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तारीख 3 जनवरी और गाथा है सावित्री बाई फूले की जो जोति राओ फूले के बिना अधूरी है

 शिव कुमार मिश्र |  2018-01-04 03:22:08.0  |  दिल्ली

तारीख 3 जनवरी और गाथा है सावित्री बाई फूले की जो जोति राओ फूले के बिना अधूरी है

जब ब्राह्मणवाद दौर था. ब्राह्मणवाद रूढ़िवादी सोच के साथ पैर फैला रहा था. छोटी उम्र में लड़कियों को ब्याह दिया जा रहा था, पति की मौत होने पर उसी छोटी उम्र की लड़की को अपना सर गंजा कर सारी उम्र विधवा के रूप में काटनी पड़ती थी, छोटी उम्र में लड़की को गर्भवती होना पड़ता था, जो नहीं हो पाती थी उस पर धब्बा लगा दिया जाता था और संतान के लिए मर्द की दूसरी शादी कर दी जाती थी.


सावित्री बाई फूले की शुरुवात की कहानी भी इसी रास्ते से हो कर गुज़रती है लेकिन नये मोड़ का रुख कर लेती है. नौं साल की उम्र में मांग में सिंधूर भरने वाली सावित्री बाई फूले की खुशकिस्मती ये थी की उनकी शादी जोति रओ फूले से हुई.सावित्री बाई फूले की ज़िम्मेदारी जब जोति राओ फूले के कंधो पर आयी, तभ जोति राओ फूले की उम्र महज 13 साल थी.

जोति राओ फूले की सोच में बदलाव की घड़ी तब आयी जब उन्होंने "थॉमस पैने" की किताब "द राइट्स ऑफ़ द मैन" का अध्यन किया.उनके व्यक्तित्व पर शिवाजी, जॉर्ज वाशिंगटन, मार्टिन लूथर किंग जैसी शख्सियतों का खासा प्रभाव हुआ जिसके तहत उन्हों निर्णय लिया की वो सावित्री बाई फूले को पढ़ाएंगे और फिर यहीं से साधारण दलित के घर पैदा होने वाली लड़की, सावित्री बाई फूले कहलायी जो आगे जाकर ब्राह्मणो की रूढ़िवादी सोच के लिए कड़ा मुकाबला साबित हुयी.इस लिए जब भी सावित्री बाई फूले की दास्ताँ छेड़ी जाएगी तो ज़िक्र हमेशा जोति राओ फूले का भी आएगा वरना सब अधूरा रह जायेगा.
एक दफा सावित्री बाई फूले के भाई नाराज़गी जाहिर करते सावित्री बाई से कहने लगे
"तुम शूद्रों को पढ़ाती लिखाती हो, उनके साथ उठती बैठ ती हो लोग तुम्हारे बारे में बातें करते है जो मेरी बर्दाश्त से बहार है"
इस पर सावित्री बाई कहने लगी " खैर मेर शूद्रों को पढ़ाना लिखना उन्हें काबिल बनाना ब्राह्मणो के जानवर पूजन से तो बेहतर है मेरे काम में इंसानियत की झलक तो मिल सकती है.उच्च जाती से आना और मानवता में भेद भाव रखना ये कितना सही है?"
वो वक़्त कुछ ऐसा था जब इस तरह की ज़हनियत रखने वाली औरत होना दुश्मनी पैदा कर सकता था और ये हुआ भी.
ब्राह्मणो की कुरीतियों के खिलाफ हवा बनाने वाले दोनों सावत्री बाई फूले और उनके पति जोति राओ फूले उनको मारने की सुपारी भी दी गयी.जिन्होंने सुपारी दी वो स्वर्ण जाती से तालुक रखते थे और जिन दो नौजवानो को सुपारी दी वो दलित थे.
जब वो हत्या के लिए पुहंचे तो जोति राओ फूले को बताने लगे की उनको मारने के मकसद से आए हैं और हज़ार-हज़ार दोनों युवकों को मिला है.इस पर जोति राओ फूले ने कहा,
"हाँ ज़रूर, वो मरने को त्यार हैं अगर हज़ार-हज़ार से उन नौजवानो के घरों में किसी प्रकार की ख़ुशी आ सकती है" इस जवाब को सुन कर नौजवानो ने हथियार फैंक अपनी गलती का एहसास किया और वही नौजवान बाद में फूले के साथ मानव भलाई के कार्यों में जुड़ गए.
किसी गुनाह से कम नहीं होता था किसी और जाती में शादी करना.मार-काट शुरू हो जाती थी, खून गिरा नज़र आता था जब कोई ऊंची जाती का अपने से नीची जाती वाले के साथ शादी करले. गणेश और शारजा की कहानी का भी यही अंजाम होता अगर सावित्री बाई फूले ना होती. गणेश जो की जात से ब्राह्मण था और शारजा जो की महार जाती से आती थी, दोनों ने इश्क़ किया और शारजा 6 महीने की गर्भवती हो गयी. गाओं वालीं को पता चला और कतल के लिए दौड़ पड़े. सावित्री बाई फूले भी पहुंची और संवाद करने लगी. गाओं वालों को डराया की अंग्रेजो के क़ानून के मुताबिक अगर तुम इनके साथ किसी तरह की बर्बरता या बदसलूकी करते हो तो तुम्हारा हश्र भी बुरा ही होगा, अंत में घबराये गाओं वालों ने निर्णय लिया की इन् दोनों को गाओं से बेदखल कर दिया जाए.इस तरह सावित्री बाई फूले ने गाओं वालों से न केवल उन्हें बचाया बल्कि गणेश और शारजा को उस वातवरण से दूर भी भिजवा दिया जो उनके मोहबत को परवान नहीं चढ़ने दे सकता था.
सावित्री बाई फूले और जोति राओ फूले की खुद की कोई संतान नहीं थी.जिस वजह से कुछ समय बाद जोति राओ फूले पर दबाव बनाया गया की तुम्हे अगर सावित्री से औलाद का सुख नहीं है तो तुम दूसरी शादी करलो जिस पर जोति राओ फूले ने जवाब दिया " अगर कोई मर्द अपनी बीवी को माँ बन ने का सुख नहीं दे पाता तो क्या समाज औरत को ये हक़ देता है की वो दूसरी शादी करले? और किसी और मर्द से बच्चे की आस रखे. ऐसा हो तो उस मर्द पर क्या बीतेगी जिसकी बीवी उस मर्द की परेशानी नहीं समझ पायी और उसने दूसरी शादी करली".
परिस्थितियां शायद सावित्री बाई फूले की ज़िन्दगी में भी उसी तरह दस्तक देती जैसे उस वक़्त की अन्य महिलाओं की ज़िन्दगी में दे रही थी लेकिन जोति राओ फूले की एक पहल ने उनकी ज़िन्दगी को एक नये सांचे में घड़ा.
लंकेश त्रिखा उर्फ़ बादशाह.

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