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गंगा माँ अब तेरा पानी अमृत नहीं रहा

जीवनदायिनी नदियों का जल प्रदूषण के चलते अमृत से बनता जहर!

गंगा माँ अब तेरा पानी अमृत नहीं रहा
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"कल-कल करके बहती अविरल धारा में,

क्यों कूड़ा-कचरा डाल बाधा पहुंचाते हो,

जल का मोल जानकर भी तुम लोग क्यों,

लापरवाह व अन्जान शख्स बन जाते हो,

नहीं रखोगे ध्यान स्वच्छ जल स्रोतों का,

तो एकदिन ऐ मानव स्वच्छ जल के लिए,

खुद व आनेवाली पीढियों को तरसाते हो,

जीवनदायिनी नदियों को क्यों प्रदूषित कर,

अपनी ही हाथों से ऐ मानव तुम लोग क्यों,

मानव सभ्यता पर भयंकर कहर बरपाते हो।।"

प्रथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति के समय से ही जीवन के लिए जल का अपना एक अलग विशेष महत्व हमेशा रहा है। मानव सभ्यता विकसित होते ही जीवन के लिए बेहद महत्वपूर्ण जल का उचित प्रबंधन मानव के लिए बहुत महत्वपूर्ण कार्यों में आदिकाल से ही रहा है। प्रत्येक मानव जानता है कि जल जीवन का पर्याय है, दुनिया में अधिकांश प्राचीन सभ्यताओं का विकास सुलभता से पानी उपलब्ध होने वाले स्थानों पर ही हुआ है। सभी इंसान जानते हैं कि प्रथ्वी पर उपयोग में आने योग्य जल के बिना प्रथ्वी पर एक क्षण भी जीवन की परिकल्पना नहीं की जा सकती है। लेकिन अफसोस फिर भी हम लोग दिन-प्रतिदिन अपने ही हाथों से स्वच्छ जल के सभी स्रोतों को बहुत तेजी के साथ कूड़ा-कचरा व अन्य अपषिष्ट डालकर प्रदूषित करते जा रहे हैं। धन बचाने के लालच, अन्य स्वार्थ व लापरवाही में हमको अपनी और आने वाली पीढियों के भविष्य की कोई चिंता नहीं है। देश में आज अधिकांश जीवनदायिनी नदियों व जल के अन्य स्रोतों की दुर्दशा की स्थिति किसी भी व्यक्ति से छिपी नहीं है। हमारे लिए शर्म की सबसे बड़ी बात यह है कि माँ गंगा व यमुना जैसी पूज्यनीय नदियां भी हमारे लापरवाही पूर्ण कर्मों के चलते विश्व की सबसे प्रदूषित नदियों की टॉप टेन लिस्ट में शामिल हो गयी हैं। लोगों की भयंकर लापरवाही व सरकारी सिस्टम की बेरुखी व भ्रष्टाचार के चलते अब देश में नदियां अपनी बेहाली व प्रदूषण से दम तोड़ने के कगार पर पहुंचने लगी हैं। आने वाले समय में हालात में सुधार करने के लिए कुम्भकर्णी नींद में हमारे देश के सोये सिस्टम को तत्काल जगाकर स्थिति पर समय रहते नियंत्रण करना बेहद आवश्यक है। आज कागजों से निकलकर धरातल पर जल के सभी स्रोतों विशेषकर प्रदूषण के चलते मृतप्रायः होती नदियों को प्रदूषण मुक्त रखने के लिए तत्काल धरातल पर ठोस कार्य करने की आवश्यकता है। देश में पिछले कई दशकों से नदियों को स्वच्छ करने के नाम पर हो रही धन की बंदरबांट रोककर उसके सही उपयोग करने की आवश्यकता है। जिस तरह से विकास की अंधाधुंध अंधी दौड़ व चंद रूपये बचाने के कच्चे लालच में हम लोगों ने अपने देश की जीवनदायिनी नदियों को अपने ही हाथों से विभिन्न प्रकार से गंभीर रूप से प्रदूषित करके जबरन गंदा नाला बनने पर मजबूर कर दिया है, यह स्थिति आने वाले समय में हर तरह के जीवन के लिए बेहद चिंताजनक है। जबकि बेहद अफसोस की बात यह है कि हमारे देश में नदियों को पवित्र मानकर पूजा जाता है, बेहद सम्मान की स्थिति होने के बावजूद भी मल-मूत्र की खुली नालियों, गंदे पानी के नालों, फैक्ट्रियों का जहरीला प्रदूषित जल, मानव व जानवरों के मृत शरीर, कूड़ा-कचरा आदि डालकर नदियों को अपने हाथों से प्रदूषित किया जा रहा है। देश में भ्रष्टाचार के कारण दूषित जल का शुद्धीकरण करने वाले संयंत्रों का सही ढंग से नहीं चलना व जगह-जगह पर्याप्त मात्रा में संयंत्रों का अभाव होना, फ़ीकल कॉलिफोर्म (मानव मल), मृदा अपरदन और नदियों के जल में भारी मात्रा में प्लास्टिक कचरे का प्रक्षेपण करने आदि जैसे बहुत सारे बेहद गंभीर कारणों से नदियों व अन्य जल स्रोतों को तेजी प्रदूषित करके मरणासन्न स्थिति पर पहुंचने के लिए मजबूर किया जा रहा है।

भारत जैसे विकासशील देश के प्रत्येक गांव व शहर में कूड़ा-कचरे व रोजाना निकलने वाले गंदे पानी का उचित ढंग से निस्तारण करना एक बहुत बड़ी गंभीर समस्या बन गया है। जिसकी वजह से लोग अपने आसपास की नदियों व जल स्रोतों का गंदा पानी डालने व कूडेदान के रूप में उपयोग करके प्रदूषित कर रहे हैं। आज हमारे सामने चुनौती है कि उचित ढंग से सफाई करने के प्रति लोगों के बीच जागरूकता बढ़ाने के साथ-साथ देश में जगह-जगह कचरे के लगे ढेरों में कमी लाने के लिए रोजमर्रा के जीवन में विभिन्न प्रकार के कचरा उत्पादन में कमी लाने के लिए लोगों को जागरूक करना होगा। क्योंकि आजकल बहुत तेजी से बदलती जीवनशैली में कचरा उत्पादन बहुत ही तेजी से बढ़ ही रहा है, पिछले कुछ वर्षों में प्लास्टिक का उपयोग आम जन-जीवन में भी बहुत अधिक बढ़ा है। रहन-सहन के इस बड़े बदलाव के चलते पूरे देश में अचानक से कचरा उत्पादन में भारी वृद्धि हुई है, जबकि निस्तारण के नाम पर अभी तक देश के शहरों में ही केवल कचरे के पहाड़ देखने के लिए नजर आते हैं गांव की स्थिति तो छोड़ ही दो। आज तत्काल आवश्यकता है कि देश को स्वच्छ बनाये रखने के लिए ल जीवनदायिनी नदियों के जल को लोगों के इस्तेमाल योग्य रखने के लिए हर तरह के कचरे का समय से सही निस्तारण होने के साथ-साथ कचरे के उत्पादन को कम करना भी आवश्यक है। इस पर समय रहते जल्द से जल्द पहल करने के लिए शासन-प्रशासन के साथ-साथ आमजनमानस को भी स्वयं ही सचेत होना होगा। क्योंकि आज बेहद चिंतनीय स्थिति यह है कि भारत का प्रत्येक छोटा-बड़ा शहर कचरे के ढ़ेर पर बैठकर हर तरह के प्रदूषण को जन्म दे रहा है।

"हमारी नदियों में प्रदूषण के हालात तो इतने खराब हो गये हैं कि हमने मोक्षदायिनी माँ गंगा तक के पावन निर्मल जल को स्वयं के स्वार्थ की खातिर बहुत अधिक प्रदूषित करने का काम किया है। जबकि माँ गंगा प्रत्येक भारतीय जन-मानस के मन में श्रद्धा भाव के साथ पू्ज्यनीय होकर दिल व दिमाग में हर वक्त वास करती है। आदिकाल से ही माँ गंगा करोड़ों देशवासियों की आस्था का साक्षात प्रतीक रही है। पूज्यनीय माँ गंगा आम-जनमानस के बीच असाधारण धार्मिक महत्त्व रखने के साथ भारत में सबसे बड़ी जीवनदायिनी नदी भी है। लेकिन अफसोस आज माँ गंगा के प्रदूषण की हालात किसी से भी छिपी नहीं है। वह अपने उद्गम स्थल से चलने के चंद किलोमीटर के बाद ही लोगों व सरकारी सिस्टम की लापरवाही के चलते प्रदूषित होनी शुरू हो जाती है। जबकि माँ गंगा आस्था के साथ-साथ भारत के लगभग 11 राज्यों की 40 प्रतिशत आबादी की विभिन्न जरूरतों के लिए जल उपलब्ध करवा कर उनको जीवन देती है। दूसरे शब्दों में कहें तो माँ गंगा भारत के बहुत बड़े भूभाग व जनसंख्या को जल उपलब्ध करवाने के कारण एक महत्वपूर्ण जीवनरेखा है। गंगोत्री से अवतरित पावन माँ गंगा आज दिन-प्रतिदिन हम लोगों के रोजमर्रा के कर्मों से बहुत तेजी के साथ प्रदूषित होकर रोजाना प्रदूषित होकर मैली होती जा रही है। अफसोसजनक बात यह है कि आज यह दुनिया की कुछ सबसे प्रदूषित नदियों में से एक मानी जाती है, यहां तक अब हरिद्वार स्थिति पावन 'हर की पौड़ी' पर भी कभी-कभी जल आचमन योग्य नहीं रहता है। जब की माँ गंगा की सफाई के नाम पर दशकों से हर वर्ष करोड़ों रूपये खर्च किये जाते है, फिर भी हालात में धरातल पर कोई खास सुधार नहीं है, जो स्थिति भविष्य में लोगों के जीवन के लिए ठीक नहीं है।"

वहीं हमारे आराध्य भगवान श्रीकृष्ण की बाल अठखेलियों की गवाह हमारी प्यारी पवित्र चंचल यमुना नदी का तो बहुत ही बुरा हाल हो गया है, हरियाणा में यमुना के नाम पर बसे यमुनानगर तक पहुँचने से पहले ही यमुना पूरी तरह मृत प्रायः हो चुकी होती है। लोगों की जरूरतों को पूरा करने के उद्देश्य से इसकी मुख्यधारा का लगभग पूरा पानी जगह-जगह विभिन्न नहरों में मोड़ दिया जाता है और सिर्फ़ कुछ नालों, बरसाती नदियों और छोटी-बड़ी धाराओं के साथ शहरों के मल-मूत्र गंदा पानी व फैक्ट्रियों की गंदगी लिए जो कथित नदी आगे बढ़ती है, वह सिर्फ़ नाम की ही यमुना होती है, वास्तव में वह एक गंदे नाले में बदल चुकी होती है। दिल्ली पहुंच कर तो स्थिति और विकट गंभीर हो जाती है, दिल्ली, मथुरा व आगरा जैसी विभिन्न जगहों में यमुना की स्थिति देखें तो वह मरणासन्न स्थिति में पहुचने वाली है। दिल्ली के गंदे पानी के नालों की वजह से वह पूर्ण रूप से एक गंदे नाले में तब्दील होकर रह गयी है, प्रदूषण के गंभीर स्तर के चलते यमुना में अधिकांश स्थलों पर आक्सीजन का स्तर सामान्य से बहुत कम रहने लगा है, जो नदी में रहने वाले जलीय जीवन के लिए बेहद घातक है। आज जिस यमुना का जल खुली आँखों से ही नाले के पानी जैसा नज़र आता है वह पानी ही दिल्ली की 70 प्रतीशत जनता को ट्रीट करके जरूरत के इस्तेमाल में लाना पड़ता है।

वहीं उत्तर भारत में कभी वर्ष भर बर्षा के स्वच्छ जल से लबालब भरी रहने वाली यमुना नदी की एक सहायक नदी हिन्डन नदी है, जिसका पुरातन नाम हरनदी या हरनंदी भी था। इसका उद्गम स्थल सहारनपुर जनपद में निचले हिमालय क्षेत्र के ऊपरी शिवालिक पर्वतमाला में स्थित है। यह पूर्णत: वर्षा-आश्रित नदी है और इसका बेसिन क्षेत्र 7083 वर्ग किलोमीटर है। यह गंगा और यमुना नदियों के बीच लगभग 400 किलोमीटर की लम्बाई में मुज़फ्फरनगर, मेरठ, बागपत, गाजियाबाद, नोएडा, ग्रेटर नोएडा से निकलते हुए, दशकों पूर्व दिल्ली से कुछ दूरी पर यमुना नदी मिल कर उसको स्वच्छ बनाये रखने में अपना अनमोल योगदान देती थी। लेकिन आज वही हिन्डन नदी शुगर मिल के गंदे पानी व शहरों के गंदे नालों की वजह से एक नाले में तब्दील हो चुकी है, स्थिति यह हो गयी है उसमें आक्सीजन का स्तर अधिकतर समय शुन्य रहने लगा है।

नदियों व जल स्रोतों को स्वच्छ रखने की चुनौती से निपटने के लिए हम लोगों को कुछ दिनों पहले देश भर में हुए लॉकडाउन के समय का बारीकी से अध्ययन करना होगा, लॉकडाउन के समय की बात करें तो कलकारखानों के बंद होने व अन्य कारकों के कारण से इन सभी नदियों का पानी स्वतः ही बेहद स्वच्छ नजर आने लगा था। जो यमुना दिल्ली तक आते-आते पूरी तरह से एक बदबूदार गंदा नाला दिखने लगती थी, वह लॉकडाउन के समय में स्वच्छ होकर फिर से नदी लगने लगी थी। यही स्थिति माँ गंगा की थी वह भी इतनी साफ रहने लगी थी कि ऋषिकेश-हरिद्वार तक के जल को आचमन लेने योग्य बताया जाने लगा था। मृतप्रायः हिन्डन नदी का जल भी बिना किसी सरकारी प्रयास के तेजी से साफ होना शुरू हो गया था। लेकिन अव्यवस्थित अनियमित विकास की अंधी दौड़, चंद पैसे बचाने के कच्चे लालच, सिस्टम के भ्रष्टाचार की वजह से आज देश में नदियों का अस्तित्व फिर खतरें में है, जगह-जगह चोरी-छिपे या खुलेआम गिरने वाले गंदे नालों कूडा-कचरे की वजह से नदियों का मूलस्वरूप फिर से खतरें में पड़ गया है। जबकि सत्य बात तो यह है कि लॉकडाउन ने यह साबित कर दिया है कि अगर नदियों में गिरने वाले मल-मूत्र, गंदे नालों, कूडा-कचरे आदि को नदियों में गिरने से रोक दिया जाये और नदी धारा को बिना किसी रोकटोक के स्वच्छंद अविरल बहने दिया जाये, तो देश की किसी भी नदी को स्वच्छ करने के लिए एक भी पैसे की सरकारी मदद की कोई आवश्यकता नहीं है। ईश्वर की कृपा से हमारे देश की प्रत्येक अविरल बहती नदी में इतनी शक्ति है कि वह ख़ुद को साफ करने में सक्षम है। लॉकडाउन ने देश के प्रत्येक व्यक्ति को संदेश दे दिया है कि नदियों की स्वच्छता के लिए रूपयों की आवश्यकता नहीं है बल्कि दृढसंकल्प लेकर दृढ़निश्चय करने की आवश्यकता है।

।। जय हिन्द जय भारत ।।

।। मेरा भारत मेरी शान मेरी पहचान ।।

दीपक त्यागी
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