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जन्मदिन विशेष: बाप की चलती तो शहंशाह-ए-कव्वाली नुसरत फतेह अली खान

 Shiv Kumar Mishra |  13 Oct 2020 4:55 PM GMT  |  दिल्ली

जन्मदिन विशेष: बाप की चलती तो शहंशाह-ए-कव्वाली नुसरत फतेह अली खान
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संजय रोकड़े

उस्ताद नुसरत फतेह अली खान का जन्म 13 अक्टूबर 1948 को पकिस्तान के पंजाब प्रान्त के फैसलाबाद शहर में हुआ था। नुसरत फतेह अली खान का असली नाम था परवेज फतेह अली खान। उनके पिता फतेह अली खान भारत के मशहूर कव्वाल थे। नुसरत फतेह अली खान का एक छोटा सा परिचय यह भी है कि उनको शहंशाह-ए-कव्वाली कहा जाता है।

नुसरत साहब का खानदान पिछले 600 सालों से कव्वाली गाते आ रहा था। नुसरत साहब ने पहले अपने पिता से तबला सिखा बाद में उन्होंने अपने चाचा सलामत अली खान से हारमोनियम का ज्ञान लिया। नुसरत 16 साल के थे जब उनके पिता की मौत हो गयी थी। नुसरत अपने पिता के श्रद्धांजलि कार्यक्रम में आयोजित कव्वाली प्रोग्राम में पहली बार लोगों के सामने आकर कव्वाली गाई। नुसरत के पिता उन्हें कव्वाल नहीं बनाना चाहते थे। वे समझते थे की कव्वाली में उनका दर्जा एक छोटे आदमी के जैसा होता है।

वो कौन सी घटना थी जिसने नुसरत के पिता का मूड ही बदल दिया। उस समय भारत में 'मुनावर अली खान' नाम के एक गायक हुआ करते थे। मुनावर, 'बडे गुलाम अली' साहब के बेटे थे। एक बार मुनावर साहब का पाकिस्तान जाना हुआ। नुसरत के पिता फतेह से उनकी पहले से ही दोस्ती थी।

मुनावर ने फतेह से कहा कि वह पाकिस्तान में आकर बहुत निराश हुए हैं, जिसके कारण उन्हें भारत वापस जाना पड़ेगा, क्योंकि उन्हें साथ में गाने के लिए एक अच्छा तबला वादक नहीं मिल रहा है, जिस कारण वह पाकिस्तान के दर्शकों को खुश नहीं कर पा रहे है। फतेह ने नुसरत की तरफ इशारा करते हुए दिखाया कि ये आपकी मदद कर सकता है।

नुसरत की छोटी उम्र को देखकर 'मुनावर' ने मूंह सुकोड लिया, उनके चेहरे के एक्स्प्रेशन्स को देखकर फतेह ने मुनावर से कहा कि 'भले ही ये मोटा दिखाई पडता हो लेकिन इसका दिमाग काफी तेज चलता है' फिर क्या था, उसी वक्त नुसरत का ट्रायल शुरू हो गया। नुसरत जानते थे कि आज ही चांस है जिसे भुना लिया गया, तो उन्हें पढ़ाई से छुटकारा मिल जाएगा, और उन्हें भी पिता और दादा की तरह संगीत में ही करियर बनाने की अनुमति मिल जाएगी।

नुसरत ने बिजली की गति से तबले पर अपनी उंगलियां चलाईं और इस कदर लय मिलाई कि मुनावर एकदम खुश हो गए। उत्साहित होकर 'मुनावर' ने नुसरत के पिता से कहा कि 'फतेह तुम्हारा बेटा बहुत ही टैलेंटेड है, मैं हार गया, तुम्हारा बेटा जीत गया। इस बात को सुनकर फतेह बहुत अधिक खुश हुए और अपने बेटे को 'डॉक्टर' बनाने का अपना पुराना प्लान बदल दिया। यह नुसरत की पहली जीत थी। अब नुसरत की ट्रेनिंग पर जोर दिया जाने लगा। इस तरह नुसरत का दरबाजा संगीत की दुनिया के लिए खुल गया।

कव्वाली के राजाओं के राजा' बनने के लिए नुसरत ने क्या किया

संगीत के क्षेत्र में नुसरत साहब की एंट्री के बाद जो हुआ वह इतिहास है। अपने चाचा मुबारक अली खान की मौत के बाद नुसरत अपने परिवार के मुख्य कव्वाल बन गए थे। उनकी पार्टी का नाम तब नुसरत फतेह अली खान, मुजाहिद मुबारक अली खान कव्वाल एंड पार्टी था।

एक बार नुसरत गुलाम-घौस-समदानी के पास गए। घौस, नुसरत की कला के बारे में जानकर बेहद खुश हुए। इसी खुशी के चलते गुलाम-घौस-समदानी ने नाम बदलकर नुसरत नाम दिया था। नुसरत नाम का अर्थ होता है विजय, जीत। गुलाम-घौस-समदानी ने कहा था कि नुसरत एक दिन बहुत ही बड़ा कव्वाल बनेगा और परिवार का नाम दुनिया में रोशन करेगा।

हक अली अली मौला अली अली नामक कव्वाली ने नुसरत का नाम पाकिस्तान सहित दुनिया के सामने लाकर रख दिया। इसके बाद कभी पीछे मुडक़र नहीं देखा। उस समय उनके नाम गिनीज बुक ऑफ वल्र्ड रिकॉर्ड में सबसे ज्यादा 125+ कव्वालियों के गाने का रिकॉर्ड था।

नुसरत ने बॉलीवुड में अपनी शर्तों पे काम किया

नुसरत पाकिस्तान में जितने फेमस थे उतने ही भारत में भी। भारत देश विदेश के कलाकारों के लिए एक बहुत ही बड़ा मंच है। यहां पर बाहर से कई गीतकार आकर अपनी छाप छोड़ चुके है। जैसे राहत फतेह अली खान, आतिफ असलम, गुलाम अली, अदनान सामी, फवाद खान बॉलीवुड में गा चुके है। इनमें से कुछ तो अभी भी बॉलीवुड फिल्मों के लिए गाते है पर कुछ ऐसे भी है जो कि कुछ समय ही गाकर वापस अपने देश में लौट गए लेकिन उनका विश्व में बहुत बड़ा नाम है, चलिए बात करते है उनमे से एक है उस्ताद नुसरत फतेह अली खान के बारे में। हालाकि वे वह एक बार ही भारत आ सके, वह भी राजकपूर के बुलाने पर। इसके बाद उनका भारत आना नहीं हो सका।

नुसरत ने बॉलीवुड की कई फिल्मों के लिए गाने कम्पोज किए, एक रोचक किस्सा ये है कि फिल्म 'कच्चे धागे' जिसे 'मिलन लुथरिया' ने डायरेक्ट किया था, उसमें नुसरत साहब से एक गाना कम्पोज करने के लिए कहा गया। नुसरत साहब ने एक शर्त रखी कि वह तभी म्यूजिक कम्पोज करेंगे जब कम से कम एक गाना तो लता मंगेशकर से गवाया जाए। लास्ट में लता और नुसरत ने मिलकर एक गाना बनाया और गाने का नाम था 'ऊपर खुदा आसमां नीचे', उसके बाद इस गाने ने हिंदी सुनने वालों की यादों मे, हमेशा के लिए अपनी जगह बना ली।

नुसरत फतेह अली खान के अवार्ड्स

नुसरत फतेह अली खान के सम्मान और अवार्ड्स की यह यात्रा बेहद उतार-चढ़ाव भरी रही है। तमाम रिकग्निशन और अवार्ड्स का यह सफर इतना आसान नहीं रहा है। नुसरत ने अपने संगीत की धार बनाने के लिए रियाज करने में पूरा दम लगा दिया था। एक इंटरव्यू के दौरान उनने बताया था कि वे हर रोज दस-दस घंटे एक कमरे में बंद होकर रियाज करते थे। अगर रात के दस बजे से रियाज शुरू हो तो सुबह दस बजे तक भी चलती। नुसरत सन 1990 के बाद ज्यादातर विदेशों में ही गाते थे। इतनी कठिन साधना के बाद ही ये अवसर आया है।

सबसे अधिक कव्वाली रिकॉर्ड करने के लिए नुसरत का नाम गिनीज बुक ऑफ वल्र्ड रिकॉर्ड में दर्ज हुआ। इसके अलावा सन 1987 में उनको अच्छे प्रदर्शन के लिए प्राइड ऑफ पकिस्तान का अवार्ड मिला। नुसरत को गानों के लिए दो ग्रैमी अवार्ड के लिए नॉमिनेट किया गया। यूनेस्को म्यूजिक अवार्ड भी मिला। 1997 में नुसरत एक कॉन्सर्ट के लिए लंदन गए थे उस समय उनकी तबियत गंभीर थी पर उन्होंने अपना आखिरी कॉन्सर्ट रद्द करने के बजाय स्ट्रेचर पर किया।

नुसरत के इसी समर्पण के चलते उनकी वैश्विक पहचान बनी। भारत में भी वे खासे चर्चित है। आम हिंदुस्तानियों ने नुसरत फतेह अली खान को 1990 के दशक के तुरंत बाद ही जानना शुरू किया जब उनके मशहूर पाकिस्तानी गीतों की हमारे बॉलीवुड ने नकल करनी शुरू की। मोहरा का 'तू चीज बड़ी है मस्त मस्त' और याराना का 'मेरा पिया घर आया' जैसे कई गीत हैं जो नुसरत साहब के गाए पाकिस्तानी गीतों की नकल थे।

बाद के दिनों में खुद उन्होंने हिंदुस्तान आकर बॉलीवुड के लिए कुछ गीत गाए और इस तरह उनके गानों की नकल बंद हो गई। लेकिन यह भी सभी के मन में बैठा था कि नुसरत साहब का पहली दफा हिंदुस्तान आना 1990 के बाद के सालों में ही मुमकिन हुआ जबकि पाकिस्तान में वे एक दशक पहले ही मशहूर हो चुके थे। लेकिन ऐसा है नही। जब हिंदुस्तान में उन्हें कोई नहीं जानता था तब 1981 में संगीत निर्देशक खय्याम ने एक हिंदी फिल्म के लिए उनसे एक गीत गवाया था। फिल्म का नाम था 'नाखुदा' जिसके निर्माता यश चोपड़ा थे और गाने का नाम था 'हक अली अली'।

ये नुसरत साहब के पाकिस्तान में गाए गीत का ही एक वर्जन था जिसके लिए फिल्म में उन्हें 'नुसरत अली और मुजाहिद अली' के नाम से क्रेडिट दिया गया था, लेकिन इस गीत से पहले भी नुसरत साहब हिंदुस्तान आ चुके थे और यहां गा चुके थे। 979 में शोमैन राज कपूर ने नुसरत साहब को अपने घर की एक शादी में गाने का निमंत्रण दिया था। शादी ऋषि कपूर और नीतू सिंह की थी।

कहते हैं उस शादी में नुसरत साहब ने 'सांसों की माला पे सिमरूं में पी का नाम' गाया था। ये गीत वे खासतौर पर हिंदुस्तानी दर्शकों के लिए पाकिस्तान से तैयार करके लाए थे। तकरीबन बीस साल बाद फिर इसी गीत का बॉलीवुडीकरण कविता कृष्णमूर्ति की आवाज में शाहरुख खान की फिल्म 'कोयला' में हुआ था।

तनाव और युद्ध के माहौल में आज भी भारत और पाकिस्तान की अवाम के बीच अगर शांति बांटने की कोई अंतिम कड़ी बची है, तो वह है संगीत। नुसरत फतेह अली खान साहब की गजलें, उनकी कव्वालियां, उनके गाने दोनों, देशों को शांति बांटने वाले कबूतर का काम करते है।

भले ही नुसरत साहब को अंतिम सांस लिए हुए 23 साल हो गए हो लेकिन 23 सदियों तक भी उनके गाने उन्हें अमर बनाए रखने में सक्षम है। बता दे कि नुसरत साहब की मृत्यु लंदन में हुई थी। वे 1997 में एक कॉन्सर्ट के लिए लंदन गए थे उस समय उनकी तबियत गंभीर थी पर उन्होंने अपना आखिरी कॉन्सर्ट रद्द करने के बजाय स्ट्रेचर पर किया। उस कॉन्सर्ट के कुछ ही दिनों बाद नुसरत साहब की मौत 16 अगस्त 1997 में कार्डियक अरेस्ट के कारण लंदन में अंतिम सांस ली।

चलते-चलते उनके कुछ नायाब नगमों पे नजरे इनायत

मेरे रश्के कमर

उर्दू के कवि 'फना बुलंदशहरी' ने इस गजल को लिखा। नुसरत साहब ने आवाज दी। इस गाने को साल 2017 में आई अजय देवगन की फिल्म 'बादशाहो' में लिया गया था। लेकिन इसे नुसरत साहब की आवाज में सुनने का अपना अलग ही मजा है। अगर आपने अब तक नुसरत साहब की आवाज में ये कव्वाली नहीं सुनी तो यकीं मानिए बहुत कुछ मिस कर रहे है।

सांवरे तोरे बिन जिया जाए ना

ये गाना नुसरत साहब की ही आवाज में है, ये गाना उस उंचाई तक पहुंच जाता है जहां भाषाई व्याकरण ओछी पड़ जाए। गाना आदमी की भावनाओं में उतरकर, अंतर्मन के तारों में धुन भर देता है। नुसरत साहब के गानों, कव्वालियों की सुंदरता भी यही है।

छोटी सी उमर

बैंडिट क्वीन के इस गाने के बाद 'म्यूजिक डायरेक्टर' के रूप में नुसरत साहब ने हिंदी फिल्मों में एंट्री की थी। गाने की शुरूआती लाइनें हैं 'छोटी सी उमर परनाइ रे बाबोसा करयो थारो कई मैं कसूर हो'। नुसरत साहब के कंठ से जब ये गाना निकला तो लोगों के दिल के अंदर तक पहुंच गया। बाकी पूरा गाना आप खुद सुनिए।

तेरे बिन नहीं जीना मर जाना ढोलना

फिल्म 'कच्चे-धागे' का ये बेहतरीन गाना लता मंगेशकर ने गाया है, नुसरत साहब ने इसे कम्पोज किया है। ये नुसरत साहब की ही कव्वाली 'तेरे बिन नहीं लगदा दिल मेरा ढोलना' पर ही आधारित है, इस गाने का हिंदी समझने वालों पर इतना क्रेज है कि 2018 में ही आई रनवीर सिंह की फिल्म सिम्बा में भी, इसी टाइटल वाले गाने को राहत फतेह अली खान द्वारा गया है।

सानू इक पाल चेन ना आवे

नुसरत साहब की इस गजल की कम्पोजिंग बेहद जटिल है, इसी लिरिक्स वाले गाने को अजय देवगन की फिल्म 'रेड' में 'राहत फतेह अली खान' ने गाया है। लेकिन आपको केवल नुसरत साहब की आवाज वाली गजल को ही सुनने की इल्तजा करेगें, तो सुनिए आप भी।

छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिला के

ओरिजिनली इस गजल को अमिर खुसरो ने लिखा था। इसे नुसरत साहब ने कव्वाली की फॉर्म में गाया है। जितनी एनर्जेटिक ये कव्वाली है उतनी ही गहरी भी। अगर आपने नुसरत साहब की आवाज में ये कव्वाली नहीं सुनी तब आपने सुना ही क्या है। देर मत कीजिए बिल्कुल भी सुन लीजिए।

मेरा पिया घर आया

इसे ओरिजिनली पंजाबी सूफी संत 'बाबा बुल्लेेशाह' ने 18 वीं शताब्दी में लिखा था। जब नुसरत साहब ने इसे कव्वाली फॉर्म में बनाकर गाया, तो ये गजल बेहद फेमस हुई, इतनी कि इस पर बॉलीवुड में भी गाने बने।

आफरीन-आफरीन

इस गजल को 'जावेद अख्तर साहब' ने लिखा है, नुसरत साहब ने इस गजल को अपनी आवाज दी है। राहत फतेह अली खान ने जब इस गजल को कोक स्टूडियो में गाया तब युवा पीढ़ी का इस पर ध्यान गया। लेकिन अगर आपने नुसरत साहब की आवाज में नहीं सुना तो मजा अधूरा ही रह जाएगा।

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