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जींद उपचुनाव में हार के बाद अब कांग्रेस में मचेगा घमासान!

 Special Coverage News |  2 Feb 2019 9:04 AM GMT  |  जींद

कांग्रेस को हैदराबाद में झटकाकांग्रेस को हैदराबाद में झटका

जींद विधानसभा का उपचुनाव हारने के बाद अब कांग्रेस में नया घमासान शुरू होने जा रहा है। हार के कारणों को लेकर फिर से अशोक तंवर व हुड्डा खेमे में लाइन खींच सकती है। इस बार हुड्डा विरोधी लड़ाई में तंवर को रणदीप सुरजेवाला का भी साथ मिल सकता है। कांग्रेस के कद्दावर नेता एवं राहुल गांधी के सर्वाधिक विश्वास पात्र रणदीप सुरजेवाला को जींद में मिली करारी हार के बाद कांग्रेस पार्टी में हार के कारणों को लेकर मंथन शुरू हो गया है।

हार के कारणों की रिपोर्ट तैयार करने के मामले में कांग्रेस अध्यक्ष अशोक तंवर ने धरातल की एक रिपोर्ट की है। जिसमें उन्होंने सीधे तौर पर हार की जिम्मेदारी ली है। तंवर यह रिपोर्ट जल्द ही कांग्रेस हाईकमान को सौंप सकते हैैं। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा समर्थक एक दर्जन विधायकों ने पिछले दिनों हरियाणा कांग्रेस के नए प्रभारी गुलाम नबी आजाद से मुलाकात कर अशोक तंवर का नेतृत्व परिवर्तन करने की मांग उठाई थी। उसके दो दिन बाद अशोक तंवर भी गुलाम नबी आजाद से मिले और विभिन्न मुद्दों पर बातचीत हुई। अब तंवर दोबारा फिर प्रदेश प्रभारी और राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी से मुलाकात करेंगे।

सूत्रों के अनुसार अशोक तंवर ने जींद उपचुनाव के नतीजों के बाद एक रिपोर्ट तैयार की है, जिसमें पूर्व मुख्यमंत्री, उनके पुत्र और कांग्रेस के कुछ गैर जाट नेताओं की कार्य प्रणाली पर सवाल उठाए गए हैैं। अशोक तंवर ने इस रिपोर्ट में सुरजेवाला की हार के लिए जाट मतों का बंटवारा और गैरजाट मतों का भाजपा की झोली में पडऩा बड़ा कारण बताया है। ऐसी स्थिति पैदा करने के लिए कांग्रेस के ही कुछ नेताओं को जिम्मेदार ठहराया गया है। सूत्रों के अनुसार रणदीप सुरजेवाला भी जल्द राहुल गांधी से मुलाकात कर जींद उपचुनाव के बारे में पार्टी नेताओं की कार्य प्रणाली से अवगत कराएंगे।


अशोक तंवर की हरियाणा कांग्रेस के प्रभारी गुलाम नबी आजाद से हुई मुलाकात के बाद अब जिला व ब्लाक अध्यक्षों की सूची फाइनल होने के आसार हैैं। हुड्डा समर्थक विधायक हालांकि तंवर को हटाने का पूरा दबाव बना चुके,लेकिन कांग्रेस नेतृत्व को लग रहा कि यदि भाजपा ने लोकसभा के साथ विधानसभा चुनाव का ऐलान कर दिया तो ऐसे समय में संगठन में बदलाव नुकसानदायक साबित हो सकता है। हुड्डा समर्थकों की दलील है कि यदि बदलाव नहीं हुआ तो अधिक नुकसान होगा।

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