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क्या कोरोना के बीच ही होगा हरियाणा का बरोदा विधान सभा उपचुनाव?

 Shiv Kumar Mishra |  5 July 2020 3:48 PM GMT  |  चंडीगढ़

क्या कोरोना के बीच ही होगा हरियाणा का बरोदा विधान सभा उपचुनाव?
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चंडीगढ़ (जग मोहन ठाकन )

आखिरकार चार जुलाई , 2020 को हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने बरोदा हलके के गांवों का दौरा कर रिक्त हुई बरोदा विधानसभा सीट पर होने वाले उप चुनाव का बिगुल बजा ही दिया . मुख्यमंत्री ने कहा कि बरौदा हलके में जल्द ही उपचुनाव होने वाले हैं और इन चुनावों में लोगों को बड़ी ही सकारात्मक सोच के साथ अपने वोट डालना है.

मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने जुलाई 1, 2020 को भाजपा विधायकों की बैठक में अन्य विषयों के साथ साथ बरोदा उपचुनाव पर भी चर्चा की थी . बैठक के बाद पूर्व मंत्री एवं वर्तमान में मुख्यमंत्री के राजनैतिक सलाहकार कृष्ण बेदी ने पत्रकारों को मुख्यमंत्री के बयान का हवाला देते हुए बड़े मजबूत दावे के साथ कहा था कि भाजपा अपने सहयोगी दल जजपा के साथ मिलकर बरोदा चुनाव में ना केवल अपना उम्मीदवार उतारेगी बल्कि पार्टी यह इलेक्शन जीतने के लिए लड़ेगी .

श्रीकृष्ण हूड्डा विधायक की मृत्यु के कारण रिक्त हुई हरियाणा की बरोदा विधानसभा सीट पर होने वाले उपचुनाव की सुगबुगाहट ने प्रदेश के सुप्त पड़े राजनैतिक अखाड़ों में दण्ड-पेल करने वाले पहलवानों को पुनः तेल मालिश करने का मौका दे दिया है . उल्लेखनीय है कि हरियाणा विधानसभा की बरोदा सीट से विजयी विधायक श्रीकृष्ण हुड्डा का 12 अप्रैल 2020 को बीमारी के चलते देहांत हो गया था . इसलिए छः माह के अन्दर अन्दर , विशेष परिस्थितियों को छोड़कर , चुनाव कराना अनिवार्य है .

हलके के दौरे के पहले ही दिन मुख्यमंत्री ने हलके के वोटर्स को लुभाने के लिए चुनावी घोषणाओं का अम्बार लगा दिया . क्षेत्र की लगभग सभी समस्याओं को अपनी जादुई छड़ी से छूमंतर करने हेतु अधिकारियों को निर्देश दे दिए . मुख्यमंत्री ने सिंचाई विभाग के अधिकारियों को निर्देश दिए कि सभी नहरों, माईनरों, राजवाहों व खालों की सफाई कर सिंचाई का पानी टेल तक पहुंचाया जाए. छः वर्ष तक भाजपा सरकार सत्ता में होने के बावजूद क्षेत्र के गांवों में बरसाती पानी द्वारा होने वाली तबाही भले ही सरकार को ना दिखाई दी हो पर अब बरौदा हलके के 22 गांवों में बरसाती पानी भरने से हर साल फसल खराब होने की समस्या के स्थाई समाधान के लिए दो दिन में कार्ययोजना तैयार कर सौंपने के निर्देश भी मुख्यमंत्री ने मौके पर ही सिंचाई विभाग के अधिकारियों को दिए.

बिजली सप्लाई में कटौती से जूझते व झुलसती गर्मी और फसल बुआई के लिए त्रस्त ग्रामवासियों को बिजली अब चौबीस घंटे उनके द्वार पर खड़ी मिले इसके लिए मुख्यमंत्री ने यहां घोषणा करते हुए कहा कि बरौदा हलके के 13 गांवों बिलबिलयान, आंवली, गिवाना, बली ब्रह्मणान, कटवाल, रिवाड़ा, पुठी, रबडा, रुखी, एसपी माजरा, भंडेरी, खानपुर खुर्द और माहरा गांवों में रविवार से ही 24 घंटे बिजली मिलेगी. इसके साथ ही अन्य गांवों में भी बिजली आपूर्ति बढ़ाकर 14 घंटे से 16 घंटे की जाएगी. खेतों में आठ घंटे बिजली आपूर्ति जारी रहेगी.

पीने के पानी का संकट भी अब बरोदा हलके के लोगों के लिए भूतकाल की बात हो जायेगा . मुख्यमंत्री खट्टर ने घोषणा की है कि जिन गांवों में जमीनी पानी की ट्यूबवेल से पेयजल सप्लाई संभव नहीं है वहां डिग्गी के माध्यम से नहरी पानी को घर-घर तक भेजा जाएगा . इसमें उन दूरदराज की ढाणियों तक भी पानी पहुंचाया जाएगा जहाँ 20 घर भी होंगे.

2019 के अक्टूबर विधानसभा चुनाव में एक –दूसरे के धुर-विरोधी और बाद में दिल परिवर्तन के कारण भाजपा सरकार में सहयोगी बन सत्तासीन हुए उपमुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला ने ऐलान किया है कि बरोदा विधानसभा उपचुनाव में भाजपा और जजपा एक साथ मिलकर चुनाव लड़ेगी . उन्होंने तर्क दिया कि जब जजपा-भाजपा दोनों संगठन मिलकर सरकार चला रहे हैं तो आगामी बरोदा विधानसभा उपचुनाव को भी साथ मिलकर ही लड़ेंगे और इसमें जीत भी हासिल करेंगे. चौटाला ने दावा किया कि बरोदा की जनता पूरी तरह से गंठबंधन सरकार के साथ है और उपचुनाव को लेकर दोनों संगठनों के नेताओं की चर्चा भी हो चुकी है.

जहाँ जजपा-भाजपा अपने संयुक्त उम्मीदवार की जीत को सुनिश्चित मान रही है वहीँ चौधरी देवीलाल की मूल पार्टी इंडियन नेशनल लोक दल पार्टी (इनेलो ) के नेता बरोदा उपचुनाव को एक गेम चेंजर चुनाव मान रहे हैं .

अठारह जून को अपने सिरसा आवास पर मीडिया से बातचीत में इनेलो नेता अभय सिंह चौटाला ने दावा किया कि बरोदा उपचुनाव से प्रदेश की राजनैतिक फ़िजा बदल जाएगी और चुनाव के नतीजों से बहुत बड़ा राजनितिक बदलाव होगा . इनेलो नेता ने जोर देकर कहा कि उपचुनाव के बाद इनेलो को बड़ी ताकत मिलेगी.

गत छः वर्षों से सुप्त अवस्था में चल रही प्रदेश कांग्रेस अपनी नई प्रदेश अध्यक्ष कुमारी शैलजा के नेतृत्व में आंतरिक टांग खिंचाई से बाहर निकलती दिखाई दे रही है. अभी 29 जून को राष्ट्रीय नेतृत्व के कार्यक्रम के अनुसार प्रदेश में जगह जगह पेट्रोल-डीजल के निरंतर बढ़ते मूल्यों के विरोध में कांग्रेस के नेताओं ने पब्लिक में सड़क पर उतरकर अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई है .परन्तु कांग्रेस पार्टी अभी बरोदा उपचुनाव के लिए किसी प्रकार की तैयारी पकडती नज़र नहीं आ रही है . या तो कांग्रेस 2019 के पिछले लोकसभा तथा विधानसभा दोनों चुनावों में बरोदा क्षेत्र से बढ़त लेने के कारण ओवर कॉंफिडेंट है या 'प्यास लगने पर ही कुआँ खोदने' की अपनी चिर परिचित पालिसी का अनुसरण कर रही है .

क्या है बरोदा विधान सभा सीट की हिस्ट्री ?

प्रथम नवम्बर , 1966 को पंजाब से अलग होकर हरियाणा प्रदेश बनने के अगले ही वर्ष 1967 के विधानसभा के आम चुनाव में बरोदा (रिजर्व्ड) असेंबली सीट पर इंडियन नेशनल कांग्रेस के राम धारी ने भारतीय जन संघ पार्टी के डी सिंह को पटकनी देकर विजय प्राप्त की . उसके बाद आगे के दो चुनावों में श्याम चंद ने 1968 में विशाल हरियाणा पार्टी तथा 1972 में इंडियन नेशनल कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवार के तौर पर राम धारी को परास्त किया . 1972 के बाद फिर 2005 तक के सभी सात विधान सभा चुनावों में कांग्रेस को हार का मुंह देखना पड़ा . 1977 (भले राम –जनता पार्टी ) , 1982 ( भले राम –लोकदल ) , 1987 (किरपा राम लोकदल ) , 1991, 1996 तथा 2000 के तीनो चुनावों में रमेश कुमार ने क्रमशः जनता पार्टी , एस ए पी तथा इंडियन नेशनल लोकदल के प्लेटफार्म पर जीत हासिल की. 2005 में भी इंडियन नेशनल लोकदल के प्रत्याशी रामफल ने जीत प्राप्त की .1977 से 2005 तक लगातार सात चुनावों में 28 वर्ष तक हार झेलती रही कांग्रेस को संजीवनी बूटी तब मिली जब श्रीकृष्ण हूड्डा ने वर्ष 2009 , 2014 तथा 2019 में लगातार तीन बार जीत दर्ज की. उल्लेखनीय है की वर्ष 1967 से 2005 तक बरोदा विधान सभा सीट आरक्षित श्रेणी की सीट रही तथा 2009 में जनरल श्रेणी में आते ही सीट कांग्रेस की झोली में आ गयी , इससे यह निष्कर्ष तो निकलता ही है कि कांग्रेस में अनुसूचित जाति केटेगरी में इस विधान सभा स्तर पर कोई नेता नहीं उभर पाया . और कभी कांग्रेस का थोक में वोट बैंक माना जाने वाला अनुसूचित जाति का यह तबका कांग्रेस से क्यों खिसका , इस बारे कांग्रेस नेतृत्व को मंथन अवश्य करना चाहिए .

अप्रैल -मई 2019 के लोकसभा चुनावों में प्रदेश की दस की दस सीटें जीतकर गर्वित भाजपा गत वर्ष 2019 में अक्टूबर माह में हुए आम चुनाव में हरियाणा में विधानसभा की नब्बे सीटों में से पिचहतर प्लस का सपना देखने लगी परन्तु धरातल की वास्तविकता नहीं पढ़ पाई और उसे बहुमत के लिए वांछित 45 का आंकड़ा भी नसीब नहीं हुआ और उसे केवल 40 सीट ही मिली . भला हो सत्ता के लिए लालायित जन नायक जनता पार्टी (जजपा ) का जिसने अपनी दस सीट का सहारा देकर अपनी धुर राजनैतिक दुश्मन भाजपा को पुन: सतासीन होने का मौका दे दिया . बदले में जजपा के कर्ताधर्ता दुष्यंत चौटाला को मिला डिप्टी सी एम का ताज तथा बकौल जजपा के विद्रोही स्वर एवं पार्टी के वयोवृद्ध विधायक दादा रामकुमार गौतम काफी सारे मलाईदार मन्त्रालय .

इस सीट पर दिवंगत किसान नेता एवं पूर्व उप-प्रधानमंत्री चौधरी देवीलाल का हमेशा होल्ड रहा है और 1977 से लेकर 2005 तक 28 वर्षों तक हुए सात विधानसभा आमचुनावों में चौधरी देवीलाल के ही बल पर इस सीट पर जीत होती रही है . चौधरी देवीलाल की वर्ष 2001 में मृत्यु उपरान्त उनके वारिसों का दबदबा घटने के बावजूद 2005 में चौधरी देवीलाल द्वारा पोषित इंडियन नेशनल लोकदल (इ ने लो ) ने यहाँ सफलता पाई तथा वर्ष 2009 एवं 2014 में भी क्रमशः कांग्रेस तथा भाजपा की हवा के बावजूद इंडियन नेशनल लोकदल का उम्मीदवार टक्कर देकर दूसरे नंबर पर रहा . 2005 में कांग्रेस के भूपेंदर सिंह हूड्डा को मुख्यमंत्री पद मिलने के कारण रोहतक –सोनीपत बेल्ट के मतदाताओं ने कांग्रेस की तरफ रुख किया और लगातार 2009 , 2014 तथा 2019 के आम चुनावों में बरोदा हलके ने भूपेंदर सिंह हूड्डा के खासम- खास श्रीकृष्ण हूड्डा को जीत की पगड़ी बाँधी . हालाँकि 2019 के चुनाव में इंडियन नेशनल लोकदल के दो फाड़ हो जाने के बावजूद एक धड़े (जजपा ) को 32480 (26.45 % ) वोट मिले , परन्तु मूल इंडियन नेशनल लोकदल धराशाही हो गया ( केवल 3145 मत यानी 2.56% हिस्सा पा सका ) और जजपा ने अपने आप को चौधरी देवीलाल का असली वारिस घोषित कर दिया .इस चुनाव में यहाँ से कांग्रेस के विजयी उम्मीदवार श्रीकृष्ण हूड्डा को 42566 (34.67 %) वोट मिले तथा दूसरे नंबर पर रहने वाले भाजपा के उम्मीदवार एवं अंतर्राष्ट्रीय खिलाडी योगेश्वर दत्त को 37726 (30.73 % ) मिले, वहीँ दलित समाज की राजनीति करने वाली बहुजन समाज पार्टी मात्र 3281 ( 2.67 % ) मत लेकर धरातल खिसकने की दहलीज पर आ गयी .

अब किस-किस का होगा बरोदा उपचुनाव में मुकाबला ?

वर्तमान हालात में बरोदा विधानसभा सीट पर हार जीत का ना तो भाजपा-जजपा की सरकार की स्थिरता पर कोई असर पड़ेगा और ना ही प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस को कोई सत्ता हासिल करने योग्य संख्या बल . अगर कांग्रेस जीतती है तो उसकी पहले वाली संख्या दोबारा 31 हो जाएगी . अगर हार गयी तो तीस पर भी वही हालात रहने हैं , परन्तु जीत अपनी अपनी डफली को बुलंद करने में अवश्य मदद करेगी .

यदि भाजपा-जजपा गठबंधन जीतता है तो , इस जीत को संयुक्त सरकार के प्रथम वर्ष की कारगुजारियों पर जनता की मुहर माना व प्रचारित किया जायेगा . यदि कांग्रेस जीतती है तो पार्टी उसे भाजपा –जजपा सरकार से जनता की नाराज़गी के रूप में ढिंढोरा पिटेगी .

2009 में आरक्षित सीट से जनरल सीट में तब्दील होने के बाद लगातार 2009 , 2014 तथा 2019 के आम चुनावों में बरोदा हलके ने भूपेंदर सिंह हूड्डा के खासम- खास एवं जाट नेता श्रीकृष्ण हूड्डा को जीत की पगड़ी बाँधी है .

जाट प्रभावी इस क्षेत्र में संभवतः भाजपा अपने सत्ता सहयोगी एवं जाटों में पकड़ रखने का दावा करने वाली जजपा के दम पर जाटों का वोट इस बार भाजपा –जजपा के संयुक्त उम्मीदवार के पक्ष में मानकर फिर गैर जाट उम्मीदवार और संभवतः 2019 में पराजित रहे भाजपा कैंडिडेट योगेश्वेर दत्त को मौका देना चाहती है . कांग्रेस के संभावित किसी जाट उम्मीदवार के पक्ष में जाट लामबंध ना हो जाये , इसलिए मुख्यमंत्री खट्टर ने पहले ही जातीय समीकरणों को तोड़ने हेतु लोगों को आगाह करने का प्रयास किया है . मुख्यमंत्री इसमें कितने कामयाब होंगे यह तो समय ही बताएगा . मुख्यमंत्री ने कहा कि अब हमारा अगला लक्ष्य प्रदेश में जातिवाद को खत्म करना है और हमें संकल्प लेना होगा कि हम किसी को भी जातिवाद का जहर नहीं घोलने देंगे.

फिलहाल भाजपा-जजपा दोनों अपना एक साँझा उम्मीदवार मैदान में उतारना चाहती हैं . इस बारे जजपा नेता दुष्यंत चौटाला पहले ही ऐलान कर चुके हैं कि बरोदा विधानसभा उपचुनाव में भाजपा और जजपा एक साथ मिलकर चुनाव लड़ेगी . उन्होंने तर्क दिया है कि जब जजपा-भाजपा दोनों संगठन मिलकर सरकार चला रहे हैं तो आगामी बरोदा विधानसभा उपचुनाव को भी साथ मिलकर ही लड़ेंगे और इसमें जीत भी हासिल करेंगे. दोनों पार्टियाँ अपने उम्मीदवार की जीत को लेकर आश्वस्त है और शायद आंकलन कर रहे है कि गत विधानसभा चुनाव में दोनों पार्टियों को मिले अलग-अलग मतों को यदि इक्कट्ठा किया जाता है तो उसके उम्मीदवार को कोई भी नहीं हरा सकता है . उल्लेखनीय है कि गत 2019 के चुनाव में हालाँकि जीत कांग्रेस के प्रत्याशी श्रीकृष्ण हूड्डा की हुई थी जिन्हें 42566 (34.67 %) वोट मिले थे ,जबकि उनके मुकाबले में भाजपा के पराजित उम्मीदवार योगेश्वर दत्त को 37726 (30.73 % ) तथा उस समय भाजपा की विरोधी एवं वर्तमान में सत्ता सहयोगी जजपा को 32480 (26.45 % ) वोट मिले थे . दोनों सत्ता सांझीदार पार्टियाँ खुश हैं कि गणितीय आंकड़ा उनके फेवर में है और इसीलिए कोरोना संकट के चलते भी शीघ्रतम चुनाव को आतुर हैं . वो सोचते हैं कि उन दोनों का 2019 का संयुक्त वोट आंकड़ा 70206 ( 37726 + 32480 ) यानि 57.18% बैठता है जो कांग्रेस के 42566 (34.67% ) से 27640 (22.51% ) अधिक है और इतने बड़े मार्जिन को कांग्रेस किसी भी सूरत में नहीं मिटा पायेगी ,इसलिए जजपा-भाजपा के संयुक्त प्रत्याशी की जीत दोनों पार्टियाँ सुनिश्चित मानकर चल रही है .

उधर राजनैतिक विश्लेषक मानते हैं कि सियासत होर्स ट्रेडिंग वाला खेल है ,अत: सियासत और हॉर्स रेस में गणित मास्टर वाला फार्मूला काम नहीं करता ,बल्कि यहाँ दो घोड़ों की संयुक्त रेस लंगड़ी रेस कहलाती है और कमजोर घोडा तेज़ रेस वाले घोड़े की गति को भी बाधित कर देता है तथा संयुक्त रेस में रिजलटेंट गति बढ़ने की बजाय हमेशा ही कम हो जाती है .

यहाँ यह बात ध्यान देने योग्य है कि 2019 के चुनाव में जजपा को जो वोट मिले थे वो सत्तासीन भाजपा को सत्ताच्युत करने के नाम पर मिले थे , गलबहियां डालने के लिए नहीं . क्योकि जजपा का वोट बैंक कांग्रेस और भाजपा के विरोध वाली तासीर का रहा है .अब जजपा द्वारा इस वोट बैंक को भाजपा की झोली में डालने का प्रयास विपरीत असर भी डाल सकता है और अपने को ठगा हुआ महसूस कर रहा यह तबका जजपा व भाजपा दोनों को सबक सिखाने के लिए यदि कांग्रेस के पलड़े की तरफ रुझान कर लेता है तो कांग्रेस को यह सीट जीतने से कोई नहीं रोक सकता . दूसरा फायदा कांग्रेस को पूर्व मुख्यमंत्री एवं वर्तमान में हरियाणा विधानसभा में विपक्ष के नेता भूपेंदर सिंह हूड्डा को आगे कर चुनाव लड़ने में भी होगा ,क्योकि बरोदा विधानसभा क्षेत्र सोनीपत-रोहतक बेल्ट में आती है जहाँ हूड्डा का काफी प्रभाव है . तीसरा फायदा कांग्रेस को सहानुभूति का भी मिलेगा ,क्योकि यहाँ से प्रतिनिधित्व करने वाले दिवंगत हुए विधायक श्रीकृष्ण हूड्डा कांग्रेस के ही विधायक थे .

परन्तु चौधरी देवीलाल की मूल पार्टी इंडियन नेशनल पार्टी , जो 2019 के चुनाव में जनता द्वारा नकार दी गयी थी और उसे इस सीट पर केवल 3145 (2.56%) मत मिले थे , पुनः अंगडाई ले रही है और इसके नेता अभय सिंह चौटाला हरियाणा के सभी क्षेत्रों के दौरे कर रहे हैं तथा बेरोजगार युवाओं तथा किसानों की आवाज़ उठा रहे हैं . इन दिनों अभय चौटाला अपने स्तर पर तथा अपने पिता एवं पूर्व मुख्यमंत्री चौधरी ओमप्रकाश चौटाला से दूसरे दलों से इनेलो में शामिल होने वाले कार्यकर्ताओं की मुलाकात करवा कर इनेलो के कमजोर पड़ चुके संगठन को पुनः मजबूत करने में जुटे हुए हैं . अभय चौटाला दावा करते हैं कि आगामी दिनों में वे हर जिले का दौरा करेंगे तथा हर मीटिंग में पांच सौ से अधिक नए सदस्यों को पार्टी से जोड़ेंगे . हो सकता है भाजपा व कांग्रेस के विरोध की तासीर वाला चौधरी देवीलाल की पार्टी से जुड़ा हुआ मतदाता ,जो 2019 में दुष्यंत चौटाला को चौधरी देवीलाल का असली वारिस मानकर जजपा के साथ चला गया था, वापिस मूल इंडियन नेशनल पार्टी की तरफ रुझान कर ले और सभी पार्टियों का आंकलन बिगाड़ दे .

अभय सिंह चौटाला भी आशान्वित हैं कि चौधरी देवीलाल की विचारधारा में लोगों ने विश्वास व्यक्त करना प्रारम्भ कर दिया है और जो लोग किसी ग़लतफ़हमी का शिकार होकर इंडियन नेशनल पार्टी को छोड़कर दूसरे दलों में चले गए थे अब वे लोग फिर से पार्टी से जुड़ना शुरू हो गए हैं .

इनेलो नेता अभय सिंह चौटाला ने आठ जून को आयोजित एक प्रेस वार्ता में पत्रकारों के समक्ष दावा किया कि बरोदा उपचुनाव के नतीजे यह सिद्ध कर देंगे कि हरियाणा में असली विपक्ष इनेलो ही है . वर्तमान भाजपा-जजपा सरकार पर प्रहार करते हुए अभय सिंह ने कहा –"मैं प्रदेश की इस सरकार को सरकार नहीं मानता ,बल्कि इसे एक जुगाड़ मानता हूँ और जुगाड़ ज्यादा दिन नहीं चल सकता."

उन्होंने बरोदा उपचुनाव पर टिपण्णी करते हुए कहते है कि उनकी पार्टी इनेलो उपचुनाव जरूर लड़ेगी और वे अपने उम्मीदवार की जीत के लिए दिन-रात मेहनत करेंगे .

चुनाव का अंतिम परिणाम तो समय समय पर बदलने वाली परिस्थितियों पर ही निर्भर करेगा , परन्तु अभी कोरोना के चलते चुनाव करवाना ना जनहित में होगा और ना ही आर्थिक मंदी के इस दौर में सरकार के हित में . फैसला सरकार को लेना है .

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