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हिन्‍दू होकर भी पूर्व आईपीएस और हेमंत सरकार के वित्त मंत्री ने 35 साल तक हर वर्ष रखा रोज़ा, जानें पूरी कहानी उन्‍हीं की जुबानी

हेमंत सरकार में मंत्री रामेश्‍वर उरांव (Rameshwar Oraon) ने अपनी दोस्‍ती की खातिर रोजा रखना शुरू किया था. उन्‍होंने लगातार 35 साल तक रोजा रखा.

 Shiv Kumar Mishra |  24 May 2020 8:22 AM GMT  |  दिल्ली

हिन्‍दू होकर भी पूर्व आईपीएस और हेमंत सरकार के वित्त मंत्री ने 35 साल तक हर वर्ष रखा रोज़ा, जानें पूरी कहानी उन्‍हीं की जुबानी
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रांची. पूरी दुनिया भर के मुसलमान रमजान के पवित्र महीने में रोजा रखते हैं. हम आपको एक ऐसे आदिवासी हिन्‍दू राजनेता की कहानी बताने जा रहे हैं जो 35 साल तक लगातार रोजा रखा. दरअसल, यह कहानी झारखंड के वित्त मंत्री डॉ रामेश्वर उरांव की है. उन्होंने एक या दो नहीं, बल्कि 35 साल तक लगातार रोज़ा रखा है. साल 1972 बैच के भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी और प्रतिष्ठित पटना विश्वविद्यालय के छात्र रहे डॉ रामेश्वर उरांव कहते हैं कि उन्‍होंने इकोनॉमिक्स में पोस्ट ग्रेजुएट करने के लिए पटना विश्वविद्यालय के डिपार्टमेंट ऑफ इकनॉमिक्स में एडमिशन लिया था. उस समय वहां के हॉस्टल में उनका सहपाठी हुआ करता था मोहम्मद इकबाल. पूर्णिया का रहने वाला मो .इकबाल उनका इस कदर दोस्त बन गया कि वह उनके साथ हर सोमवार को उपवास रखने लगा. इसी तरह समय बीतता गया और रमजान के महीना आ गया. इकबाल रोज़ा रखने की तैयारी करते करते बोला कि मैं हर सप्ताह तुम्हारे लिए साल भर सोमवारी उपवास रखा है, तुम मेरे लिए एक महीने रोजा नहीं रख सकते?

दो दोस्तों की दोस्ती का बंधन ऐसा की हमने भी रोजा रखना शुरू कर दिया. इस तरह रोजे की शुरुआत हुई और यह सिलसिला दो साल तक चला. झारखंड के वित्त मंत्री कहते हैं कि पीजी खत्म हो जाने के बाद हम दोनों अलग-अलग हो गए. फिर 1972 बैच में IPS में सेलेक्शन के बाद 1977 में वह SP बनकर चाईबासा गए. जहां मो. शरीफ उनके पास आकर रमज़ान के महीने में बतौर SP उनको निमंत्रित करना चाह रहे थे.

डॉ उरांव के शब्दों में, 'उस वक्त हमें लगा कि क्यों नहीं साल 1969 के बाद से रोजा रखने का सिलसिला छूट गया था उसे फिर शुरू की जाए और इस तरह 1977 से मैं पुलिस अधिकारी होते हुए भी हर साल रोजा रखने लगा. साल दर साल पूरी निष्ठा और आस्था के साथ सेहरी से लेकर इफ्तार करता, दावते इफ्तार देता और दूसरे किसी के दावते इफ्तार में भी शामिल भी होता. यह सिलसिला IPS की नौकरी और बाद में सांसद बनने तक चलता रहा.

2015 में टूटा य़े सिलसिला

उरांव बताते हैं कि 1977 से 2013 तक लगातार उन्होंने रोजा रखा. फिर 2014 में राष्ट्रीय जनजातीय आयोग के अध्यक्ष के रूप में लेह से लौटने के बाद शरीर मे ऑक्सीजन की कमी के चलते डॉक्टर ने रोजा नही रखने की सलाह दी और 2015 में धर्मपत्नी की निधन के बाद रोजा रखने की इच्छा नहीं हुई.

आज के दौर में एक-दूसरे के त्योहार में भागीदारी करने की जरूरत सबसे ज्यादा

वित्त मंत्री डॉ रामेश्वर उरांव रोज़ा के दिनों को याद करते हुए कहते हैं कि पाक महीने में एक महीने तक रोजा रखसे त्याग की भावना इंसान के अंदर आती है. द्वेष और गुस्सा मन मे कम आता है और एक महीने का कष्ट इसका अहसास कराता है कि देश और दुनिया मे वैसे लोग जिनको गरीबी के चलते भूख और पानी के लिए हर दिन नियति से जूझना पड़ता गया उनको जीवन मे कितना कष्ट होता होगा. उरांव ने कहा कि इसलिए मन मे जरूरतमंदों के लिए दान और त्याग की भी भावना भी आती है.

भगवान बुद्ध के विचारों को सबसे बेहतर मानते हैं उरांव

35-37 साल तक रमजान के पाक महीने में पूरी तरह कायदे कानून का पालन करते हुए रोजा रखने वाले झारखंड के वित्त मंत्री और पूर्व IPS अधिकारी कहते हैं कि मैं सरना हिन्दू आदिवासी हूं पर बुद्ध के विचार के करीब मैं खुद को मानता हूं.

आज भी इंतज़ार है पहला रोजा कराने के लिए प्रेरित करने वाले दोस्त इकबाल का

1968 यानि आज से करीब 52 साल पहले पटना विश्वविद्यालय के हॉस्टल में रमज़ान महीने में रोजा रखने के लिए प्रेरित करने वाले सहपाठी इकबाल को याद करते हुए रामेश्वर उरांव कहते हैं कि कई वर्षो तक उससे बातें होती थी. फिर इकबाल गल्फ यानि अरब देश चला गया और धीरे-धीरे संपर्क समाप्त हो गए पर दिल मे उससे मुलाकात की हसरतें अभी भी शेष है.

इंसानियत सभी धर्मों से ऊपर है

आज के समय मे जब धार्मिक सहिष्णुता और एक-दूसरे के धर्म के प्रति आदर और प्रेम का भाव कम होता जा रहा है. इस दौर में डॉ रामेश्वर उरांव का यह कथन काफी मायने रखता है कि हम चाहे कोई भी पूजा पद्धति अपनाए पर हम मानव हैं, इंसान एक है इसलिए इंसानियत ही सभी धर्मों से ऊपर है.

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