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नंबर सभी का आएगा, गर दर्द उनका हमने नहीं बांटा!

- वरना लॉक डाउन लंबा खिंचा तो घरों को दुर्ग और नौकरी / वेतन / सेविंग को अपनी ढाल समझने वाले भी आ सकते हैं इसी दशा दिशा में

 Shiv Kumar Mishra |  29 March 2020 2:55 AM GMT  |  दिल्ली

नंबर सभी का आएगा, गर दर्द उनका हमने नहीं बांटा!
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- सड़कों पर पैदल, खाली पेट, खाली जेब संघर्ष करते लोगों का साथ नैतिक रूप से देना होगा सभी को

- वरना लॉक डाउन लंबा खिंचा तो घरों को दुर्ग और नौकरी / वेतन / सेविंग को अपनी ढाल समझने वाले भी आ सकते हैं इसी दशा दिशा में

मार्टिन नीमोलर ने एक कविता लिखी थी, जिसका लब्बोलुआब यह है कि दूसरों के साथ चाहे किसी भी हद तक कुछ भी घटित होता रहा हो मगर मैंने हमेशा इसलिए मौन साधे रखा क्योंकि उन दूसरों से मैं अलग था। मगर जिस दिन मेरी बारी आई, उस दिन मैं अपनी मदद के लिए किसी से गुहार भी नहीं लगा पाया क्योंकि मेरे अलावा कोई और बचा भी तो नहीं रह गया था।

आज जब हम यानी देश के खाए अघाए वर्ग के लोग.... लाखों/ करोड़ों मजदूरों की रोजी रोटी कोरोना महामारी से बचाव के लिए लागू किए लॉक डाउन से छिनने के बाद का वीभत्स नजारा..... अपने-अपने घरों में टीवी में देखने के बाद चैनल बदलकर रामायण देखने लग रहे हैं तो शायद यही निश्चिंतता हममें भी है कि वे मजदूर हमसे अलग हैं। क्योंकि हम नौकरीपेशा हैं या व्यापारी हैं या किसी अन्य क्षेत्र में इतना तो कमा ही लेते हैं कि एक दो माह तो बड़े आराम से काट लेंगे। जाहिर है, हममें से कुछ तो ऐसे भी होंगे , जो कई महीने या और भी लंबा समय बिना कुछ किए काट लेंगे।

इसलिए अब ऐसी निश्चिंतता के साथ घरों में बैठकर हम यह सरदर्द भला क्यों लें कि हजारों / लाखों की तादाद में पैदल या सरकारी बस में बैठकर किसी भी तरह अपने अपने गांव जाने को बेकरार लोगों का भविष्य अब क्या होगा ? भविष्य तो छोड़ो, उनका तो वर्तमान यानी एक- एक दिन ही उन पर भारी है। हम उन जैसे नहीं हैं इसलिए उनके साथ जो घटित हो रहा है, उससे अपने को क्या?

हालांकि 'सानू की' की मानसिकता से इतर मेरे जैसे बहुत से मानवीय संवेदना रखने वाले लोग भी हैं, जो घरों में बैठकर सोशल मीडिया पर ही सही मगर यह माथापच्ची तो कर रहे हैं कि काश सरकार किसी तरह से उनको बचा ले। मगर यह सच भी शायद हमारे जैसे चंद ही लोगों को समझ आ रहा होगा कि उनके बाद अब हमारे जैसे खाए अघाये लोगों पर भी कुछ इसी तरह की गाज गिरने वाली है।

वह ऐसे कि भले ही हमने अपने-अपने घरों में खुद को बंद करके कोरोना से खुद को बचा लिया है मगर लॉक डाउन की इस पॉलिसी का अगला घातक असर हम पर ही पड़ने वाला है। हममें से जो लोग भी कहीं जॉब कर रहे हैं या व्यापार कर रहे हैं अथवा किसी न किसी क्षेत्र से मोटी कमाई करते रहे हैं, उन में से अधिकतर की स्थिति अगर इन मजदूरों जैसी नहीं भी हुई तो भी एक - दो महीने बाद से ही बदतर जरूर होने लगेगी। वैसे भी कहावत ही है कि आय बंद होने के बाद सेविंग या अन्य जमा पूंजी से होने वाला व्यव बहुत लंबे समय तक नहीं चलाया जा सकता।

और यदि दुनिया के मौजूदा हालात पर नजर डाली जाए तो एहसास हो जाएगा कि 21 दिन का यह लॉक डाउन तो बस एक शुरुआत ही है। फ्रांस ने आज ही अपने देश में छह माह का लॉक डाउन घोषित किया है। इसी तरह अन्य कई देश या तो लंबे लॉक डाउन से गुजर रहे हैं या लंबे लॉक डाउन की तैयारी में हैं।

इसलिए बेहतर होगा कि भले ही हम अपने - अपने घरों में कैद हों, सड़क पर परिवार और सामान के साथ खाली पर और खाली जेब घूम रहे लोगों से अलग हों.... मगर आपस में सोशल मीडिया के जरिए ही सही, मिलकर यह माथापच्ची करते रहें कि कैसे जल्द से जल्द उन्हें बचा लिया जाए... कैसे वे कोरोना जैसी महामारी से तो बचे ही, आर्थिक रूप से कंगाल होकर भुखमरी का शिकार न हो जाएं। या कैसे वे सभी अपने - अपने गांव पहुंच जाएं या जहां हैं, वहां उनके पास खाने / रहने / दवा / इलाज आदि की मानवीय और मूलभूत जरूरतें पहुंचती रहें।

अब हो सकता है कि सरकार की तरह कुछ लोग यह भी कुतर्क करें कि इन लोगों की मदद वे व्यापारी ही करें, जिनके यहां वे कार्यरत थे। लेकिन प्रैक्टिकली यह संभव नहीं है, यह सरकार भी जानती है। व्यापारी ज्यादा से ज्यादा इतनी ही मदद कर पाएंगे कि इस महीने जितने दिन इन सभी ने काम किया , उतने दिन की या 31 मार्च तक की सेलरी अपने यहां कार्यरत लोगों को दे दे। हालांकि इसके लिए भी सरकार किसी कम्पनी को तभी मजबूर कर पाएगी, जब वह कम्पनी अच्छे टर्न ओवर या प्रॉफिट में चल रही हो।

अब कम टर्न ओवर वाली या घाटे वाली कंपनियां भलमनसाहत में मार्च की सेलरी अपने कर्मियों को दे भी देंगी तो भी उसके बाद एक दिन की सेलरी भी घर पर बैठे कर्मियों को देने का बूता शायद ही कोई व्यापारी जुटा पाए क्योंकि व्यापार भी रोजाना कुवां खोद कर पानी पीने जैसा उपक्रम होता है। लॉक डाउन में व्यापार ठप होने या नियमित आय बंद हो जाने की दशा में कोई व्यापारी कैसे नाहक ही लोगों को वेतन देना जारी रख सकता है? और वह भी तब, जब उसे यह पता है कि चाहे वह जितनी मदद कर दे अपने कर्मियों की, सरकार उसकी इस मदद की एक भी पाई उसे राहत पैकेज के तौर पर कभी लौटाएगी नहीं। किसी छोटी कम्पनी या व्यापारी से तो मदद की उम्मीद सरकार को तभी लगानी चाहिए, जब सरकार भी उसे भविष्य में उसका कारोबार दोबारा शुरू करने / चलाने के लिए पूंजी मुहैया कराए।

बहरहाल, हम सभी आज सरकार की तरफ ही कातर निगाहों से देख रहे हैं... आज मजदूर सड़क पर हैं और हम घर पर ... मगर सरकार ने या हमने मिल जुल कर उनके लिए कोई रास्ता नहीं निकाला तो कल हम भी इसी तरह सड़क पर नजर आ सकते हैं... और जो आज सड़क पर हैं, उनका तो खैर जीवन ही तब तक खतरे में पड़ चुका होगा... सड़क पर आकर भी किसी ने उनकी हालत पर तरस नहीं खाया तो उस वक्त हम पर तरस कौन खाएगा? और क्या पता हम पर तरस खाने के लिए कोई दूर दूर तक हो ही न ....

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