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पीरियड्स विमर्श पढ़- पढ़ कर थक चुकी हूँ, जानिये क्या है मामला?

 Harsh Vardhan Tripathi |  2018-02-06 09:56:28.0

पीरियड्स विमर्श पढ़- पढ़ कर थक चुकी हूँ, जानिये क्या है मामला?

पीरियड्स विमर्श पढ़- पढ़ कर थक चुकी हूँ। पुरूषों को पैड ख़रीदना चाहिए तो पुरूषों को जानना चाहिए तो पुरूषों का गला पकड़कर पैड के उस धब्बे में धँसा देना चाहिए। क़ोई भी प्रोडक्ट, जब यूरोप - अमेरिका में कचड़ा बन जाता है तो उसे डम्प करने के लिए तीसरी दुनिया के देशों में उसका आक्रामक प्रचार शुरू कर दिया जाता है । सेनेटरी नैपकिन भी उसका ही उदाहरण है ।

पिरियड्स भी मल- मूत्र के तरह एक प्रकृतिक उत्सर्जन ( वेस्ट मटेरियल) है , जिसे देह जरूरत नहीं होने पर फ्लश आउट कर देता है । जहाँ तक स्वास्थ्य की बात है तो मल- मूत्र विसर्जन भी महत्वपूर्ण है और यहाँ तो लिंग भेद , रंग भेद , उम्रभेद , आर्थिक भेद कुछ नहीं है फ़िर भी रोज़ सेलिब्रेटी लोग शर्मिंदा कर रहे हैं । मान लिजिए लार जैसा समान्य स्राव भी क़ोई आपके सामने टपकाता रहे तो अच्छा लगेगा?
"हैप्पी टू ब्लीड" ही क्यों ? "हैप्पी टू पोटी "और "हैप्पी तो सूसू " सब शुरू कर दो । इसमें इतना क्यों शर्मिंदा होना !!! हाँ, अपनी पाॅटी सबलोग धोता परन्तु दूसरे का पाॅटी धोने मे सबको क्लेश ही होगा । पिरियड्स भी एक प्रकृतिक वेस्ट है तो दूसरे का देखना बुरा ही लगता है ।
अगर देख लेना या जान लेना ही मुक्ति है तो सभी डाॅक्टरों को सन्यांसी हो जाना चाहिए । देह के सारी विद्रूपता देखने और जानने के बाद भी देह में आसक्ति नहीं खत्म होती । पुरूष अगर धब्बे वाला सैनिट्रि नैपकिन देख भी लेगा तो क्या होगा...कुछ नहीं। ऐसे भी पुरूष स्त्रियों के बारे में, स्त्रियों से ज़्यादा P.hd करते हैं और शायद ज़्यादा जागरूक भी हैं। इसलिए पुरूषों के लिए " हैप्पी टू ब्लीड" प्रदर्शनी का क़ोई अर्थ ही नहीं हैं।
जहाँ तक सृजन की बात है तो " हैप्पी टू रिप्रोड्यूस" और " हैप्पी टू लेबर पेन" सब शुरू कर दिज़िए । आधा एक्सपोजर भ्रम ही पैदा करता है । इतना ही समाज कल्याण की चिन्ता है तो पूरा सृजन प्रक्रिया पर सिरीज़ ही चालू कर दिजिए । इन्हीं लिबरल समूहों को मातृत्व और उससे जुड़े चिन्हों को ग्लोरिफाइड करना महिला शोषण लगता है लेकिन अब पिरियड्स को ग्लोरिफाइड करने के पीछे पड़े हैं ।
जरूरत स्त्रियों को समझाने की है कि अपने आराम-चैन और स्वास्थ्य को महत्वपूर्ण समझें। एक स्त्री महीना के औसतन सौ रूपये खर्च कर सैनेटरी नैपकिन या साफ़ सूती कपड़े अफोर्ड कर सकती है , लेकिन उसे ये महत्वपूर्ण नहीं लगता । हमने रोज़ के दो सौ से तीन सौ कमाने वाली महिलाओं को भी कपड़े में राख भरकर या बार-बार धोकर इस्तेमाल करते हुए देखा है । वही औरतें दिन भर में पचास रूपये का चाय और बीड़ी पी जाती थीं । समझाने पर वो उल्टा हम पर व्यंग से हँस देती थी ।सबसे बड़ी चुनौती महिलाओं को समझाना ही है ।
पिरियड्स के दौरान होने वाले भेद- भाव से लड़कों का क़ोई ख़ास संबंध ही नहीं होता , खाना नहीं छूना या गद्दे पर नहीं सोना जैसी बातें औरतों के दुनिया के ही बनाये हुए नियम हैं। जहाँ तक मन्दिर में प्रवेश की बात है तो ये कहीं चेक तो होता नहीं है , मन है तो घुस जाओ। पिरियड्स के दौरान के 98% प्रतिशत प्रतिबंध " महिलाओं के द्वारा, महिलाओं के लिए" होते है । जहाँ तक पुरूषों का है तो उनको स्त्री जैसी भी हो स्वीकार्य ही होती है । पुरूषों के स्त्री देह के प्रति आकर्षण को नियंत्रित किये जाने की ज़रूरत है न की प्रोत्साहित करने की ।
जागरूकता ही फ़ैलाना है तो गंभीरता से ज़्यादा और फूहड़ता से कम फैलाइए।
Anumeha Pandit

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