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.. तो दीवार जहां से टूटेगी, रास्ता भी वहीं से निकलेगा!

आज उन जड़ों में ही मट्ठा डाला जा रहा है। नफरत की जड़ों में प्यार का मट्ठा, विश्वास का सुनहला स्पर्श.. !!! सुकून देता है न ?

 Shiv Kumar Mishra |  26 May 2020 8:30 AM GMT  |  अहमदाबाद

.. तो दीवार जहां से टूटेगी, रास्ता भी वहीं से निकलेगा!

मनीष सिंह

दीवाने इसे तोड़ने भी निकल गए है। गुजराती में जो लिखा है, वह पढ़ने की कोशिश कीजिये और कारवां की लंबाई देखिए। इक्का दुक्का, या छोटे मोटे फ्रेंड सर्कल की कोशिश वो इम्पेक्ट नही दे सकते, जो पूरी कौम के एक साथ खड़े होने पर निकल सकता है।

तस्वीर बताती है, कि आम मध्यवर्गीय, अमनपसंद मुसलमान ने दीवारें तोड़ने की कमान संभाल ली है। उसने इडियट्स को किनारे करना शुरू कर दिया है। नफरतियों की रहनुमाई को धता बता दी है। और हां, निकलना तभी सम्भव हुआ है जब उसने अपने अंदर की कड़वाहट और भय को जीत लिया। इस्लाम मे जिहाद यही तो है न ??

पूरे रमजान ऐसी तस्वीरें आती रही हैं, मगर यह बेहद खास है। इसलिए कि ये वो शहर है जहां विषवंश की जड़ों ने जमीन पाई। आज उन जड़ों में ही मट्ठा डाला जा रहा है। नफरत की जड़ों में प्यार का मट्ठा, विश्वास का सुनहला स्पर्श.. !!! सुकून देता है न ?

खुलना जरूरी है, मिलना जरूरी है, स्पर्श जरूरी है। नफरत तो डरपोक है, छुईमुई है। छुईमुई बस दूरी में ही इठला पाती है, फैलती है, लहलहाती है, गुर्राती है। प्रेम का हल्का सा स्पर्श देकर देखिए, इनका बागान मिनटों में कुम्हला जाएगा। इसलिए तो दूरियां बढ़ाकर, प्यार के स्पर्श से, इस नकली नफरत को बचाने की बेतरह कोशिश हुई। पिछले तीस सालों में गढ़ी गई छवियां ही इस राक्षस का आहार है। डर उसका औजार है, राजनीति, मीडिया, और इडियट्स की फौज इसे फैलाने की विषबेल।

तो नफरत की खाद पानी ने लाठी को एके-56 बना दिया है। 90 साल के बियाबान से उछाल कर हाई सीट पर ला दिया है। नफरती पूर्वजों के सपने को साकार किया गया है। अब इसे स्थायी करना है। नफरत को स्थायी करना है। उनके सन्तुष्ट होकर रुकने के कोई आसार नही। इन्हें सींग पकड़कर सामने से थामना होगा। नफरत को प्यार से छूना होगा। गुजरात से गोबरपट्टी तक मोहब्बत की फसल लगानी होगी।

और तब इस तस्वीर का आना उस शुरुआत का शानदार एलान है। ये भारत के गड्ढे में जा रहे मुस्तकबिल को, बदलने के जज्बे की सौम्य हुंकार है। नफरत को मोहब्बत और मानवता से जीतने निकले इन योद्धाओं को सलाम पहुंचे।

देखना दिलचस्प होगा, कि भूखे मजदूर , जगह जगह इनके हाथ का दाना पानी लेकर जब तंदुरुस्त होंगे.. जब इनके दिए जूते पहनकर आगे बढ़ेंगे.. तो घर जाकर फिर से अपने खिदमतगारों को टाइट करने के सपने देखेंगे?? उनकी टोपी, दाढ़ी से उतने ही उतनी ही नफरत करेंगे ?? क्या वो मोहब्बत का जवाब मोहब्बत से नही दे सकेंगे??

क्या टीवी पर पूछा जाएगा -

"अरे मौलाना, अब क्या हिन्दू कृतघ्न भी नही हो सकता??"

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