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चीखने वाली मीडिया गुजरात घटना पर खामोश क्यों? घटना सपा , राजद या कांग्रेस के राज्य में नहीं हुई इसलिए!

 Special Coverage News |  2018-10-08 03:59:52.0  |  गुजरात

चीखने वाली मीडिया गुजरात घटना पर खामोश क्यों? घटना सपा , राजद या कांग्रेस के राज्य में नहीं हुई इसलिए!

इस बात का आश्चर्य है कि मीडिया गुजरात मे बड़े पैमाने पर यूपी बिहार के लोगो पर हुए हमले की घटनाओं को मोब लिंचिंग से क्यो नही जोड़ रहा है. साफ दिख रहा है कि मीडिया गुजरात सरकार को कटघरे में खड़ा करने से डर रहा है. यही घटनाएं यदि किसी गैर बीजेपी शासित राज्य में हुई होती तो मीडिया के जलवे देखने लायक होते, जंगलराज , गुंडाराज जैसी सुर्खियां बनाई जा रही होती.


सालों से गुजरात में रह रहे उत्‍तर प्रदेश, मध्‍य प्रदेश और बिहार के यह लोग भीड़ के डर से भाग रहे हैं. गांधीनगर, अहमदाबाद, सबरकांठा, पाटन और मेहसाणा जैसे संपन्न जिले में यह घटनाएं हो रही हैं. यह गुस्‍साई भीड़ 14 वर्षीय बच्‍ची से दुष्‍कर्म के बाद, 'गैर-गुजरातियों' पर हमले कर रही है. गुजरात के कुल 7 जिलों में यह हिंसा हो रही रही है आठ हजार से ज्यादा लोग यहाँ से पलायन कर चुके है.

गुजरात में काम करने वाले बिहार और उत्तर प्रदेश के मजदूरों का इस राज्य से पलायन जारी है. क्योंकि उत्तर भारतीयों पर हो रही हिंसा से ये काफी डरे हुए हैं. गुजरात पुलिस चीफ की तरफ से हिंसा करने वालों पर कड़ी कार्रवाई करने की चेतावनी जारी किए जाने के बावजूद भी स्थिति में कोई खास सुधार नहीं आया है. गौरतलब है कि पिछले महीने बिहार के एक व्यक्ति द्वारा हिम्मत नगर जिले में 14 महीने की एक बच्ची के साथ बालात्कार की घटना सामने आने के बाद गुजरात में रह रहे उत्तर भारतीयों पर वहां के स्थानीय लोगों ने हिंसा शुरू कर दी.

14 महीने की बच्ची से बालात्कार के मामले में एक गिरफ्तार

गुजरात के मेहसाणा, साबरकांठा और अरावली जिलों में 28 सितंबर से 4 अक्टूबर के बीच उत्तर भारतीय कामगारों पर वहां के स्थानीय लोगों ने हिंसा की. इसके बाद गुजरात पुलिस चीफ ने चेतावनी जारी की थी. लेकिन इस चेतावनी का कोई खास असर नहीं हुआ है और उत्तर भारतीय कामगारों को अभी भी धमकियां मिल रही हैं, जिससे उनके बीच भय का माहौल है. बच्ची के साथ बालात्कार के मामले में सिरेमिक फैक्ट्री में काम करने वाले रघुवीर साहू नाम के एक व्यक्ति को गिरफ्तार किया गया है. हिंसा शुरू होने के बाद से ही उत्तर भारतीयों का गुजरात से बड़े पैमाने पर पलायन जारी है.

आपको याद होगा कि कुछ दिनों पहले अमित शाह राजस्थान के एक सोशल मीडिया कार्यकर्ता सम्मेलन में जिस तरह का बयान देते हैं कि 'झूठ हो या सच बस उसे वायरल कर दो' लगभग उसी तरह से इस घटना से जुड़ी खबर फेसबुक और व्‍हाट्सएप के जरिए जंगल में आग की तरह फैली हैं. दरअसल अफवाह फैलाना भारत का नया राजनीतिक उद्योग है। राजनीतिक दल का कार्यकर्ता अब इस अफवाह को फैलाने वाला वेंडर बन गया है ओर यही वेंडर भीड़ को भड़का रहा है.

इनके बयानों से प्रभावित भीड़ बहुसंख्यक लोकतंत्र के एक हिस्से के तौर पर दिखती है जहां वह ख़ुद ही क़ानून का काम करती है. खाने से लेकर पहनने तक सब पर उसका नियंत्रण होता, आउटसाइडर पर हमला करने को वह अपना पहला हक समझते है.


जब आप कहते हैं हमे यहाँ से घुसपैठिया को भगाना होगा हमे शरणार्थियों को भगाना होगा तो जो संदेश एक आम आदमी तक जाता है वह यही संदेश है. हम सब कही न कही शरणार्थी भी है और घुसपैठिये भी, भारत के पिछड़े राज्यों से आने वाले लोग जो रोजगार की तलाश में सम्पन्न राज्यों का रुख कर लेते है उन सम्पन्न राज्य के निवासियों की नजर में हम घुसपैठिया ओर शरणार्थी की ही हैसियत रखते हैं.


यह घटना उसी माहौल का परिणाम है जहां बात बात में आप पाकिस्तान चले जाने की बात उछाल देते हैं, NRC के मुद्दे देश मे तूफ़ान खड़ा कर देते हैं, ओर मोब लिंचिंग करने वाले आरोपियों को मालाए पहनाकर केन्द्रीय मंत्री स्वागत तक कर देते हैं. आप बबुल का पेड़ बो रहे हैं तो उसमें से आम नही निकलेंगे बबूल के कांटे ही आपको छलनी करेंगे. यह जो गुजरात मॉडल है न वह यही मॉडल है.

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