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कोरोना से युद्ध में खतरे में पड़ी बाकी रोगियों की जान

 अश्वनी कुमार श्रीवास्त� |  2 May 2020 2:54 PM GMT  |  दिल्ली

कोरोना से युद्ध में खतरे में पड़ी बाकी रोगियों की जान
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- महामारी फैलने के डर से सरकार ने झोंक दिए हैं देश के लगभग सारे मेडिकल संसाधन

- जो कि कोरोना से लड़ने में भी पड़ रहे हैं अपर्याप्त

- यानी मेडिकल संसाधन अपर्याप्त होने से तो मौतें होंगी ही

- अन्य बीमारियों के शिकार लोगों का भी इस दौरान समुचित इलाज न हो पाने से भी टूट सकती है बड़ी तादाद में बीमार लोगों के जीवन की डोर.

लगता है कि कोरोना जितने लोगों की जान नहीं लेगा, उससे कहीं ज्यादा लोगों की मौत कोरोना से लड़ने पर ही सब कुछ न्योछावर कर देने के कारण जाएगी। कहीं कोई भूख से मर रहा है, कहीं पलायन की मुश्किलों से तो कहीं कोई अन्य बीमारियों में इलाज न मिल पाने के कारण दम तोड़ रहा है। दुख इस बात का है कि आज ऐसी मौतों की गिनती भी कहीं नहीं की जा रही है और मौत भी केवल उन्हीं की गिनी जा रही है, जो कोरोना से मर रहे हैं।

देश में अपर्याप्त मेडिकल संसाधन होने और उसे एक ही जगह पूरी तरह झोंक देने से ही ऐसे हालात बने हैं. ये हालात उनके लिए भी काल बन गए हैं, जो अति धनाढ्य वर्ग में हैं और किसी गंभीर बीमारी का शिकार होने के बावजूद, विदेशों में उस बीमारी का इलाज कराकर जैसे-तैसे अपने जीवन की डोर को बरसों से खींचते चले आ रहे थे। दुनियाभर में चल रहे लॉक डाउन के इस दौर में उनके लिए उनका धन या रसूख भी काम नहीं आ पा रहा और यहीं भारत में किसी अस्पताल में भर्ती होकर उन्हें जान बचाने की जद्दोजहद करनी पड़ रही है।

फ़िल्म अभिनेता इरफान और ऋषि कपूर भी पिछले कुछ बरसों से विदेशों के बेहतरीन इलाज से अपनी असाध्य बीमारी से अपनी जीवन की डोर खींचते चले आ रहे थे, जो अंततः इस लॉक डाउन में मजबूरन भारत में इलाज के दौरान टूट ही गई।

उनके जैसे सैकड़ों या हजारों अति धनाढ्य लोग भी अपने-अपने शहरों के महंगे अस्पतालों में अपनी बीमारी का इलाज करा तो रहे होंगे लेकिन दुआ भी कर रहे होंगे कि जल्द ही यह संकट टले तो वह फिर विदेशों में जाकर अपने पैसे के दम पर बेहतरीन मेडिकल सुविधायें खरीद कर अपनी सांसें और कुछ बरस के लिए बढ़ा लें...

लेकिन जीना यहां, मरना यहां की मजबूरी जिनके साथ है, यानी वे करोड़ों लोग, जो मध्यम वर्ग या गरीब तबके में आते हैं.... जरा सोचिए कि इस वक्त उन लाखों-करोड़ों मध्यम वर्गीय या गरीब लोगों की क्या दुर्दशा होगी, जो किसी न किसी गंभीर बीमारी से पीड़ित हैं मगर किसी सामान्य अस्पताल या सरकारी अस्पताल में समुचित इलाज इसलिए नहीं करा पा रहे हैं क्योंकि देश का पूरा स्वास्थ्य अमला तो इस वक्त कोरोना से लड़ने में लगा हुआ है...

अब सवाल यह उठता है कि आखिर जनता ऐसी दुर्दशा में पहुंची कैसे? मान लिया कि कोरोना तो एक महामारी और प्राकृतिक आपदा है जबकि ऊपर बाकी अन्य जो कारण मैंने लोगों के मरने के गिनाए हैं, क्या वे सब हमारी सरकार की खामी, बदइंतजामी, असक्षमता, लापरवाही, भ्रष्टाचार और देश की बुनियादी जरूरतों पर ध्यान न दिए जाने से नहीं उत्पन्न हुए हैं?

यदि हां तो इसका सीधा मतलब यही है कि प्राकृतिक आपदा से हुई मौतों में वेंटिलेटर, आईसीयू, टेस्ट सुविधा न होना या कम होना, आइसोलेशन वार्ड, बेड, हस्पताल, सुरक्षा किट आदि कारणों के चलते हम सरकार को दोषी ठहराएंगे ही, हमें कोरोना से अलग कारणों से होने वाली मौतों का दोष भी मजबूरन सरकार को ही देना होगा।

सरकार अगर देश में हेल्थकेयर इंफ्रास्ट्रक्चर पर ध्यान न दे और हम फिर भी उसे सपोर्ट करें तो यह हमारे लिए ही खतरनाक बन जाता है। हमारे देश में हेल्थकेयर इंफ्रास्ट्रक्चर 2014 में जहां था, तकरीबन वहीं है क्योंकि भाजपा की केंद्र या किसी भी राज्य सरकार को हार-जीत इस मुद्दे के आधार पर नहीं मिलती। भाजपा का वोटर उससे उम्मीद ही नहीं करता कि उसकी सरकार देश या उसके राज्य में बड़ी तादाद में अस्पताल, बेहतरीन मेडिकल सुविधाएं या मेडिकल शिक्षा अथवा रिसर्च सेन्टर का इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार करे। लिहाजा भाजपा ने छह साल के अपने शासनकाल में देश में कहीं इस क्षेत्र में कोई बड़ा काम करके नहीं दिखाया।

यही वजह है कि देश का पूरा मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर इस वक्त अपनी पूरी क्षमता से कोरोना से लड़ने में तमाम मोर्चों पर नाकाम नजर आने लगा है, वह भी तब जबकि कोरोना की महामारी ने अभी तक भारत में वह विकराल रूप भी नहीं धारण किया है, जो उसने दुनिया के कई और देशों में कुछ दिनों या महीने-डेढ़ महीने पहले ही कर लिया है। सरकार भी भली भांति जानती और समझती है कि छह साल राज करने के बावजूद अगर उसने देश के मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए कुछ नहीं किया तो उसके क्या नतीजे इस कोरोना संकट काल में हो सकते हैं... इसीलिए उसने आननफानन में लॉक डाउन का फैसला कर डाला।

लेकिन लॉक डाउन के बावजूद हमारे यहां भी महामारी लगातार बढ़ ही रही है और जैसे-जैसे हम टेस्ट की संख्या बढ़ा रहे हैं, वैसे-वैसे यहां मरीजों की तादाद भी बढ़ती जा रही है। जाहिर है, इसी से घबरा कर दुनिया के अन्य देशों की तरह भारत ने भी अपने मौजूदा हेल्थकेयर इंफ्रास्ट्रक्चर को फिलहाल केवल कोरोना से लड़ने में ही एकजुट करके लगा दिया है... और बाकी रोगियों को भगवान भरोसे छोड़ दिया है...

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