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Major Somnath Sharma: उसने खोया नही, जीता था जान देकर ..

कश्मीर का एयरपोर्ट नही था, एक जोक था। असल मे घसियाले मैदान को एयरपोर्ट कहते भी नही। राजा के कभी कभार उड़ान भरने वाले दो छोटे निजी जहाज उसी जगह से टेक ऑफ करते, सो राजा साहब अपनी शान में उसे एयरपोर्ट कहते।

 Shiv Kumar Mishra |  11 Jun 2020 3:21 PM GMT  |  दिल्ली

Major Somnath Sharma: उसने खोया नही, जीता था जान देकर ..
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मनीष सिंह

मेजर सोमनाथ शर्मा, जब कश्मीर एयरपोर्ट पर उतरे तो उनकी उम्र कोई 24 साल थी। इस उम्र में जब हम जॉब और गर्लफ्रेंड खोज रहे होते है, सोमनाथ शर्मा अराकान के युद्ध मे अपनी बहादुरी का लोहा मनवा चुके थे। ये उनके लिए कोई बड़ी बात नही थी, पिता मेजर जनरल रह चुके थे। दादा, भाई, बहन और सभी तो फौजी थे। घर में बचपन से बड़े बूढ़ों की बहादुरी के किस्से ही तो सुनते वो बड़े हुए थे।

कश्मीर का एयरपोर्ट नही था, एक जोक था। असल मे घसियाले मैदान को एयरपोर्ट कहते भी नही। राजा के कभी कभार उड़ान भरने वाले दो छोटे निजी जहाज उसी जगह से टेक ऑफ करते, सो राजा साहब अपनी शान में उसे एयरपोर्ट कहते।

इंडियन एयरफोर्स के सामान और सैनिको से लदे जहाजों के लिए यह कतई मुफीद न था। दिन में जहाज उतर जाते, रात की कोई सुविधा नही थी। मगर वक्त नही था, जीप की रोशनी में रात को जहाज उतरते। रन वे चढ़ते उतरते प्लेन्स से छिल गया, गड्ढे पड़ने लगे। तो कुछ लोगो को बस इसी काम मे लगाया कि वे प्लेन के उतरने चढ़ने के बीच, गड्ढों में मिट्टी भर भर कर उसे काम लायक बनाये रखें।

मगर जैसा भी था, यह एयरपोर्ट भारत से जुड़ने का बिंदु था। इसलिए कि कश्मीर से जो रास्ता पठानकोट होते हुए भारत से जुड़ता था, अब वो रास्ता पाकिस्तान में जा चुका था। भारत से कश्मीर का कोई मोटरेबल मार्ग नही था, जिससे सेना, असलहे और रसद ले जाये जा सके।

इसलिए 26 अक्टूबर 1947 को विलय पत्र दस्तखत होते ही भारत की एयरफोर्स ने अपने गिनती के संसाधनों को आर्मी की लॉजिस्टिक्स में लगा दिया। छोटे और मध्यम आकार के विमान, थोड़ा थोड़ा करके फौजी, गोलाबारूद और हथियार कश्मीर लेकर जाते। जहाज अनवरत उड़ते, औऱ उतरते। तो यह घास का मैदान, अब सेना को भारत से जोड़ने वाली गर्भनाल था।

यह बात कबायलियों के भेष में पाकिस्तानी फौजी भी जानते थे। एयरपोर्ट को तबाह कर वे भारतीय फौज की आमद बन्द कर देते। तब जो थोड़ी फ़ौज आयी थी, उसे मसलना कोई बड़ी बात नही होती। मेजर सोमनाथ शर्मा की बटालियन को श्रीनगर, और खास तौर से एयरपोर्ट तक कबायलियों को पहुचने से रोकने का जिम्मा दिया गया था।

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30 अक्टूबर को दिल्ली से जहाज में बैठकर कश्मीर पहुंचे सोमनाथ ने उसी दिन अपना प्लास्टर, प्रीमेच्योर कटवाया था। हाकी खेलते हुए चोट लगी थी। 3 नवम्बर को वे एयरपोर्ट से थोड़ी दूर बडगाम में अपनी कम्पनी के साथ गश्त कर रहे थे। दोपहर बाद का वक्त था, सब शांत था। उनके साथ की दो कम्पनियां लौट गई, सोमनाथ अपने 50 सिपाहियों के साथ कुछ और देर रुकते। कि उन्हें हलचल महसूस हुई।

कबायली सिविल ड्रेस याने धोती कुर्ते पाजामा में होते, आम कश्मीरी से दिखते। दुश्मन की पहचान कठिन थी। कश्मीर की भाषा और टेरेन से भी सेना सर्वथा अपरिचित थी। इसका फायदा कबायली उठाते। शांत सी फिजां में अचानक ललकारें उठने लगी। हथियारबंद लोग इधर उधर से प्रकट होने लगे। असल मे वे सुबह से घात में थे। जब दो कम्पनियां लौट गई तो एक टुकड़ी को घेरकर मारने और फिर रात तक एयरपोर्ट को तबाह करने की योजना थी।

मेजर साहब ने टुकड़ी को पोजिशन में लाया। गोलीबारी शुरू हो गयी। एक ओर जवाब देते तब तक दूसरी ओर से, उस तरफ कुछ को पोजिशन देते तब तक तीसरी ओर से हमला हो गया। हल्के हथियारों के साथ 50 भारतीय फौजी, मोर्टार और घातक गन्स से लैस छह सौ कबायली। तीन औए से घिरे मुट्ठी भर हिंदुस्तानी आखिर कितनी देर मुकाबला करेंगे, शायद यही सोचा कबायलियों ने ..

छह घण्टे। सोमनाथ शर्मा और उनकी टुकड़ी मुकाबला करती रही। सोमनाथ हर पोजिशन पर जाते, साथियों का उत्साह बढाते म खुद कभी राइफल उठा कर चलाते, कभी एलएमजी। कभी वायरलेस पर कमांड से सम्पर्क करते, कभी पिस्टल से निशाना लगाते। कबायलियों का लश्कर भौचक था। बढ़ना रुक गया। धीरे धीरे भारतीय जवान घायल और शहीद होते गए। मेजर साहब के पास मोर्टार फटा। बुरी तरह जख्मी हुए।

लश्कर की 200 से ज्यादा लाशें गिरी, कमांडर जख्मी हुआ। भारत की कुमुक आ गयी थी। लश्कर पीछे हटा, एयरपोर्ट तक पहुंचने का इरादा छोड़ वे वापस भाग गए। भारत की 19 लाशें गिनी गयी। सोमनाथ शर्मा उसमे नही थी थे।

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तीन दिन बाद क्षत विक्षत शरीर मिला। यह बीसवीं लाश थी, होलस्टर के चमड़े, वर्दी और अपर पॉकेट में मिली भगवद्गीता से शिनाख्त हुई। मेजर सोमनाथ शर्मा अमर हो चुके थे।

एयरपोर्ट, उतना ही व्यस्त था। हवाई जहाज चढ़ते उतरते, हर दिन और फ़ौज को लाते। असलहे लाते। भारतीय संख्या बल बढ़ा तो श्रीनगर से दूर इलाके भी जीते जाने लगे। श्रीनगर से करगिल और लद्दाख तक का इलाका हिंदुस्तान की टेरेटरी हो गया। देश की फौज ने हिंदुस्तान के सर पर वो ताज रख दिया, जिसे कश्मीर कहते है। इस ताज को अपने खून से धोया था सोमनाथ ने।

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हमने सोमनाथ के घरवालों को एक पदक दिया, और भूल गए। पदक का नाम था "परमवीर चक्र"..!!

औऱ फिर शोर मचाने लगे कि हम कश्मीर हार गए। हमारी आकांक्षाए करगिल से लद्दाख की भूमि पाकर सन्तुष्ट नही होती। हमे गिलगित, स्कार्दू, बालाकोट और कंधार भी चाहिए। हमे वहां की लड़कियों से ब्याह करने हैं, प्लॉट लेने है। हम कश्मीर को खोने की कसक से जोड़ते है।

एक बार घास के मैदान सा वो एयरपोर्ट देखिये, मक्खियों जैसे जहाज देखिये जिनमे 20-20 आदमी भरकर उड़ान होती। वो परमवीर चक्र याद कीजिये, और याद कीजिये शहीद सोमनाथ शर्मा को ..

जिसने आपका कुछ खोया नही, आपके लिए जीता था। जान देकर ..

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