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कन्हैया को नेता बनाने की रणनीति

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awdhesh

लेखक अवधेश कुमार वरिष्ठ पत्रकार

तो कन्हैया कुमार को वामपंथ के एक लोकप्रिय नेता के रुप में उभारने की रणनीति जारी है। माकपा के महासचिव सीताराम येचुरी ने ऐलान कर दिया है कि कन्हैया पश्चिम बंगाल चुनाव में उनके प्रचारक होंगे। कन्हैया की गिरफ्तारी के साथ ही वामदलों के सभी वरिष्ठ-कनिष्ठ नेताओं ने भाजपा विरोधी नेताओं को एकत्रित करना आरंभ किया। जेएनयू में प्रतिदिन प्रदर्शन में वे शामिल होते रहे, सभी बड़े वकीलों को उसके लिए खड़ा किया। उसे सशर्त और अंतरिम जमानत मिली तो सारे मीडिया को वहां जमाकर उसका भाषण करवाया गया। उसके बाद उसकी पत्रकार वार्ता भी हुई। आम तौर पर छात्र संघों के नेताओं की कवरेज विश्वविद्यालय के संवाददता करते हैं जो कनिष्ठ होते हैं। यहां टीवी चैनलों के संपादक ही कवरेज करने, उसका साक्षात्कार कर रहे हैं।
तो यह रणनीति का प्रतिफल है। हम नहीं कहते कि कन्हैया ने देश विरोधी नारे लगाए। वह वहां उपस्थित था। लेकिन जरा सोचिए, कितनी सफल रणनीति है कि न्यायालय ने सशर्त जमानत देते समय इतनी सख्त टिप्पणियां की है, गैंगरिन के इलाज में जिस तरह अंग काटा जाता है उसी तरह जेएनयू के इलाज की बात की है। लेकिन इनकी रणनीति के कारण न्यायालय की टिप्पणियों और जमानत की शर्तों पर ये चर्चा को ही हाशिए में डाल चुके हैं। वामदलों के चेहरे पर खुशी है कि उनको एक लोकप्रिय चेहरा मिल गया है।


यही भाजपा और वामदलों में अंतर है। अगर कन्हैया की जगह किसी भाजपा के कार्यकर्ता या छात्र नेता पर देशद्रोह का आरोप लगा होता तो मेरा अपना अनुभव है कि भाजपा अध्यक्ष से लेकर कोई बड़ा नेता इस तरह जमावड़ा नहीं करते, न उसके पक्ष में नेताआंें को और मीडिया को मोबिलाइज करते। हो सकता है उसे अकेले इससे निपटना पड़ता या उसका जीवन भी बर्बाद हो जाता। वापस आने के बाद इस तरह भाषण और पत्रकार वार्ता का तो सवाल ही नहीं उठता। कांग्रेस इस मामले में भाजपा से थोड़ा बेहतर है। भाजपा के इसी आचरण के कारण लोग उत्साह में आकर उसे वोट देते हैं पर कुछ ही समय बाद निराश भी हो जाते हैं।


भाजपा की ओर से अभी तक यह कोशिश भी नहीं हुई है कि कन्हैया जो कुछ बोल रहा है उसका प्रभावी प्रतिवाद किया जाए। न्यायालय की टिप्पणियांे को सामने लाया जाए। ऐेसे में कन्हैया हीरो तो बनेगा ही और लोगों के अंदर भी यह धारणा बनेगी कि वाकई उसके साथ अन्याय हुआ है। आखिर देश विरोधी इतने खतरनाक नारे लगे जिसके विरुद्ध पूरे देश में गुस्सा था वह कहां चला गया? ऐसा लगता है जैसे वह मुद्दा अब है ही नहीं। क्यों? उसे याद दिलाने की जिम्मेवारी किसकी है?
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