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संवेदनहीनता की सभी सीमा लांघती यह दो रुला देने वाली घटनाएँ!

एक तरफ पढ़े-लिखे युवक, दूसरी तरफ अनपढ़-गंवार कहा जाने वाला गांव का युवक। मगर मानसिकता में दोनों एक जैसे! दुर्ग का संदीप कवि था, राजकोट का संदीप प्रोफेसर था।

 शिव कुमार मिश्र |  2018-01-17 03:02:02.0  |  राजकोट

संवेदनहीनता की सभी सीमा लांघती यह दो रुला देने वाली घटनाएँ!

गिरीश पंकज की कलम से

पिछले दिनों दिल दहला देने वाले कुछ ऐसे वाकये हुए, जिन्होंने मानवता को शर्मसार तो किया ही, यह सोचने पर भी बाध्य कर दिया कि हम कौन थे, क्या हो गए और क्या होंगे अभी! छत्तीसगढ़ के दुर्ग में संदीप नामक व्यक्ति ने अपने वृद्ध माता-पिता की गोली मार कर हत्या कर दी। उधर गुजरात के राजकोट में संदीप नाम के ही दूसरे व्यक्ति ने अपनी वृद्ध बीमार मां को छत से फेंक दिया। सोचिए कि किन हसरतों के साथ इनके मां-पिता ने इन्हें जन्म दिया होगा, पाला-पोसा होगा। लेकिन इन्होंने अपने ही घर और जीवन में अंधियारा भर दिया। माता-पिता तो बेटों के धोखे के साथ जीवन से 'मुक्त' हो गए, मगर वे निर्मम-नालायक बेटे अब जीवन भर जेल में जीवन का अंधेरा भोगेंगे। जिस दिन दुर्ग के संदीप ने माता-पिता की हत्या की, उसी दिन एक गांव के शराबी युवक ने भी कुल्हाडी से अपनी मां की हत्या कर दी। एक तरफ पढ़े-लिखे युवक, दूसरी तरफ अनपढ़-गंवार कहा जाने वाला गांव का युवक। मगर मानसिकता में दोनों एक जैसे! दुर्ग का संदीप कवि था, राजकोट का संदीप प्रोफेसर था।
तीसरा गांव का युवक बेरोजगार था और शराब के नशे में धुत्त रहता था। इन दिनों जेल में बंद दुर्ग के संदीप को मैं जानता था। दो बार उससे मिल भी चुका हूं। उसकी कविता-लेखन में रुचि थी। वह मंच पर छा जाना चाहता था, इसलिए चुटकुलों की चाशनी में लपेट कर कविताएं प्रस्तुत करता था और श्रोताओं से तालियां पिटवा लेता था। लेकिन किसी को क्या पता था कि इस कवि के पीछे एक बड़ा खतरनाक हत्यारा भी छिपा बैठा है। राजकोट के संदीप के पास भी कोई कमी नहीं थी। लेकिन उसको मस्तिष्क आघात की शिकार हो चुकी अशक्त मां बर्दाश्त नहीं हुई। वह मां जिसने उसे पाल-पोस कर इस लायक बनाया कि वह प्रोफेसर बन सके।
मैं सोचता हूं कि मां या पिता की हत्या करने वालों ने कभी श्रवण कुमार की कहानी सुनी होगी या नहीं। बेशक सुनी होगी। लेकिन त्रासदी यही है कि आज की युवा पीढ़ी ऐसे पाठों को याद नहीं करना चाहती जो उसे जीवन मूल्यों से जोड़ते हैं। उसे केवल अनैतिकता के अनेक पाठ कंठस्थ हैं। नैतिकता के सारे पाठ वह भूल जाना चाहती है। उसे लगता है कि वह हमेशा के लिए जवान ही रहने वाली है, कभी बूढ़ी नहीं होगी। घर-घर की यही कहानी नजर आती है। जो घर बचे हुए हैं वे प्रणम्य हैं।
हाल ही में हमने यह भी पढ़ा कि माता-पिता की सारी संपत्ति अपने नाम करा कर बेटे ने माता-पिता को ही घर से बाहर कर दिया। अनेक माता-पिता आर्थिक दृष्टि से बहुत संपन्न होने के बावजूद निर्धन बन कर किसी वृद्धाश्रम में रहने पर विवश हो रहे हैं। यह सब देख कर लोग सोचने पर विवश हो जाते हैं कि ऐसी शिक्षा किस काम की जो आदमी को अपने पैरों पर खड़ा करने के बाद अपनी ही जड़ों को नष्ट करने पर आमादा कर दे! यह कैसा समाज बनता जा रहा है! पहले ऐसी घटनाएं कम ही सुनने को मिलती थीं। अब ऐसी खबरें आम हो रही हैं। सीसीटीवी कैमरों के जरिए अनेक चेहरे बेनकाब हो रहे हैं। समाज इन चेहरों को देख कर लज्जित हो रहा है। फिर भी यह नहीं कहा जा सकता कि कोई सबक सीखेगा। अनेक कानून बने होने के बावजूद तरह-तरह के अपराधों में कमी नहीं हुई।
अपने सामने ऐसी निर्मम दुनिया को देख कर हम सब सोचते हैं कि इसका समाधान क्या है। क्या बच्चों को बहुत पढ़ाना-लिखाना अपराध है? या जो अनपढ़ रह जाते हैं वे मनुष्य बने रहते हैं? दोनों का उत्तर है, नहीं। बच्चों को पढ़ाना-लिखाना चाहिए। वे अपने पैरों पर भी खड़े हों, लेकिन यह भी बेहद जरूरी है कि उन्हें जीवन भर यह शिक्षा मिलती रहे कि तुम्हें बेहतर मनुष्य भी बनाना है। वह मनुष्य जो करुणा से लबरेज हो। जो वंचितों की सेवा करे। इसी में जीवन की सार्थकता है। मनुष्य होने की परिभाषा है। शिक्षा के साथ-साथ बच्चों को ऐसे पाठ निरंतर पढ़ाने चाहिए। लेकिन अब विद्यालयों से नैतिकता के पाठ खत्म होते जा रहे हैं। कभी नैतिक शिक्षा, बागवानी और साहित्य-कला की कक्षाएं हुआ करती थीं, मगर इन सबको समय की बर्बादी बता कर बंद कर दिया गया। परिणाम हमारे सामने है कि कोई मासूम बच्चा नन्ही-सी बच्ची के साथ बलात्कार कर बैठता है, तो कोई बच्चा अपने साथी की हत्या कर देता है। ये तमाम विकृतियां हम देख रहे हैं। मुझे लगता है कि श्रवण कुमार जैसे कुछ और चरित्र हमारे साहित्य मनीषियों को गढ़ने चाहिए और साहित्य या मीडिया के विभिन्न माध्यमों के द्वारा शहर और गांव तक उन्हें पहुंचाना चाहिए, ताकि बेटों के दिमाग में अपने माता-पिता की हत्या जैसी बात भी नहीं पैदा हो!

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