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गाय को माता भी कहते है क्या ?

 महेश झालानी |  2017-10-22 09:39:46.0  |  जयपुर

गाय को माता भी कहते है क्या ?

बच्चे आज जानना चाहते हैं कि स्कूलों में जो सीख दी जाती थी वो आज झूठी कैसी हो गई. जी हां वही सीख कि गाय हमारी माता है. गाय को हम गौ माता भी कहते हैं. दरअसल सवाल ये उठ रहा है कि भला कोई मां का मांस भी खाता है क्या. बहरहाल मार्कंडेय काटजू ने तो उस निबंध पर ही सवाल खड़ा कर दिया है जिसमें जाने कितने बच्चों ने कलम घिसकर लिखा था कि गाय को गौमाता भी कहते हैं. अब मां और ममत्व को जानवर कहकर शर्मिंदा किया जा रहा है. आज स्कूलों के टीचर्स गफलत की स्थितियों में फंसे हुए हैं. क्योंकि वो गाय के बारे में बच्चों को क्या बताएं. क्या ये भी बताएं कि निबंध में शामिल कर लीजिए कि गाय का मांस भी खाया जाता है, गाय कोई माता नहीं बल्कि जानवर है. गाय राजनीति का मुद्दा है. गाय चुनाव जीतने की तरकीब है. या गाय हत्या की वजह है. गाय, गौमांस के बीच सियासत खुद का फायदा तलाश रही है. बांट रही है समाज को, विश्वास को, लहू को. पर भला इन सबके बीच गाय का क्या दोष. वो तो बेजुबान है न.

बहरहाल कहीं बीफ पर आंशिक प्रतिबंध है तो कहीं पर पूरी तरह इस पर रोक लगी हुई है.


लेकिन मुद्दा तो ये है कि जिन राज्यों पर पूरी तरह से रोक लगी है वहाँ बड़े की बिरियानी के बोर्ड कैसे लगे हैं ? मतलब तो ये हुआ कि सरकार का रूख अभी नरम ही है. वो अपने ही कानून को पूरी तरह से धता साबित कर रही है. भारत के 29 राज्यों में से 10 राज्यों में गाय, बछड़ा, बैल, सांड, भैंस, या फिर कहें कि बीफ पर को प्रतिबंध नहीं है. बाकी अन्य राज्यों में गौहत्या पर पूरी या आंशिक तौर पर रोक लगी हुई है. पर इसके बावजूद भारत बीफ का सबसे ज्यादा निर्यात करने वाले देशों में से एक है. इसके साथ ही जहन में सवाल उठता है कि रोक के बावजूद भला कैसे बीफ का इतना बड़ा निर्यातक भारत है.

दरअसल बीफ के लोगों के बीच पसंदीदा होने का कारण भी आपको बता देते हैं. बकरे, मुर्गे और मछली के गोश्त से बीफ सस्ता होता है जिसके कारण गरीब तबकों में भी इसका आहार किया जाता है. खासकर ये कई मुस्लिम, ईसाई, दलित और आदिवासी जनजातियों के बीच इसका उपभोग होता है. बीस से पच्चीस रूपये प्लेट मिलने वाली बिरयानी के सहारे लोगों के निवाले में बेजुबान पशुओं को परोसा जाता है. फिर उन तमाम संदेशों को, उपदेशों को धरा पर घिस घिस कर मिटा क्यों नहीं देते, उनके लिए भी कोई कब्र क्यों नहीं मुकर्रर कर देते जो हमेशा कानों के पास आकर जुगाली करती रहीं कि बेजुबानों को मारना पाप है. अजी आज लाठी-डंडों से ही नहीं बल्कि उनके अस्तित्व को ही मिटा दिया जाता है. लगता है कि भारत की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए बाकी धंधे कम पड़ गए थे क्यो साहब.

हाल ही में हरियाणा और महाराष्ट्र में गौ-हत्या का विरोध करते हुए कानून बनाए गए. लेकिन उनका खिलाफत करने के लिए तख्तियां चमकने लगीं, जुमले तैयार होने लगे, शायद कुछ लोगों को ये नामंजूर था. गौ-हत्या पर केंद्रीय स्तर पर कोई कानून लागू नहीं है. हालांकि विभिन्न राज्यों में अपने स्तर पर रोक दशकों से लागू है. गाय, बछड़ा, बैल और सांड की हत्या पर इन 11 राज्यों में प्रतिबंध है. भारत प्रशासित कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश, महराष्ट्र, छत्तीसगढ़, और दो केन्द्र प्रशासित राज्यों यानि की दिल्ली, चंडीगढ़ में ये रोक लागू है. गौ-हत्या क़ानून के उल्लंघन पर सबसे कड़ी सज़ा भी इन्हीं राज्यों में तय की गई है. हरियाणा में सबसे ज़्यादा एक लाख रुपए का जुर्माना और 10 साल की जेल की सज़ा का प्रावधान है. वहीं महाराष्ट्र में गौ-हत्या पर 10,000 रुपए का जुर्माना और पांच साल की जेल की सज़ा है. जबकि छत्तीसगढ़ के अलावा इन सभी राज्यों में भैंस के काटे जाने पर कोई रोक नहीं है.

अब आईये आंशिक प्रतिबंध वाले राज्यों की बात करते हैं तो इसका मतलब ये है कि गाय और बछड़े की हत्या पर पूरी तरह प्रतिबंध है जबकि बैल, सांड और भैंस को काटने और खाने की छूट है. इसके लिए कुछ नियम भी बनाए गए हैं. जैसे की पशु को फिट फॉर स्लॉटर का सर्टिफिकेट मिला हो. इसका आधार तय पशु की उम्र, काम करने की क्षमता को देखकर किया जाता है. आंशिक प्रतिबंध मूलतया आठ राज्यों में लागू है. जिसमें बिहार, झारखंड, ओडिशा, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक, गोवा और चार केंद्र शासित राज्यों – दमन और दीव, दादर और नागर हवेली, पांडिचेरी, अंडमान ओर निकोबार द्वीप समूह शामिल हैं.

फिलवक्त दादरी मामले ने गाय को सियासी मुद्दा कहें या फिर हिरोईन बना दिया है. लेकिन सवाल वहीं का वहीं है कि बच्चे गाय का मतलब क्या समझें. मां मानें या जानवर. अगर मां समझे तो मां का मांस खाने वालों को क्या उपमा दी जाए. निश्चित ही अब निबंध की शक्ल कुछ और होगी. क्योंकि ये देन है राजनीति के कुछ उन पुरोधाओं की जो खुद को देश का जिम्मेदार बताते हैं.

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