबों से अच्छी है मेरी खामोशी, न जाने कितने सवालों की आबरू रखी' .
फिलहाल बात पीएम मोदी की . पीएनबी के खजाने को हजारों करोड़ का चूना लगाकर चंपत हुए मामा -भांजा यानि नीरव मोदी और मेहुल चौकसी के कारनामे पर देश जब बौखलाया हुआ है तो पीएम ने 'कड़ी कार्रवाई' वाला बयान दिया है . ऐसा सनातन सरकारी बयान जो दशकों से हर नेता देता रहा है . ऐसे ही सरकारी टाइप का बयान देंगे तो मोदी जी और बाकी जी में क्या फर्क रह जाएगा ? वो दहाड़ , वो ललकार , वो वादे , वो इरादे और ये शाकाहारी बयान . कड़ी कार्रवाई वाला . मामा -भांजा के कारनामों के भांडाफोड़ के दो हफ्ते बाद पहली बार पीएम बोले हैं . ऐसा नहीं है कि वो बोले नहीं हैं . बोले हैं . देश के कई कोने में बोले . चुनावी राज्य वाली रैलियों में बोले हैं . सरकारी कार्यक्रमों में बोले हैं . विपक्ष के भ्रष्टाचार पर बोले हैं . हां , नीरव मोदी पर पहली बार बोले हैं . वो भी किसी का नाम लिए बगैर . एक तो देर से बोले और बोले भी इतना ही बोले . ग्लोबल बिजनेस सम्मिट में इतना भर कहा कि 'ये सरकार आर्थिक विषयों से संबंधित अनियमितताओं के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई कर रही है , करती रहेगी और करेगी ' . न किसी के नाम का जिक्र . न किसी के काम का जिक्र . न बैंक का नाम लिया , न चूनेबाज मामा -भांजे का . विरोधी तंज कस रहे हैं कि यही मोदी 2014 के पहले तो बड़ी -बड़ी बातें करते थे , अब बैंक लुट गया तो सिर्फ कड़ी कार्रवाई की बात कर रहे हैं , वो भी दो हफ्ते बाद . लोकसभा चुनाव के पहले गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के भाषणों की क्लिपिंग सोशल मीडिया में तैर रही है . उनके समर्थकों को मुंह चिढ़ा रही है .

तब भाषणों में मोदी कहते थे - ' आप मुझे प्रधानमंत्री बन बनाओ . मुझे देश का चौकीदार बनाओ . मैं दिल्ली में बैठकर चौकीदारी करूंगा और खजाने पर किसी को पंजा नहीं मारने दूंगा ' . देश ने उन्हें चौकीदार बना दिया . खजाना उनके हवाले कर दिया . अब जब वो खजाने को घोटालेबाजों के पंजे से नहीं बचा सके तो सिर्फ कड़ी कार्रवाई का सनातन सरकारी बयान दे रहे हैं . लोग कह रहे हैं कि ये 56 इंच के सीने की बात करने वाले और चौकीदारी की कसम खाने वाले मोदी तो ये मोदी नहीं हैं . मोदी जी ने नीरव मोदी का नाम तक नहीं लिया . उस मेहुल चौकसी का भी नाम नहीं लिया , जिसे कारोबारियों की एक सभा में पीएम मोदी 'हमारे मेहुल भाई' कहकर संबोधित कर चुके हैं . 'मेहुल भाई' वाला वो वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल है . लोग पूछ रहे हैं कि अगर मोदी जी अभी विपक्ष में होते और यूपीए सरकार में ये घोटाला होता तो वो कैसे -कैसे बयान देकर सरकार को छील रहे होते . अब कसूर तो उनका है तो पीएम नरेन्द्र मोदी में 2014 के पहले वाला नरेन्द्र मोदी खोज रहे हैं . ये तो उन्हें समझना होगा कि विपक्ष की बात कुछ और होती है , सत्ता की कुछ और . विपक्ष जब सत्ता में आता है तो विपक्षी भाव कुर्सी में तिरोहित हो जाता है . इस बात को मोदी से अधिक आज कौन समझ पा रहा होगा .अपने आसमानी वायदों का जो पहाड़ उन्होंने चुनाव के पहले बनाया था , उसी पहाड़ से पत्थर छिटक- छिटककर उन पर गिर रहे हैं . मई 2014 से पहले के उनके बयानों और भाषणों का वीडियो खोज -खोजकर लोग आज के संदर्भ में सवाल बनाकर वायरल कर दे रहे हैं . अब ये तो न मोदी जी को पता होगा , न उनके थिंक टैक को , कि एक वक्त ऐसा भी आएगा कि उनके ही भाषण उनके विरोधियों के राशन का काम करेंगे . चुनाव से पहले वायदों और बयानों के इतने गुब्बारे छोड़े गए थे कि अब हर रोज उन गुब्बारों की हवा निकल रही है . फुला देना आसान है . फुलाए रखना और आसमान में टिकाये रखना आसान नही. कांग्रेस सरकार की नाकामियों का कवच -कुंडल पहनकर कब तक विरोधियों पर तीर चलाते रहेंगे ? कांग्रेस ने किया जो किया , वो भोगा और भोग रही है . केन्द्र में 44 सीटों वाली पार्टी है . 19 राज्यों से बेदखल हुई पार्टी है . अब बात तो अपनी भी होनी चाहिए . चार साल जो होने जा रहे हैं .
नीरव मोदी के मामले में सत्ता समर्थक मुनादी दस्ता घोटालों की बुनियाद को यूपीए कार्यकाल में खिसकाकर अपने सत्ताधीश का कॉलर ऊंचा रखने की कोशिश कर रहा है लेकिन सच लगातार कई शक्लों में सामने आ रहा है . बीते दो सालों में बैंक से जारी करीब तीन सौ LOU और बैंकों की मिलीभगत से हो रहे घोटाले दामन पर दाग की तरह चिपक चुके हैं . चाहे जिस भी डिटर्जेंट भी धोने की कोशिश कर लें , जिद्दी दाग बयानों के 'रिन' से नहीं साफ होने वाला है . कोई वाशिंग पाउडर बेदाग नहीं कर पाएगा . बैंकों के अधिकारियों की मिलीभगत से घोटाले हो रहे थे . रिजर्व बैंक आंख बंद किए बैठा था . पीएमओ तक शिकायतें जा रही थी . सालों -साल से खेल चल रहा था . यहां से चूना लगाकर दावोस में पीएम के साथ ग्रुप फोटो खिंचवा रहा था . तो चौकीदार क्या कर रहा था ? ये सवाल तो बनता ही है न ? जिस पंजे से खजाने को बचाने की बात कर रहे थे , वो पंजा वहां तक पहुंचकर खजाना लूट गया न ? तो सवाल तो आपकी चौकीदारी पर है न ? सवाल इसलिए भी है कि चौकीदार का असाइनमेंट भी खुद नरेन्द्र मोदी ने लिया था .
वरिष्ठ पत्रकार अजित अंजुम की कलम से




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